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पत्रकारिता: एक नजरिया या जरिया? - 87............नैनी झील पर बढ़ता खतरा

आबाद जाफ़री, नैनीताल....

भारत का स्विटजरलैण्ड कहलाने वाले विश्वप्रसिद्ध पर्यटक स्थल ‘नैनीताल’ की प्रसिद्ध और सुन्दर झील आजकल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। इस खूबसूरत और नीली-हरी झील के नाम पर ही अंग्रेज पर्यटक पी. बैरन ने 1841 ई. में नैनीताल बसाया था। समुद्री सतह से लगभग 6,350 फुट की ऊँचाई पर स्थित ‘नैनी झील’ 120.5 वर्ग एकड़ में फैली हुई है। विश्व में किसी उच्च पर्वत शिखर में स्थित यह झील चन्द झीलों में से एक है।
वर्तमान ‘ड्रेनेज सिस्टम’ के तहत इस झील में चारों ओर से 23 नाले गिरते हैं। नैनीताल नगर बसाते समय तत्कालीन अंग्र्रेज विशेषज्ञों ने भविष्य को दृष्टिगत रखते हुए 75 नाले बनवाये थे ताकि पहाड़ों की ढलान से उतरने वाले पानी को पहाड़ों में बैठने से बचाया जा सके। क्योंकि पानी के किसी एक स्थान में एकत्र हो जाने से ‘भूस्खलन’ की सम्भावनाएँ विद्यमान रहती हैं। अब ऐसे अनेक नाले या तो विलुप्त हो चुके हैं या फिर उन पर अनाधिकृत कब्जे करके इमारतें निर्मित की जा चुकी हैं।
जनता तथा नागरिकों की लापरवाही के कारण निरन्तर चट्टानों के टुकड़े, लाखों टन मलवा और गाॅद झील की तह में समा चुकी है। इस से झील की प्राकृतिक सतह को खतरा बढ़ गया है। 1871 ई. में एक अंग्रेज विशेषज्ञ ‘डाॅक्टर एम्सबरी’ ने पहली बार झील की नाप-जोख करवाई थी और गहराई का अध्ययन किया था। नैनी झील का यह प्रथम वैज्ञानिक अध्ययन था। उस समय झील की गहराई मध्य में 93 फुट थी। अब उसमें कम से कम 20 फुट मलवा भर जाने से सतह कम हो गयी है। सतह कम होने से झील के प्राकृतिक स्रोत लुप्त हो रहे हैं और उसकी जल भण्डारण क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इस समय झील के प्राकृतिक स्रोतों को निश्चित रूप से चिन्हित करना सम्भव नहीं है।
विश्व में इस प्रकार की केवल दो ही हमशक्ल झीलें हैं। एक स्विटजरलैण्ड में और दूसरी स्वयं नैनी झील। स्विटजरलैण्ड की झील की सतह में पत्थर, कंकड़, विभिन्न टुकड़े तथा मछलियाँ आसानी से देखी जा सकती हैं। वहाँ कश्ती में सैर करते समय लोग जेब से सिक्का निकालकर पानी में फेंकते हंै और उसे पानी की सतह तक जाता हुआ देखकर आनन्दित होते हैं परन्तु दिन-प्रतिदिन गन्दी होती नैनी झील में यह आनन्द उठाना सम्भव नहीं है। मेरे एक मित्र ने मुझे बतलाया कि स्विटजरलैण्ड के झील को प्रत्येक 6 माह में आधुनिक मशीनों और वैज्ञानिक प्रणाली द्वारा साफ किया जाता है। परन्तु हमारे यहाँ केवल योजनाए ही बनायी जाती हैं और कागजी कार्यवाही से ही इतिश्री कर ली जाती है।
1997 ई. में ‘नेशनल लेक कंजरवेशन प्लान’ (छंजपवदंस स्ंाम ब्वदेमतअंजपवद च्संद) में 5वें स्थान पर दर्ज नैनी झील के संरक्षण हेतु 42,28,000,00 रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई थी तथा ‘नैनीताल झील परिक्षेत्र विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण’ को नोडल एजेन्सी बनाकर इसके संरक्षण का दायित्व सौंपा गया था। लगभग 80 लाख रुपया खर्च होने के पश्चात भी कुछ नहीं हुआ। यह धनराशि कहाँ व्यय की गई, कुछ पता नहीं चला।
गत वर्ष हाॅलैण्ड के विशेषज्ञों की एक टीम ने स्थानीय प्रशासन के साथ नैनी झील का व्यापक और गहराई से सर्वेक्षण किया था तथा सम्पूर्ण योजना का ‘रि माॅडल’ बनाने के लिए सरकारी अधिकारियों से अनुरोध किया था।
1871 ई. के पश्चात् लगभग 129 वर्ष की लम्बी अवधि में भी हमने झील की पुनः नाप-जोख, वैज्ञानिक अध्ययन तथा संरक्षण को आवश्यक नहीं समझा। स्थानीय नागरिकों तथा पर्यावरण प्रेमियों ने भी विशेष रुचि दिखाना आवश्यक नहीं समझा और ठोस तथा कारगर उपाय नहीं किये। स्थानीय प्रशासन, नगर पालिका प्रशासन तथा नागरिकों की लापरवाही और उदासीनता ने झील के अस्तित्व पर कई सवालिया निशान खड़े कर दिये हैं।
विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के अनुसार ‘रिचार्जिंग और रिहार्बिसिंग’ को योजना को महत्वपूर्ण अंग बनाये बिना नैनी झील के संकट को दूर नहीं किया जा सकता। यदि यही स्थिति रही तो करोड़ों रुपये की आर्थिक मद्द के पश्चात् भी इस नीली-हरी झील को बचाना सम्भव नहीं हो सकेगा। यदि यह पानी संरक्षित न रह सका तो नैनीझील जैसा खूबसूरत नगर पर्यटक नक्शे से ही विलुप्त हो जायेगा।