विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (बारह) सलीम लंगड़े पे मत् रो!

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
आपकी जि़हानत पर भरोसा करके सईद मिर्जा की फिल्म के नाम को इस लेख का शीर्षक बना दिया है। दूसरा कोई शीर्षक मुनासिब ही नहीं होगा। शायद इसे पढ़ने के बाद मेरे ख्याल से आप इत्तेफाक कर जायेंगे।
एक वल्र्ड कप क्रिकेट स्टार ऐसा भी
गुजराज स्थित अरावली जनपद के गांव पिपरा के खेतों में भैंस चराने वाला यह नेत्रहीन व्यक्ति 1998 में आयोजित नेत्रहीनों के क्रिकेट वल्र्डकप का स्टार खिलाड़ी ‘भाला जी डामोर’ है। 38 वर्षीय ‘डामोर’ आलराउण्डर खिलाड़ी है। वह सर्वाधिक 150 विकेट लेने वाला तेज गेंदबाज है। बल्लेबाज के रूप में उसने 3000 से ज्यादा रन बनाने का रिकार्ड बनाया है। उपरोक्त वल्र्डकप में अंधों की यह भारतीय टीम सेमीफाइनल खेल चुकी है। ‘डामोर’ को इस टूर्नामेन्ट का सर्वश्रेष्ट खिलाड़ी माना गया था।
तत्कालीन राष्ट्रपति के0 आर0 नारायणन ने भंेट के दौरान उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।
डामोर के पास थोड़ी जमीन है जिसमें खेती होती है। उसकी पत्नी खेत में काम करती है और वह खुद जानवर (भैंस) चराता है।
भारत के अमीरों की सूची में शामिल क्रिकेट खिलाड़ी महेन्द्र सिंह धौनी ने क्रिकेट से अपार धन सम्पदा अर्जित की है। दूसरे क्रिकेट खिलाडि़यों पर भी बड़ी-बड़ी कम्पनियां मेहरबान रहती हैं। राज्यों द्वारा किसी मैच के जीतने पर क्रिकेट खिलाडि़यों पर धन-वर्षा की जाती है परन्तु देश का नाम रौशन करने वाले और अंधों की क्रिकेट टीम के सदस्य के रूप में वल्र्ड रिकार्ड बनाने वाले इस भारतीय नेत्रहीन खिलाड़ी को कोई पूछने वाला नहीं है। अब ऐसे अंधों के क्रिकेट को न कोई ललित मोदी मिलता है और न वहां ग्लैमर के तड़के के रूप में ‘नंगी-लौंडियाँ’ होती हैं।
आंख वाले क्रिकेट खिलाडि़यों से धन कुबेरों की यारी और नेत्रहीन खिलाडि़यों से बेजारी!! इस तरह का कमीनापन केवल हम ही कर सकते हैं। कमीनेयन का वल्र्ड रिकार्ड भी हमारे नाम होना चाहिए।
व्हाटस् एप -वाह! वाह!
व्हाटस् एप पर केवल भारत में ही सत्तर मिलियन यूजर्स हैं। एक संदेश को ग्रुप नेटवर्क द्वारा कितने लोगों तक पहुंचाया जा सकता है इसका अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं।
हम भारतवासी ‘धार्मिक’ कम हैं, ‘धर्म धुरन्धर’ ज्यादा हैं। हम धर्म के अनुसार आचरण नहीं करते, केवल धर्म का उपयोग ‘फसाद’ फैलाने में करते हैं।
व्हाटसएप पर एक संदेश यह है कि- ‘‘राजस्थान से गायों को ट्रक में भरकर कुछ गौ-तस्कर गुजरात ला रहे हैं।’’
एक वर्ष से यह संदेश लगातार चल रहा है परन्तु वह ट्रक आज तक गुजरात नहीं पहुंचा है। इसे कहते हैं ‘बारूद में चिंगारी’।
खेत को बाड़ खा गयी
राजनीति की बिसात पर सीधे-साधे लोगों को उल्लू बनाकर बादशाही करने का हुनर सबको मयस्सर नहीं होता। आजादी के पश्चात् से अब तक खुदा जाने कितने घोटालों, बद-उनवानियां और मक्कारियां सियासत के इन्द्रजाल में उलझकर चकरघिन्नी हो चुकी हैं।
अन्ना हजारे ने परिस्थितियों का फायदा उठाकर चार साल पहले चालाकी का जो चरखा चलाया था उसे समझने से पहले ही लोग पागलों की तरह उसके पीछे दौड़ पड़े। आगे चलकर इस जादुई तमाशे की कोख से राजनीति के कई राजकुमार पैदा हो गये। अरविन्द केजरिवाल इस तमाशे से निकल कर आगे आये।
2008 में मेरे पुत्र सय्यद काशिफ जाफरी ने अपनी मीडिया मुलाजमत के दौरान मुझसे अरविन्द केजरीवाल साहब की खूब तारीफ की। उनका व्यक्तिगत मोबाइल नम्बर देकर मुझे उनसे सम्पर्क रखने की उन्होंने सलाह भी दे दी। खुदा का शुक्र है कि मुझे आज तक ऐसी कोई जरूरत नहीं पड़ी। राजनीति में मैंने बहुत कम वक्त में सब कुछ देख लिया। 1977 से राजनीति में सक्रिय हुआ और 1982 में मैंने राजनीति पर लानत भेज दी। अपने पांच साल के अनुभव में मैंने पाया कि सड़क पर मिट्टी डालने वाला मजदूर कैसे ठेकेदार बन जाता है और चन्द बरसों में मंत्री बन जाता है। इस मुल्क में सुब्रयराम (सहारा), विजय माल्या और पोंटी चढ्ढा बनना आसान है मगर लाल बहादुर शास्त्री बनना बहुत मुश्किल बल्कि नामुमकिन है।
जनता का खून चूसने वाले भ्रष्टाचारियों के खिलाफ ‘जंग’ छेड़ने वाले अन्ना हजारे की आवाज पर शोषित वर्ग दौड़ पड़ा। उसे महसूस हुआ कि हमारे दुखों को दूर करने वाला आ गया है और यह मसीहा रातों रात भारत से भ्रष्टाचार समाप्त कर देगा और फिर सब लोग खुशहाल हो जायेंगे।
मेरा मानना है कि भारत में भ्रष्टाचार पर कभी कोई अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा। भ्रष्टाचारी इतने ताकतवर और ज़हीन हैं कि संविधान भी उनके सामने बौना है और कानून उनके दरवाजे का गुलाम है। मेरा यकीन है कि भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बेहतरीन संविधान है, मगर उपयोग गलत है। हमारे राजनेता इस संविधान को रात-दिन च्यूंगम की तरह चबा-चबाकर मुस्कुराते रहते हैं। उन्हें मालूम है कि उनके घोटालों की जांच करते-करते कानून वाले खुद ही अपनी मौत आप मर जायेंगे मगर किसी कानूनी जांच में कभी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकेंगे। वोट बैंक खतरे में पड़ा तो ‘जांच आयोग’ बनाकर खुश कर दिया। ज्यादा शोर मचा या हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट तक कोई मामला गया तो ‘सी0 बी0 आई0’ जांच बैठा दी। अदालतें निगरानी कराती हैैं।
आजादी से आज तक न जाने कितनी जांचें सी0 बी0 आई0 ने की होंगी और न जाने कितने आयोगों की रिपोर्ट सरकार की ड्यूढ़ी पर फना के घाट उतर चुकीं होंगी। मगर कभी भी जिम्मेदार ऊँचे ओहदे वाले के खिलाफ किसी अदालत ने कोई कार्यवाही नहीं की।
ऊँची कुर्सी पर बैठने वाला अगर ईमानदार होगा तो नीचे का अमला घोटाले का हिम्मत नहीं कर सकेगा
पहले जांच होगी। जांच करने वाला या कराने वाले इसी समाज के हैं। जिसके खिलाफ जांच होगी उनके सम्बन्धी जांच कत्र्ताओं में हैं। जांचकत्ताओं के आका राजनीतिज्ञ हैं। राजनीतिज्ञों के खिलाफ जांच गलत है और राजनीति से प्ररित है। नेता जी की दलील पर जज साहब भी सकते में आ गये।
अब मामला बड़े ओहदे वाले का। उसके खिलाफ जांच की मांग करने वाला दो चार दिन में ही हांफने लगता है। उसके खिलाफ जांच की अनुमति उससे बड़े स्तर के अधिकारी से लेनी होगी, उस पर भी जांच की अनुमति का अप्रूवल माननीय मंत्री जी दंेगे। यह सब इतना आसान नहीं है।
सीधी सी बात है कि जांच प्रक्रिया की जटिलता के चलते कोई अदालत किसी को सजा नहीं दे पायेगी। भ्रष्टाचार ‘अंगद’ का पांव है, कोई नहीं उखाड़ सकता।
कोयला घोटाला, व्यापम घोटाला, एन0 आर0 एच0 एम0 घोटालों की जांच अन्तहीन रात है जिसकी सुबह नहीं।
कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े की कार्य प्रणाली ने सबको हैरत में डाल दिया था। कार्यकाल समाप्त तो सनसनी समाप्त।
अब उनके स्थान पर मौजूद लोकायुक्त जस्टिस भास्कर राव की महानता उनके पुत्र द्वारा जग जाहिर है। वह नौकरशाहों को छापा डलवाने की धमकी देकर एक करोड़ की मांग करते हैं। शिकायतें मिलीं तो पुलिस के एक अफसर ने उनके बेटे के खिलाफ जांच कर धोखा-धड़ी की रिपोर्ट दर्ज करा दी। अब जांच दल बन गया है। जिसकी जांच से सब घबराते हैं। उसी की जांच हो रही है। अन्ना हजारे का लोकपाल या लोकायुक्त इस कैंसर से कैसे लड़ेगा?
अदालतें हैरान हैं और परेशान भी!!
पता कैसे चले, दुनिया को मेरे दिल के जलने का!
धुऐं को रास्ता मिलता नहीं, बाहर निकलने का!!
क्रमशः