विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (बत्तीस) न्याय की आशा में- 36 वर्ष तबाह हो गये

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
नगर निगम बरेली में वेतन से जुड़ी समस्याओं ने 1979 में आन्दोलन का रूप ले लिया। कर्मचारियों को काम पर आने से रोकने और तोड़फोड़ करने तथा सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप में तत्कालीन उप नगर अधिकारी ए0 एन0 सिंह ने 25 अप्रैल 1979 को स्वरूप नगर थाना (बरेली) में ब्रज किशोर वाजपेयी और नन्दन सिंह सहित 11 कर्मचारी नेताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया। जमानतें हो गयीं। तीन साल आठ माह की जांच के पश्चात् 7 दिसम्बर 1982 को पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की। विधिवत अदालती कार्यवाही शुरू हो गयी। 29 वर्ष पश्चात 22 जनवरी 2011 को मुकदमंे में आरोप तय हुए और गवाही का दौर शुरु हुआ। इस लम्बी अवधि मे सभी गवाहांे और 9 कर्मचारियों की मृत्यु हो गयी। दो जिन्दा बचे कर्मचारियों को न्यायालय ने साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। जिन्दा बचे 2 कर्मचारियों में 76 वर्षीय नन्दन सिंह हैं तथा दूसरे आरोपी कर्मचारी नेता ब्रज किशोर वाजपेयी की आयु 87 वर्ष है। 5 वर्ष पूर्व पक्षाघात से पीडि़त हो गये। शरीर के आधे हिस्से ने काम करना बन्द कर दिया। उनके पुत्र अनिल बाजपेयी उन्हें किदवाई नगर से दोस्तों की सहायता से न्यायालय में हाजिर कराते थे। ‘तारीख पर तारीख’ ‘तारीख पर तारीख’................. होती रही और वह अदालत की चैखट को सलाम करते रहे, इस उम्मीद में कि फैसला आने वाला है। आखिर 36 वर्ष पश्चात् वह ‘बेदाग’ छूट गये। मगर जिन्दगी में परिवार में, शरीर में जो दाग पेबस्त हो गये उन्हें किस न्यायालय से बेदाग साबित किया जाये? यह एक उदाहरण है जिसमें बहुत बड़ा सवाल पेशीदा है।
दूसरा रूख
30 अप्रैल 2010 को उत्तरी कश्मीर के माछिल इलाके में कथित रूप से तीन पाकिस्तानी आतंकवादियों को घुसपैठ की कोशिश में दो सेना अधिकारियों और चार जवानों ने मुठभेड़ में मार गिराया। कई दिन तक राजधानी के समाचार पत्र इस खबर और खबर से सम्बन्धित बयान छापते रहे। वाह। वाह। शाबाश ! शाबाश! का शोर था। शान्त हुआ तो पुलिस जांच में साबित हुआ कि मुठभेड़ में मार गिराये गये आतंकवादी वास्तव में बारामूला जिले के नडयाल गांव के बेरोजगार युवक थे।
भारतीय सेना ने इस घटना को गम्भीरता से लिया। कोर्ट-मार्शल के पश्चात् पिछले साल नवम्बर में ही कर्नल दिनेश पठानिया, कैप्टन उपेन्द्र, हवलदार देवेन्द्र, लांस नायक अरुण और रायफल मैन अब्बास हुसैन को उम्रकैद की सजा सुना दी गयी। लेकिन उत्तरी कमान के प्रमुख लेफटिनेंट जनरल डी.एस. हुड्डा को सजा की पुष्टि करने मे 10 माह लग गये।
पदोन्नति और मैडल पाने के लिए इस तरह का यह कोई पहला कारनामा नहीं था। पहले भी भारतीय सेना के लोगों ने ऐसे कार्य पूरी निष्ठा से अंजाम दिये हैं। अत्यन्त दुश्वार हालात में ड्यूटी करने वाले हमारे सैन्यबलों को आर्मड फोर्स स्पेशल कवच प्राप्त है। लेकिन इस कवच के यदा-कदा दुरुप्रयोग की खबरें आने से सेनाओं के मनोबल पर जो प्रभाव पड़ता होगा उसका अंदाजा आसान नहीं है। आज भी जब हम किसी सैनिक को उसकी वर्दी में देखते हैं तो गर्व से खुद हमारा सीना चैड़ा हो जाता है। मैं सोचता हूँ कि जिस भारतीय सेना के शौर्य और उच्च मानवीय मूल्यों की सारी दुनिया ने आला तरीन मिसाल पेश की जाती है, ऐसी घटनाऐं उसे कितना जख्मी करती होंगी।