विचार विमर्श

पत्रकारिता.... एक नजरिया या जरिया? ;21 एक कुख्यात माँ की कुप्रतिष्ठित पुत्री राष्ट्र संघ ;17वीं वर्षगांठ पर

आबाद जाफ़री, नैनीताल-
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रों के पारस्परिक सम्बन्धों को सुव्यवस्थित करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय संगठन का होना स्वाभाविक है। आधुनिक काल के राष्ट्रसंघों की स्थापना से पूर्व भी अनवरत रूप से अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का विकास होता जा रहा है। यूनानी सभ्यता से पूर्व भारत, चीन, मिश्र, मेसोपोटामिया एवं विश्व के कुछ अन्य भागों में भी अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का पता चलता है। यूनान में नगर और राज्यों के पारस्परिक सम्बन्धों को सुदृढ़ करने के लिए ‘एमफिकटोनियोनिक परिषद्’ (Amphictyonic Council) के द्वारा संधियों, राजनयिक व्यवहारों एवं सेवाओं, पंच निर्णय एवं विवादों का शान्तिपूर्ण तरीकों से समाधान,  शान्ति के नियम आदि का व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता था। रोम के लोगों ने भी कानूनी, प्रशासकीय और सैनिक प्रविधियों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उनके द्वारा स्थापित जैशियम (Jusgentium) आगे चलकर अन्तर्राष्ट्रीय कानून का एक महत्वपूर्ण स्रोत सिð हुआ।
नेपोलियन की पराजय के बाद 1815 में आयोजित वियाना कांग्रेस की अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था ने विश्व की राजनीतिक समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रथम विश्वयुð के पूर्व योरोप और विश्व में शान्ति बनाये रखने तथा युðों को टालने के लिए , Concert of Europe ने भी उल्लेखनीय योगदान दिया।
1648 की वेस्टफेलिया कांग्रेस, 1856 में योरोपियन आयोग, 1865 का अन्तर्राष्ट्रीय टेलीग्राफ संघ, 1875 की यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन, 1886 का अन्तर्राष्ट्रीय कापीराईट संघ, 1903 का अन्तर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान तथा 1905 के अन्तर्राष्ट्रीय ड्डषि संस्थान को इसी परिपेक्ष्य में देखना चाहिए।
इस प्रकार के अन्तर्राष्ट्रीय संगठन युð को एक अपराध मानते हैं और किसी भी आक्रमणकारी के विरूð विश्व जनमत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह विश्व के छोटे-बड़े राज्यों की समानता के सिðान्त पर आधारित होते हैं। उपरोक्त वर्जित सभी संगठन क्षणिक पहचान बनाकर समाप्त होते चले गये।
बीसवीं शताब्दी में योरोपीय राष्ट्रों में साम्राज्यवादी प्रवृत्तियां अत्यन्त उग्र रूप धारण कर रही थीं। अनेक राष्ट्र उपनिवेशों को हासिल करने और अपने लिए नई मीडिया प्राप्त करने के लिए व्यग्र थे। शक्तिशाली बनने और छीन-झपटने की प्रवृत्ति के कारण योरोप दो खेमों में बंट गया। जिसकी परिणति प्रथम विश्व युð के रूप में हुई।
कुछ अमरीकी नेताओं के प्रयासों से ‘शान्ति स्थापना लीग’ नामक संस्था का निर्माण हुआ और 1915 में फिलाडेलफिया में एक सम्मेलन आयोजित कर अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था स्थापित करने का सुझाव दिया गया। 1916 मंे इसका दूसरा सम्मेलन वाशिंगटन में आयोजित किया गया। इससे प्रेरित होकर न्यूयार्क निवासियों ने ‘स्वतन्त्र राष्ट्रसंघ’ की स्थापना की। इसी दौरान योरोप में भी इसी उद्देश्य से ‘फेबियन सोसाइटी’ तथा ‘लीग आॅफ नेशन्स सोसायटी’ बनायी गयी। यहाँ यह समझना मुश्किल नहीं है कि एक ही उद्देश्य के लिए अलग-अलग अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानांे का निर्माण क्यों किया गया?
प्रथम विश्वयुð के दौरान तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विलसन ने अमेरिकी सीनेट में अपने भाषण में ‘विश्वलीग’ की स्थापना की वकालत की थी। उन्होंने इसी उद्देश्य से 8 जनवरी 1918 को चैदह सूत्री कार्यक्रम विश्व के सामने प्रस्तुत किया। 19 सदस्यीय आयोग का और कुछ विशिष्ट समझौतों के आधार पर 14 फरवरी 1919 के सम्मेलन में प्रस्ताव प्रस्तुत कर दिया गया जिसके आधार पर 28 अप्रैल 1919 को स्वीड्डति पश्चात् राष्ट्र संघ League of Nations की स्थापना हुई। इसमें शान्ति संधियों की प्रथम 26 धाराओं का उल्लेख है।
राष्ट्र संघ की विवेचना करते हुए आर्गेन्सकी Organski ने इसे नैतिक और आर्थिक दायित्वों का संगठन बताया। मोर्गेन्थो Morgenthau ने इसे वैधानिक व्यक्तित्व का संगठन माना तथा एम0 लोर्नेड ने इसे शक्ति पर आधारित राजनीति को उत्तरदायित्वपूर्ण ठहराया परन्तु इस बात पर सभी एकमत रहे कि यह संगठन ‘अन्तर्राष्ट्रीय सरकार’ नहीं है।
1920 में यूक्रेन और मालमेडी की समस्या से लेकर 1934 के इटली-इथोपिया विवाद तक लगभग 20 अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक समस्यायें राष्ट्रसंघ के सामने आयीं। जिसमें अधिकांश को राष्ट्रसंघ सुलझाने में असमर्थ रहा। राष्ट्रसंघ अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में पूर्णतः असफल रहा जिसका परिणाम द्वितीय विश्वयुð के भयावह रूप में सामने आया। इसका प्रमुख कारण राष्ट्रसंघ के सिðान्तों के प्रति महाशक्तियों की अनास्था था। वास्तविकता यह है कि राष्ट्रसंघ की आड़ में शान्ति और सुरक्षा के नाम पर बड़े राष्ट्र अपने स्वार्थों की प्रतिपूर्ति करने में तल्लीन थे। जर्मनी ने आस्ट्रिया और चैकोस्लोवाकिया की स्वतन्त्रता का अपहरण किया, इटली ने एबीसिनिया को हड़प लिया तथा जापान ने मंचूरिया पर नग्न आक्रमण किया।