विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (सैतीस) ”ऐनी आपा’’ का ‘‘आग का दरिया“

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (सैतीस)
”ऐनी आपा’’ का ‘‘आग का दरिया“
आबाद जाफ़री, नैनीताल-
मुझे उपन्यास पढ़ने का शौक कभी नहीं चर्राया। अलबत्ता इब्ने-सफ़ी बी.ए. के जासूसी नाविलों ने मेरी उम्र के लोगों पर लगातार कई वर्षो तक शासन किया है। मैंने भी कर्नल फरीदी, कैप्टन हमीद और अली इमरान की सीरीज के कई दर्जन नाविल पढ़े है। यह साहित्य के लिए अलग सवाल है कि जासूसी नाविल उपन्यास साहित्य में क्या मुकाम रखते हैं? सच पूछिए तो मैंने पूरे जीवन में सिर्फ तीन उपन्यास पढ़े है ”जहाज का पंछी’’, ”एक शहर की मौत“ और ‘‘आग का दरिया’’। ”जहाज का पंछी’’-इला चन्द्र जोशी का हिन्दी उपन्यास है, ”एक शहर की मौत“-अमृता प्रीतम का मशहूर नाविल है और ‘‘आग का दरिया’’ कुर्रतुल ऐन हैदर का उपन्यास है। यह तीनों उपन्यास अलग-अलग पृष्ठभूमि पर हैं परन्तु उनमें एक अहम समानता यह है कि तीनों नाविल मानवीय संवेदनाओं, संघर्षों और आदर्शों की ला-जवाब दास्तान है जो कभी खत्म नहीं होगी, अलबत्ता दौर और किरदार जरुर बदल जायेंगे। मुझे तसलीम है कि मैं अमृता प्रीतम का उपन्यास दो बार पढ़ने के पश्चात् भी पूरी तरह समझने और अपने जहन में उतारने में नाकाम रहा। जिन लोगों ने अमृता प्रीतम का उपन्यास ‘एक शहर की मौत’ नहीं पढ़ा है वह जरुर पढ़े और नाम से उसे कोई ‘जासूसी नाविल’ न समझ बैठें। अलबत्ता उसे पढ़ने से पहले विभिन्न सभ्यताओं का पहले अध्ययन कर लें। वरना उसके अध्ययन का आनन्द अधूरा रहेगा।
अपने जमाने की प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्रिका ””अल्स्टेटिड वीकली“ पढ़ने का शौक जिन लोगों को रहा है वह उर्दू की महान साहित्यकार ”कुर्रतुल ऐन-हैदर“ से जरूर वाकिफ होंगे। उर्दू अदब में वह आलातरीन और मुमताज मुकाम रखती हैं। हिन्दुस्तानी साहित्य में ‘‘आग का दरिया’’ को जो प्रसिद्धि और लोकप्रियता प्राप्त हुई वह किसी भी हिन्दुस्तानी भाषा के उपन्यास को नसीब नहीं हुई। यही वजह है कि इस उपन्यास का नाम ‘‘ज्ञानपीठ’’ पुरूस्कारों में सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ है।
‘आग का दरिया’ उपमहाद्वीप की ढाई हजार वर्ष की पृष्ठिभूमि के विस्तृत कैनवास पर फैला हुआ है। पूरा नाॅविल चार कालों में विभाजित है। इसके कुछ किरदार चारों भागों मंे समान से सामने आते है। जैसे गौतम, शंकर और चम्पा। पूरी कहानी बुद्वमत की उन्नति , ब्रह्मजवाद की अवनति से शुरू होकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के टकराव तक पहुंचती है, अन्ततः देश विभाजन पर समाप्त होती है।
उपन्यास का प्रथम काल चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल से सम्बन्धित है (अर्थात् लगभग चार सौ वर्ष ईसा पूर्व)। दूसरा काल भारत में लोदी सलतनत के अन्त और मुगलों के आगमन से आरम्भ होता है। तीसरा काल ईस्ट इण्डिया कंपनी का है। चैथाकाल बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में उभरने वाली राजनीति और सामाजिक परिवर्तनों की उथल-पुथल और आन्दोलनों के कुछ किरदारों का जायजा लेते हुए देश विभाजन (1947) पर समाप्त होता है।
प्रथम काल की हीरोइन ‘चम्पक’ एक मंत्री की पुत्री है लेकिन जिस राजकुमार के साथ उसकी मंगनी हुई और जिसे वह प्यार भी करती है वह राज-पाट छोड़कर बौद्ध भिक्षु बन जाता है।
दूसरे दौर में यही औरत अयोध्या के एक पंडित की बहन के रुप में सामने आती है। उस समय मुगल सल्तनत थी। पहले दौर की चम्पक , इस दौर में चम्पावती है जो एक दरबारी मुस्लमान विद्वान मंसूर के इश्क में मुबतिला हो जाती है और मंसूर को पाने के लिए धर्म परिवर्तन पर तैयार हो जाती है। दुर्भाग्य से भ्रमण पर निकला हुआ मंसूर कभी वापस नहीं आता। चम्पावती उसके इंतजार में पूरा जीवन गुजार देती है और अंत में सन्यासन बनकर जंगल में तप करने लगती है।
तीसरे काल में यही औरत अवध की एक चालाक तवाइफ़ के रूप में सामने आती है। इसकी महफिल में अंग्रेज, नवाब, राजा, जमींदार सब शामिल होते हैं। यह उस काल की संस्कृति का हिस्सा है। इस काल में भी मंसूर नामक व्यक्ति मौजूद है लेकिन तवाइफ़ को गौतम नीलाम्बर नामक व्यक्ति से इश्क हो जाता है जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी का मुलाजिम है। गौतम कलकत्ते जाता है तो वापस नहीं लौटता और तवाइफ़ चम्पा जान बूढ़ी होने के पश्चात उसी स्टेशन पर भीख मांगने लगती है, जहां गौतम ने मिलने का वायदा किया था।
चैथे और अन्तिम काल की चम्पा अहमद एक मुस्लिम लीगी वकील की पढ़ी लिखी बेटी है। इंग्लैण्ड में शिक्षा ग्रहण करने के दौरान उसे मिस्टर एश्ले से प्यार हो जाता है परन्तु वह इश्क परवान नहीं चढ़ता। भारत आकर उसे नीलाम्बर से प्यार हो जाता है लेकिन दोनों का मिलन नहीं हो पाता। वह अपने पैतृक घर बनारस लौट आती है। इस दौर में भी मंसूर मौजूद है जो चम्पा अहमद से प्यार करता है लेकिन जब केम्ब्रिज से लखनऊ वापस आता है तो वहां सब कुछ उजड़ चुका है। पुश्तैनी जायदाद जब्त हो जाती है और वह कंगाल हो जाता है।
इस पूरे उपन्यास में लेखिका ने ‘‘मंसूर’’ के किरदार के जरिए तीन विभिन्न कालों की संस्कृति, सामाजिक उथल-पुथल , भक्ति आन्दोलन, प्रथम स्वतन्त्रता आन्दोलन का संघर्ष तथा जमीदारी जीवन को रेखांकित किया है। तत्कालीन भाषाओं, शब्दों , शैलियों और परम्पराओं की कशमकश के दरम्यान देश के बटवारे पर आकर उपन्यास समाप्त हो जाता है।
इस उपन्यास का हुस्न यह है कि भारतीय सभ्यता की कभी न खत्म होने वाली जड़ें और तहजीब की अनगिनत परतों से रूबरू कराते हुए पाठक को चिन्तन-मनन पर विवश कर देता है।
आज के जमाने मंे कुछ लोगों को यह उपन्यास उबाऊ लग सकता है लकिन देश के इतिहास, प्राचीन सभ्यता , सामाजिक ताने-बाने और तत्कालीन अर्थात् 2500 वर्ष का लेखा-जोखा रखने वाले उपन्यास के किरदारों से बेहद प्यार करते हुए नज़र आयेंगे।
इस शेर के साथ रूखसत होता हूँ-
अब वह मौसम कभी न आयेगा,
सब्ज़ पत्तों को मत तका कीज्ए।