हमारे लेखक

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (पैंत्तालीस)

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (पैंत्तालीस)
सिकन्दरे आज़म ‘जिन्दाबाद’
आबाद जाफ़री, नैनीताल-
खनन और आबकारी के भ्रष्टाचार की सक्रियता के आरोप में एक निर्वाचित सरकार धराशाही हो गयी। किसी भी सरकार का बनना और बिगड़ना हमारी संसदीय परम्परा का अविभाज्य अंग है। परन्तु सत्ता स्वार्थ की कीचड़ से जो होली खेली गयी है उसने सत्तासीन लोगों को तो लीप-पोत कर बदरंग बना ही दिया है, खुद साफ़ सुथरी राजनीति करने का दावा करने वालों के चेहरे भी कुरूप हो गये हैं। इस वातावरण में उत्तराखण्ड की जनता हतप्रभ है और उसके पास मातम करने के अलावा कोई चारा नहीं है। जनता को यह पता ही नहीं चला कि रहबरों के वेष में ‘राहज़न’ मौजूद है । एक दर्जन धुरन्धर सिकन्दरे आज़म बनने के शक्ति परीक्षण में सवा करोड़ आवाम के अरमानों का कत्लेआम जारी है।
काट कर ज़बां मेरी कह रहा है वह जालिम
अब तुम्हें इजाज़त है, हाले-दिल सुनाने की।
अपने-अपने कानूनी अधिकारों की रक्षार्थ तथा पाक-साफ़ बनने के लिए देश के ख्याति प्राप्त विद्वान अधिवक्ताओं को मैदान में उतारा गया है। पैरवी के लिए हेलिकाॅप्टरों की व्यवस्था साइकिल रिक्शा में बदल गयी है। 18 मार्च से जो सिलसिला शुरू हुआ तो थमने का नाम नहीं ले रहा है।
6 दर्जन जनप्रतिनिधियों के आचरण ने संसदीय परम्पराओं को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। संविधान विशेषताओं को हैरत में डालने वाला यह प्रकरण न्याय देवताओं को भी विचलित करने वाला है। यह हैरतअंगेज है कि जो काम ‘फलोर आॅफ़ दि हाउस’ पर होना चाहिए वह रेस-कोर्स से संचालित से हो रहा है और पेंचीदा बना कर न्यायपालिका के हवाले कर दिया गया है।
1) विनियोग विधेयक पारित हुआ या नहीं?
2) विधानसभा अध्यक्ष की पावर संदिग्ध है या नहीं?
3) बाग़ी विधायकों का आचरण उचित है या नहीं?
4) सरकार बनाने का दावा करने वाले बहुमत में है या अल्पमत में?
5) विधायकों की खरीदो- फरोख़्त हो रही या नहीं?
6) विधान सभा में मार-पीट करने का विशेषाधिकार है या नहीं?
7) व्यक्तिगत छींटा-कशी और ज़ाती किरदार के आरोप उचित है या नहीं?
इस तरह के अनेक सुलगते हुए सवाल हैं जिनका जवाब जनप्रतिनिधियों को देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।(उन्हें विशेषाधिकार प्राप्त है।) वास्तव में इसका जवाब भी जनता को ही देना है और वह देगी।
16 वर्ष के स्थापना काल में कोई नीति नहीं है। है तो वह कागज़ पर होगी जबकि सरकार की पाॅलिसी को धरातल पर नजर आना चाहिए। अब अलादीन का चिराग़ मिल जाये तो धरातल पर नीतियां तलाश कर ली जायंे।
क्या क्या लुटा है तीरा-नसीबी के दौर में,
(अन्धा मुकद्दर)
घर में कोई चिराग़ जले तो पता चले।
जन मानस में बेचैनी है। मजदूर से लेकर मसरूर तक परेशान हैं। देवताओं की सरजमीन से देवता रूठ गये हैं। पूजा-पाठ, हवन, यज्ञ, शान्ति पाठ सब कुछ हो रहा है। मगर दिल मुतमईन नहीं है। एक बड़ा सवाल यह पैदा हो गया है कि वर्तमान संसदीय प्रणाली क्या अप्रसांगिक हो गयी है? कही वक्त कोई बदलाव तो नहीं चाहता!
क्या संसदीय प्रणाली हमारे व्यक्तिगत आचरण से प्रदूषित हो रही है।
इस सवाल पर आप गम्भीरता से सोचें!!