विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (सत्ताईस) टीपू सुल्तान की जयंती

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
इस लेख को पढ़ने तक अधिकांश लोग यह खबर भूल चुके होंगे कि कर्नाटक में मैसूर के शासक ‘टीपू सुल्तान’ की जयंती मनाने के राज्य सरकार के फैसले ने हिंसक रूप लेकर फसाद फैला दिया। बेंगलुरू के निकट ‘कोडागू’ जिले में निषेधाज्ञा लागू कर दी गयी। हिंसा में पत्थर लगने से विश्व हिन्दू परिषद के स्थानीय नेता ‘कुतरपा’ की मौत हो गयी जबकि पुलिस कर्मियों सहित अनेक लोग घायल हो गये।
कर्नाटक सरकार ने 10 नवम्बर को टीपू सुल्तान की जयंती मनाने का निर्णय लिया था, जिसका समर्थन भी हुआ और विरोध भी। दरअसल हमारा इतिहास दोनों तरह से लिखा गया है। प्रसिð इतिहासकार नित्यानन्द मिश्रा के अनुसार ‘‘इतिहास 90 प्रतिशत अनुमान है और 10 प्रतिशत वास्तविकता।’’ देशी-विदेशी अनेक इतिहासकारों ने भी यही राय व्यक्त की है। हमारे 1000 वर्ष के इतिहास का एक बहुत बड़ा भाग प्राचीन पाण्डुलिपियों और दस्तावेजों की शक्ल में अभी तालों में बन्द है और कभी-कभी किसी गहन शोधार्थी के जुनून की वजह से उसका कोई भाग हम तक पहुंच जाता है। आपको मेरी इस बात से इत्तेफाक करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि यदि सरकारी पुरातत्व विभागों, राजाओं, नवाबों और खानदानी रईसों के निजी पुस्तकालयों से समस्त दस्तावेज निकालकर उन्हें ‘इतिहास’ की शक्ल दे दी जाय तो वह मौजूदा भारतीय इतिहास और इलियट एण्ड डाउसन द्वारा लिखित ‘संकीर्ण इतिहास’ से यकीनन भिन्न होगा। इस तरह की कोई संजीदा कोशिश कभी नहीं की गई। अब तक इतिहास में जो भी शोधकार्य हुए हैं वह नाकामी और लचर सन्दर्भांे पर आधारित हैं। उपलब्ध प्रमाणों को दरकिनार करते हुए अपनी किसी राय को इतिहास का स्वरूप देना हास्यास्पद और खतरनाक है।
हमारा सियासी मिज़ाज यह है कि हम धर्म के अनुसार आचरण करना उचित नहीं समझते। अलबता बड़ी चालाकी से उस अवसर की ताक में रहते हैं कि सियासत की जरूरत के लिए धर्म का इस्तेमाल कैसे किया जाय? हम ;सभी धर्मावलम्बीद्ध धर्मधुरन्दर ज्यादा हैं, धार्मिक कम हैं। पैगम्बर इस्लाम हजरत मुहम्मद (स0ऊ0व0) के बताये मार्ग पर चलने वाला सच्चा मुसलमान अपने पड़ोसी और समाज की भावनाओं का सम्मान करेगा। इसी प्रकार वैदिक मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी हिंसक इसलिए नहीं हो सकता कि वह गाय, गणेश और गायत्री मंत्र को अपने जीवन में उतार चुका है। ‘अलखलको अयालललाह’ ;तमाम दुनिया अल्लाह का परिवार है।द्ध और
सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामया
का जाप उसे अपने सदमार्ग से हिलने ही नहीं देगा।
अब चन्द बातें ‘टीपू’ के बारे में।
डा0 हरप्रसाद शास्त्री ने अपनी इतिहास पोथी में लिखा है कि तीन हजार ब्रहमणों ने इस लिए आत्म हत्या कर ली कि टीपू उन्हें बल पूर्वक मुसलमान बनाना चाहता था।
अनेक इतिहास पुस्तकों में उसे धर्मान्ध और क्रूर शासक साबित किया गया है।
एक अन्य इतिहासकार प्रोफेसर श्री कान्तिया ने 156 मन्दिरों की सूची प्रस्तुत की है जिन्हें टीपू ने जागीरें प्रदान की थीं। श्री कन्टेश्वर मन्दिर को हीरों का हार और एक मुकुट भी उसने भंेट किया था। यह वर्तमान मंे भी पुजारियों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। इसी मन्दिर को शिवलिंग भेंट किया गया था जिसे ‘पादशाह लिंग’ कहते हैं। श्रंगेरीमठ के जगद गुरू शंकराचार्य को लिखे गये 30 पत्र भी सुरक्षित बताये जाते हैं। कई मन्दिरों में टीपू के नाम से पूजा भी होती है।
इस प्रकार दोनों तरह के इतिहास मौजूद हैं। क्या इतिहास में से कोई ऐसा मार्ग ढूंढा जा सकता है जो हमारी वर्तमान नस्ल की गला काट डालने, पत्थरबाजी करने और खून-खराबा करने से रोक दे?
उल्लेखनीय है कि हैदर अली और टीपू सुल्तान की सल्तनत का दौर 1761 से शुरू होकर मात्र 38 वर्ष में 1799 में समाप्त हो गया।