विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (सत्रह) 137 ‘मुस्लिम नेता’ कहाँ हैं?

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
वर्ष 2002-07 के दौरान नारायण दत्त तिवारी जी ने उत्तराखण्ड में अपने मुख्यमंत्रित्व काल में पूरे उत्तराखण्ड से 137 मुस्लिम नेताओं को छाँट कर ‘मसीहा’ के रूप में अपनी ‘कौम’ का कायाकल्प करने की जिम्मेदारियां प्रदान की थीं। केन्द्र और राज्य सरकारें (किसी भी दल की) अल्पसंख्यकों, दलितों तथा पिछड़ों के विकास और उन्नति के बेहतर अवसर प्रदान करने के लिए सदैव प्रयासरत रही हैं। यह दुर्भाग्य है कि उनके प्रतिनिधि सरकारों के तलवे चाटने के चक्कर में कोई निर्णायक भूमिका नहीं निभा सके। आज भी वही पुराना रोना-चिल्लाना और विलाप करना कि ‘‘हमारा विकास नहीं हो रहा है’’ का अक्सर शोर सुनाई देता रहता है। उत्तराखण्ड के जागरूक और पढ़े-लिखे मुस्लिम विचारक आज तक तत्कालीन 137 ‘मुस्लिम माननीयों’ में से अधिकांश से परिचित नहीं हैं। उक्त को लाल रंग की बत्तियां दी गई थीं ताकि उसकी रोशनी में वह मुस्लमानों के विकास की संभावनाओं को खोज सकें। कुछ को ‘निदेशक’ के ओहदों पर बैठा दिया गया था। कौम का दर्द रखने वाले और स्वयं को मुसलमानों का मसीहा समझने वाले स्वयं-भू नेता कहाँ गुम हो गये हैं। अगर किसी को कहीं मिल जायें तो ड्डपा करके माननीय हरीश रावत जी को अवश्य अवगत करा दें। उन्हें विकास नीति से अनभिज्ञ मुस्लिम नेताओं की बड़ी जरूरत है। रावत जी अच्छे आदमी हैं। बेचारे रमजान में हर साल कई कुन्तल खजूरे मदरसों में बंटवाकर मुसलमानों का विकास करते रहते हैं। अनेक विभागों में काफी काम है। शायद कई लोग कुछ काम कर भी रहे होंगे। जरा पिछला नमूना समझ लीजिए-
15 सूत्री कार्यक्रम
(अल्पसंख्यकों के लिए)
वर्ष 1984 में केन्द्र सरकार ने एक साधारण सर्कुलर जारी करके मुसलमानों के लिए चलाई जा रही योजनाओं का लाभ प्रदान करने हेतु निर्देश दिये थे। सरकार के ‘‘डुग-डुगी’’ विभाग ने इतना हल्ला मचाया जैसे कोई ‘नया संविधान’ लागू हो गया हो। इस पत्र के आधार पर खूब बेवकूफ बनाया गया। इस बेतुकी संस्था में एक मुसलमान को अध्यक्ष और 108 को सदस्य बनाया गया। 13 जिलों में इन 108 सदस्यों ने कितनी योजनाएंे बनायी और कितनी योजनाओं से मुसलमानों का विकास हुआ इसका कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है। अलबत्ता कई लाख रूपयों को जरूर बर्बाद कर दिया गया।
हज कमेटी
2002-07 में बनायी गयी हज कमेटी में 11 मुस्लिम नेता मनोनीत किये गये थे। अपनी मुद्दत के आखिरी दिनों में एक ‘स्टिंग आॅपरेशन’ के जरिये इस कमेटी के अध्यक्ष जेल की हवा खाकर और बदनामी का हार डालकर रूखसत हो गये थे। कुछ मुस्लिम नेताओं ने सरकारी पैसे से हज करने में सफलता प्राप्त कर ली थी।
अल्प संख्यक आयोग
इसमें मनोनीत मुसलमानों के ‘मसीहा’ मुसलमानों की समस्याओं का कितना समाधान कर सके, इसका कोई ब्योरा मौजूद नहीं है।
वक्फ वित्त विकास निगम
इस निगम की करोड़ों की धनराशि से मुसलमानों का कितना आर्थिक विकास हुआ? इसका अंदाजा नहीं है। हम अभी तक उन मुसलमानों को ढूंढ़ रहे हैं जिन्हें इस निगम के माध्यम से आर्थिक विकास की बुलंदियां प्राप्त हो गयी हैं।
वक्फ बोर्ड
9 मुसलमान मनोनीत किये गये थे। वक्फ़ जायदादों पर अवैध कब्जों के खिलाफ आई0 पी0 सी0 और सी0 आर0 पी0 सी0 की लगभग एक दर्जन धाराऐं हैं। जिन पर कार्यवाही कर दी जाये तो जेल निश्चित है परन्तु करोड़ों रूपये की वकफ़ सम्पत्ति पर उल्टा नाजायज कब्जे करा दिये गये।
मुस्लिम एजूकेशन मिशन
इस मिशन में वल्र्ड बैंक का पैसा घुसा कर कुछ मौलानाओं को सहूलियतें प्रदान कर दी गयीं और कुछ मदरसों को आर्थिक सहायता तथा कम्प्यूटर दे दिये गये। जो मदरसों के कमरों मेें वर्षाें तक धूल फांकते रहे।
जाहिलों की जमाअत पढे़-लिखों पर हमेशा भारी पड़ती है, इसलिए यहां भी ऐसा ही हुआ।
इस तफसील (विवरण) के माध्यम में सिर्फ यह अवगत कराना चाहता हूँ कि इस तरह की भ्रमित राजनीति से क्या मिला? कई करोड़ रूपया जो जनता ने सरकार को टैक्स के रूप में दिया था, वह बर्बाद कर दिया गया। इस पैसे से पहाड़ के कई गांवों में पानी पहुंचाया जा सकता था। कई गावों में शौचालयों की व्यवस्था की जा सकती थी और कई गावों में खेल के मैदान विकसित किये जा सकते थे। मेरा मकसद विकास है। गांव विकसित होंगे, तो क्षेत्र का विकास होगा। क्षेत्र विकसित होंगे तो जिलों का विकास होगा और जिलों का विकास स्वयं उत्तराखण्ड राज्य के विकास की सबसे बड़ी दलील होगी। विकास का मतलब हिन्दू या मुसलमान नहीं होना चाहिए। सभी वर्गों के समान विकास से ही, विकास का सपना साकार होगा।