विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? (सोलह) तिब्बती शरणार्थियों का अन्तर्राष्ट्रीय समाज

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
तिब्बत पर चीन के आक्रमण के पश्चात् तिब्बती शरणार्थियों को सुरक्षित जीवन के लिए जिस प्रकार दर-दर भटकना पड़ा, उसका दर्द तिब्बती समुदाय में आज भी देखा जा सकता है।
1959 के पश्चात् इस समुदाय के लोगों ने अपना देश छोड़कर शरणार्थी के रूप में भारत की ओर कूच किया। भारत में इन्हें काफी महत्व दिया गया। मानवीय आधार पर तिब्बती शरणार्थियों को भारत में सम्मान और स्थान अवश्य मिला परन्तु तत्कालीन भारत सरकार ने अपनी विदेश नीति के तहत तिब्बत पर चीनी आक्रमण की अपनी प्रतिक्रिया इस आधार पर व्यक्त करने से गुरेज किया कि यह चीन के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप है।
2 सितम्बर 1957 ई0 को वर्तमान प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने लोक सभा में विदेश नीति पर अपना पहला भाषण देते हुए भारतीय विदेश नीति की कटु आलोचना की थी। 8 मई 1959 को लोक सभी में तिब्बत की स्थिति पर चर्चा के दौरान ध्यान आकर्षण प्रस्ताव पर बोलते हुए अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था:-
‘‘तिब्बत क्यों स्वतंत्र नहीं रह सकता? कहते हैं पहले स्वतंत्र नहीं था, तो क्या जो देश पहले स्वतंत्र नहीं था, उसको स्वतंत्र होने का अधिकार नहीं हो सकता? अगर ‘अल्जीरिया’ की स्वतंत्रता का हम समर्थन कर सकते हैं और वह समर्थन करना फ्रांस के अंदरूनी मामलों में दखल देना नहीं है तो तिब्बत की स्वतंत्रता का समर्थन चीन के अंदुरूनी मामलों में दखल कैसे हो सकता है? चीनी साम्राज्यवादी अपने पशुबल के द्वारा तिब्बत की स्वतंत्रता की आवाज को आज दबा सकते हैं मगर स्वतंत्रता की पिपासा को मिटाया नहीं जा सकता!’’
तिब्बती शरणार्थियों के विषय में 17 मार्च 1960 ई0 को लोक सभा में अटल जी ने पुनः कहा था:-
‘‘तिब्बती रिफ्यूजी दुर्भाग्य के मारे हमारे देश में आये हैं। मैं समझता हूँ कि उनके बसाने मात्र को हम अपने कत्र्तव्य की इतिश्री नहीं समझ सकते। ........... देश की जनता समझती है कि तिब्बत के प्रति हमारा नैतिक कत्र्तव्य क्या है?’’
उपरोक्त उद्धरणों के माध्यम से मैं यह स्पष्ट करना चाहता था कि तिब्बती शरणार्थियों के भारत में आकर बसने के समय हमारी विदेश-नीति क्या थी? और उस भयावह वातावरण में तिब्बती समुदाय की मनोस्थिति क्या रही होगी? निश्चित रूप से तिब्बती शरणार्थी भारत में अपना संगठित समाज बनाने में बहुत कठिन परिस्थितियों से गुजरे होंगे।
आज भारत में लगभग दो लाख बीस हजार तिब्बती शरणार्थी हैं। 1959 ई0 के पश्चात् धीरे-धीरे तिब्बती शरणार्थी योरोपीय देशों, पश्चिमी देशों की ओर जाकर बसने लगे, अनुमान है कि दुनियाँ के अन्य देशों में 5000 (पाँच हजार) से अधिक तिब्बती शरणार्थी हैं।
स्विटजरलैण्ड में सबसे अधिक तिब्बती शरणार्थी अर्थात् 2000 (दो हजार) हैं तथा सबसे कम डेनमार्क में कुल 08 (आठ) हैं। ब्रिटेन में तिब्बतियों के बसने का दूसरा चरण 1963 ई0 के पश्चात् हुआ। आज वहाँ योरोपीय देशों में बसे तिब्बतियों का लगभग 4 प्रतिशत अर्थात् 200 की संख्या है।
ब्रिटेन में बहुत कम हैं, मगर वह अध्यापन, इंजीनियरिंग, चिकित्सा विज्ञान और अकाउण्टेन्सी जैसे सम्मानित पेशों से जुड़े हुए हैं। इस समय स्वीडन में 1963 ई0 में पूर्व के 17 और बाद के 12 तिब्बती हैं। उल्लेखनीय है कि स्वीडन में तिब्बतियों को राजनैतिक शरण की सुविधा नहीं है। जो लोग हैं वह योरोप में बस चुके और वैवाहिक जीवन स्थापित कर चुके पूर्व के तिब्बती समुदाय से सम्बन्धित हैं।
तिब्बतियों की थोड़ी आबादी योरोप के अन्य देशों जैसे फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी आदि तथा सुदूर पूर्व में जापान में भी हैं। हंगरी में कुल चार (04) हैं। इनमें तिब्बती कार्यालय में कार्यरत् दो अधिकारी, एक लामा तथा एक अध्यापिका और इनमें कुछ के पारिवारिक सदस्य भी सम्मिलित हैं।
जर्मनी में तिब्बती 1963 ई0 मंे गये। आजकल वहाँ लगभग 60 तिब्बती परिवार अर्थात् 250 के लगभग लोग रहते हैं। अमेरिका में इनकी संख्या 2500 (दो हजार पाँच सौ) के लगभग है। 1990 ई0 से पहले लगभग 500 तिब्बती अमेरिका में बस चुके थे। 27 अक्टूबर 1990 को अमेरिकी कांग्रेस ने ‘एमीग्रेशन एक्ट’ पास किया जिसके कारण 1000 (एक हजार) तिब्बतियों का अमेरिका में बसना सम्भव हो सका। इनमें नेपाल से 100 (एक सौ) तथा बाद मंे 900 तिब्बती आये थे। इस समुदाय के लोग सबसे पहले ‘न्यूयार्क’, ‘एमहस्र्ट’, ‘सेनफ्रांसिस्को’ तथा ‘पोर्ट लैण्ड’ में लगभग 40 तिब्बती तथा 7 अर्धतिब्बती हैं। इसी प्रकार आस्ट्रेलिया में 150 तिब्बती रह रहे हैं। यह अधिकाशतः ‘सिडनी’ और ‘मेलबोर्न’ में हैं। पश्चिम में बसे तिब्बतियों ने भारत में बसे तिब्बतियों की भाँति ही अपनी पहचान खोई नहीं हैं। हालांकि युवा तिब्बती पीढ़ी पर अपने अभिभावकों की अपेक्षा पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव कहीं अधिक दिखाई देता है फिर भी अधिकतर युवाओं की रूचि राजनैतिक मामलों में है और वे अपने देश के प्रति वफादार भी हैं।
पश्चिम में बसे तिब्बती आज भी स्वतंत्र तिब्बत में फिर से लौटने की उम्मीद करते हैं और दलाईलामा को अपने लोकतांत्रिक देश के धार्मिक नेता के रूप में देखना चाहते हैं। भारत में पूरा इन्हें सम्मान और प्रगति का अवसर प्रदान किया जाता है। इनकी तीसरी पीढ़ी जवान हो चुकी है, मगर उनकी आँखों में परम्पावन दलाईलामा और मातृभूमि तिब्बत की चमक साफ देखी जा सकती है।
(दैनिक ‘बद्री विशाल’ दिनांक 26 फरवरी 2002 में प्रकाशित)