विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? ;बीस कुमाऊँ के पहाड़ों से गुजरात के साहिल तक

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
थियेटर जगत से मेरा कभी कोई नाता नहीं रहा। मेरी पृष्ठभूमि, शिक्षा-दीक्षा और पूरी तरबियत रूहानी और खानकाही है। ‘मंच थियेटर ग्रुप’ नैनीताल के डायरेक्टर और सिने अभिनेता श्री इदरीस मलिक के आवाहन पर थियेटर से रूबरू हुआ। यह मेरी तरबियत के विपरीत था। यह एक विवादास्पद और अनुसंधान का विषय है कि सबसे पहले थियेटर का जन्म कहां हुआ? कुछ प्राचीन और पौराणिक धर्मकथाओं के मंचन से हमें प्राचीन सभ्यताओं और विभिन्न धार्मिक मूल्यों का सुराग जरूर मिल जाता है। बचपन में घरेलू तालीम के दौरान पारिवारिक निर्देशानुसार मैंने प्राचीन सभ्यताओं का थोड़ा अध्ययन किया था। आगे चलकर दिलचस्पी बढ़ी तो विषय व्यापक हो गया और मैंने ‘नीग्राइड’, ‘प्रो-आस्ट्रेलाइड’, ‘आस्ट्रिक’ और ‘द्रविड़’ जातियों के विषय में कुछ जानकारी प्राप्त की। इनका धर्म और उसका स्वरूप स्पष्ट नहीं है परन्तु जो इशारे मिलते हैं उनसे एक दिशा में कुछ निष्कर्ष निकालकर इतिहास का निर्माण हो गया। मेरा ख्याल है कि थियेटर का सिरा इनसे जा मिलता है। नैनीताल में मंच थियेटर द्वारा मंचित फ्रांसीसी नाटक ‘शहंशाह एडिपस’ को देखने के पश्चात मुझे अपने बचपन की तालीम के दौरान पढ़ी गयी धार्मिक कथाओं के कुछ अंश याद आने लगे। इस कहानी से मैं अपने पूर्व धार्मिक अध्ययन के आधार पर परिचित था परन्तु इसके किरदारों के नाम मेरे लिए अजनबी थे। थियेटर से मेरी दिलचस्पी का एक सबब यह भी है कि यह मेरे अध्ययन का नवीनतम विषय था। इस विवरण को प्रस्तुत करने की मंशा यह है कि मैं थियेटर से अपना ताल्लुक स्पष्ट कर सकूं।
‘वेस्टजोन कल्चरल सेन्टर’ के आमंत्रण पर मंच थियेटर का दल अपने गुजरात भ्रमण की तैयारी कर रहा था, मुझे भी शामिल कर लिया गया। गुजरात में थियेटर व्यस्तताओं के साथ-साथ मैं गुजरात की ;विशेष रूप से अहमदाबादद्ध की उन दरगाहों में हाजिरी देना चाहता था जिनसे मेरे पिता ;हजरत सय्यद इरशाद मियां हुजूरद्ध का सम्बन्ध रहा। गुजरात और दक्कन ;दक्षिणद्ध में भारतीय सूफी इज्म़ के अनेक पुराने केन्द्र ;खानकाहेद्ध मौजूद हैं और बा-असर ;प्रभावशालीद्ध हैं।
15 सितम्बर को 33 सदस्यीय दल की रवानगी से तीन रोज पहले ;12 सितम्बरद्ध अन्तर्राष्ट्रीय थियेटर जगत की जबरदस्त शख़सियत ‘‘फ्रेंक डि गिलराॅय’’ का मुनरो ;न्यूयार्क, अमेरिकाद्ध में निधन हो गया। उनके विषय में शायद उच्चस्तरीय थियेटरिस्ट ही जानते होंगे वरना साधारणतया लोगों ;जिनमें नाटककार भी सम्मिलित हैंद्ध को उनके विषय मंे जानकारी नहीं है। उनका निधन थियेटर जगत के लिए अपूर्णीय क्षति है।
बेहतर होगा कि गुजरात दौरे के विषय में बाद में बात करें पहले ‘फ्रेंक डि गिलराॅय’ के बारे में थोड़ा जान लें, इससे कुछ अनभिज्ञ नाटककारों को जानकारी मिल जायेगी।
उनका जन्म 1926 में हुआ था। 1943-1946 तक सेना में योरोपीय थियेटर में अपनी सेवाऐं देने वाले गिलराॅय को ‘‘द सब्जेक्ट वाज़ रोजे़ज़’’ के लिए पुरस्कार से भी सम्मनित किया गया था। इस नाटक का प्रीमियर 1964 में हुआ था। इसकी अपार सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने इसी नाटक पर आधारित एक फिल्म लिखी जिसमें शानदार अभिनय के लिए जैक अलबर्टसन और पेट्रोसिया नील को सर्वश्रेष्ट सह अभिनेता एवं अभिनेत्री के वर्ग में आॅस्कर पुरूस्कार के लिए किया गया था और इस में जैक अल्बर्टसन ने बाजी मार ली थी।
गिलराॅय सफल नाटककार के अतिरिक्त सफल पटकथा लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने कई वर्षाें तक टेलिविजन कार्यक्रमों और फिल्मों की पटकथाऐं भी लिखीं। वह ‘स्टुडियो वन इन हाॅलीवुड’ और ‘प्लेहाउस-90’ जैसे कार्यक्रमों और ‘द गैलेटं आर्स’ तथा ‘द फास्टेस्ट गन अलाइव’ जैसी फिल्मों की पटकथा लिखी। ‘डेस्पेरेट कैरेकटर्स’ नामक फिल्म का निर्देशन भी किया। उनके तीन बेटे हैं और सभी हाॅलीवुड फिल्म उद्योग से जुड़े हैं।
आश्चर्य की बात है कि भारत के नाटक जगत में से किसी ने भी उनके निधन पर श्रðांजलि देने की जरूरत महसूस नहीं की। ठीक भी है कि ‘हजारों मरते हैं कौन किस-किस का हिसाब रखे।’ चलिए! मैं सबकी तरफ़ से उन्हें श्रðांजलि दे देता हूँ।