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पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (बय्यालीस) डी॰सी॰एम॰ का मुशायरा-‘‘बज़्मे शंकर-शाद’’

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (बय्यालीस)

डी॰सी॰एम॰ का मुशायरा-‘‘बज़्मे शंकर-शाद’’

आबाद जाफ़री, नैनीताल-

दिल्ली में पिछले 50-60 वर्षाें से गंगा-जमनी तहजीब की एक शमाँ लगातार जल रही है। हिन्दुस्तान- पाकिस्तान के विवादों की आंधियाँ भी इस चिराग़ को नहीं बुझा सकी हैं। यहां मेरा मतलब दिल्ली क्लाथ मिल के सालाना मुशायरे से है जो अभी पिछली 5 मार्च को आयोजित हुआ था। कई नस्लें गुजर चुकी हैं मगर इस मुशायरे का आयोजन लगातार हो रहा है। असल में यह सिर्फ एक मुशायरा नहीं है बल्कि सद्भावना का एक ऐसा आन्दोलन है जो नफरतों पर भारी पड़ जाता है।

दिल्ली क्लाथ मिल (डी॰ सी॰ एम॰) के मालिक कई भाई थे। उनमें सबसे बड़े सर श्रीराम थे। उनसे छोटे सर शंकर लाल और उनसे छोटे मुरलीधर ‘शाद’ थे। सर श्री राम सौ फीसदी कारोबारी थे और उन्हें रईसों के किसी शौक़ से कोई दिलचस्पी नहीं थी बल्कि शेष दोनों भाई उर्दू के जानिसार और शायरी के आशिक़ थे।

सर शंकर लाल को शायरी का शौक था और आला तालीमयाफता तथा कई जुबानों के माहिर थे। शायरी में बाकायदा ‘बेखुद देहलवी के शागिर्द थे जो हज़रत मिज़रा देहलवी के शागिर्द थे। उर्दू शायरी में दाग़ देहलवी की शायराना विशेषताओं के आधार पर ही उन्हें उर्दू जगत में शायरी का ‘तीसरा स्कूल’ माना जाता है। इस स्कूल का शायराना रंग, शब्द, लहजा और फिक्र सब अद्भुत है। शायरी में पारंगत लोग इसी से फनकार की वाबस्तगी का अदांजा लगा लेते हैं।

(हिन्दी में कवियों की इस तरत की कोई रवायत नहीं है अर्थात कोई प्रथा प्रचलित नहीं है। हमारे कविगण कविता का हुनर सीखने के लिए किसी की शागिर्दी पसन्द नहीं करते।)

सर शंकर लाल बड़े-बड़े मुशायरे आयोजित करते थे और रूपया पानी की तरह बहाते थे। यह फनकारों की आर्थिक सहायता का एक तरीका था।

सर शंकर लाल का जिक्र करते हुए आलीजाह सरदार कुंवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’दिल्ली) ने अपने नैनीताल प्रवास पर मुझे एक वाकया सुनाया था। वह (सहर साहब) सर शंकर लाल के साथ एक दिन उनकी गाड़ी में कहीं जा रहे थे। देहली दरवाजे से बाहर निकल कर एक मोटर उनकी कार से आगे जा रही थी। सर शंकर लाल के ड्राइवर ने अपनी कार को उस गाड़ी से आगे निकालना चाहा तो सर शंकर लाल ने उसे रोक दिया। कुंवर साहब ने कहा कि गाड़ी को ओवटेक करने में क्या हर्ज है? तब सर शंकर लाल ने बतलाया कि अगली मोटर में रायबहादुर लाडली प्रसाद (रईसे आज़म देहली)्ध जा रहे हैं। उनके बुजुर्गों ने हमारे खानदान पर बहुत एहसान किये हैं इस लिए मैं कभी उनके आगे गाड़ी नहीं बढ़ाता। यह वाकया उन नव दौलतमन्दों के मुंह पर एक तमाचा है जो दौलत के घमंड में फर्राटे भरना अपनी शान समझते हैं। दरअसल दौलत तो हर कोई कमा लेता है मगर तहजीब और अदब किसी दुकान पर नहीं मिलता।

सर शंकर लाल के भाई मुरलीधर ‘शाद’ भी शायर थे और अपने भाई के साहित्यिक अभियान में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग करते थे।

दोनों भाइयों को गुजरे हुए जमाना हो गया मगर उनकी औलादें आज भी अपने बुजुर्गाें के अभिमान को जारी रखे हुए हैं। डी॰सी॰एम॰ का यह मुशायरा पूरी दूनिया में विख्यात है और ‘शंकर-शाद मुशायरे’ के रूप में जाना जाता है। उस मुशायरे में शामिल होना बहुत बड़ी बात है। मैं सर शंकर लाल और मुरलीधरशाद के साथ-साथ उनकी औलादों की अज़मतों को भी सलाम करता हूँ।

जिन्दाबाद!