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पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (बय्यालीस) अध-कचरे ज्ञान की तबाहकारियाँ

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (बय्यालीस)
अध-कचरे ज्ञान की तबाहकारियाँ
आबाद जाफ़री, नैनीताल-
पिछले दिनों उत्तराखण्ड के माननीय मुख्यमंत्री जी हल्द्वानी में आयोजित एक मीडिया कार्यक्रम में पधारे। दरअसल यह कार्यक्रम एक स्थानीय सांध्य दैनिक के प्रकाशन से सम्बन्धित था। अपने भाषण में उन्होंने सम्बन्धित सांध्य दैनिक को हल्द्वानी से प्रकाशित होने वाला प्रथम सांध्य दैनिक बताया। (इस विवरण के लिए ‘उत्तरांचल दीप’ दिनांक 6 मार्च देखें) जबकि पिछले लगभग दस वर्षाें से ‘कुमाऊँ टाइम्स’ तथा लगभग 7 वर्षाें से उत्तरांचल दीप सांध्य दैनिक के रूप में नियमित रूप से प्रकाशित होते चले आ रहे हैं। अब सूचना विभाग चाहे तो गोपनीय ढंग से किसी भी नियमित प्रकाशन को अनियमित ठहरा सकता है। यह तन्त्र के लिए आसान भी है। इन अध-कचरे तथ्यों का एक फायदा तो यह भी है कि अब पत्रकारिता में पी॰एच॰डी॰ करने वालों को बहुत मेहनत करने की जरूरत नहीं है। शोध के लिए समाचार पत्र की कतरन काफी है। वैसे भी हमारे राज्य के अनेक विश्वविद्यालयों में शोध का स्तर इसी प्रकार का है। जाहिर है कि माननीय मुख्यमंत्री जी को इस प्रकार की जानकारी स्थानीय सूचना विभाग ने ही उपलब्ध करायी होगी। पद दुरूपयोग और लापरवाहियों के लिए सूचना विभाग स्वतंत्रता की हद तक बदनाम है।
20-25 वर्ष पहले के उत्तर प्रदेश सूचना विभाग में कई ज्ञानी और अध्ययन में पारंगत विभूतियां कार्यरत थीं। उनमें एक लीलाधर शर्मा ‘पथिक’ को जानने वाले अभी मौजूद हैं। कई अन्य भी अपनी साहित्यिक कृतियो के लिए ख्याति अर्जित कर चुके हैं। अपने गठन से लेकर आज तक मुझे सूचना विभाग उत्तराखण्ड में किसी नामचीन साहित्यिक विभूति के दर्शन नहीं हुए। यह मुमकिन भी नहीं था क्योंकि जब उत्तराखण्ड राज्य का गठन हुआ तो योग्य अफसरों का अभाव था। सूचना विभाग में हाईस्कूल पास साधारण कलर्काें को जिला स्तर का अधिकारी बना दिया गया। नायब तहसीलदार रातोंरात एडिशनल कमिश्नर बन गये। श्री नारायण दत्त तिवारी जी के मुख्यमंत्रित्व काल (2002-2007) में अनाप-शनाप पुस्तकों का प्रकाशन इसी विभाग ने किया। एक पुस्तिका उधमसिंह नगर पर भी प्रकाशित की गयी थी जिसमें रूद्रपुर का मनगढ़त विवरण प्रकाशित हुआ। जबकि इस तरह का प्रमाणित विवरण कमिश्नर की लाइब्रेरी में उपलब्ध था (कमिश्नर की लाइब्रेरी पर फिर लिखूंगा) कुछ नहीं तो विभागीय योजनाओं का विवरण सचिवों के नाम से संग्रहित करके पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर दिया गया। ऐसी तथा-कथित पुस्तक के प्रकाशन पर भारी-भरकम धनराशि खर्च करने पर गर्व महसूस किया गया। इस तरह के ‘लिटरेचर’ की कोई साहित्यिक औकात नहीं है। यह उत्तराखण्ड है जिसकी सरजमीन से ज्ञान के अनेक सूरज उदित हो चुके हैं और आज भी अनेक मूड़ धन्य साहित्यकार और विचारक मौजूद हैं। यह अलग बात है कि ऐसी विभूतियों का राज्य के विकास में कोई उपयोग नहीं हो रहा है। यह तुच्छ राजनैतिक मानसिकता का उदाहरण है-
‘‘पता कैसे चले दुनिया को, मेरे दिल के जलने का,
धुऐं को रास्ता मिलता नहीं, बाहर निकलने का।’’
अब बात फिर वहीं से शुरू करते हैं। पत्रकारों, साहित्यकारों और जानकारों ने माननीय मुख्यमंत्री जी के बयान पर घोर आश्चर्य व्यक्त किया परन्तु कोई आपत्ति दर्ज कराना इसलिए उचित नहीं समझा कि उससे कुछ होने वाला नहीं था। झूटी जानकारी से जो नुकसान होने वाला था वह तो हो ही गया।