अवर्गिकृत

परमेश्वर (हिन्दी में)

परमेश्वर ;हिन्दी में द्ध
परूलि की माँ झट-पट तैयार हो गई। उसे क्या पता गिरूवा के हाल। एक ने दबी जुबान में गिरूवा के शराबी होने की बात कही भी पर परूलि की माँ ने सोचा-थोड़ा बहुत खाने-पीने वाले तो पहाड़ों में होते ही हैं। इस समय मुँह के सामने लड़की माँगने वाले मिल रहे हैं, हाँ कर देती हूँ। उसने आगे-पीछे कुछ न देखा और बात पक्की कर दी। गाँव वालों ने मिल जुल कर परूलि का ब्याह कर दिया। परूलि की माँ के पास अपनी शादी के समय के एक जोड़ा कनफूल और एक मंगलसूत्र था, वही उसने परूलि को पहना दिया। ब्याह के बाद परूलि देली पल्टाने भी दुबारा मायके न आ सकी। कौन बुलाने आता कौन छोड़ने जाता। परूलि की माँ को कोई अपना हुआ नहीं, गिरूवा के पिता ने लड़का ब्याह दिया तो बस लंका जीत ली दोनों तरफ से पट्ट हुई। न मायके से कोई बुलाने वाला न ही ससुराल से कोई छोड़ने वाला। परूलि के ससुराल में परिवार तो पूरा हुआ पर उसके बारे में सोचने वाला कोई नहीं हुआ।
वह जिस दिन से इस घर में आयी उसने उस दिन से एक दिन भी सुख का नहीं देखा। रोज ही एक झसक (अज्ञात भय) लेकर उठती थी और उसी झसक में दिन काट कर रात में लेट जाती थी। निगोड़े शराबी गिरूवा ने कभी एक आँखर भी भला सा बोला होता तो शायद उसका मन लग जाता पर वह तो पिता ने एक दिन दूल्हा बना दिया तो बन गया दूल्हा, बाँकी तो उसे न औरत की जरूरत न घर की। सुबह से शराब का आचमन शुरू। सुबह उठने से पहले ही चारपाई पर ही घूँट लगा लेने वाले गिरूवा का पैर बिना शराब के जमीन पर पड़ता ही न था। परूलि क्या करे कोई घड़ी तो ऐसी होती जब वह इंसान जैसा रहता, तब तो कुछ समझाया भी जाता। वह या तो पीता था या फिर खा-पीकर लुड़का रहता था। एक दिन परूलि ने अपने ससुर जी से कहा-‘बाबू इनको बोतल के लिए पैसे न देते तो अच्छा रहता।’ ससुर जी बिगड़ पड़े-‘मेरा बेटा, मेरे पैसे, तू कौन होती है बीच में बोलने वाली। अपने काम से मतलब रख।’ किससे कहे परूलि? रोज गिरूवा के उठने से पहले उठ जाती, नहीं तो शराब के भभूके से दिन भर सिर घूमता रहता था। परूलि को कुछ कहने का अधिकार न था। कभी हिम्मत करके एक आँखर बोलना भी चाहती तो ‘चोप्प’ कह कर उसे धकेल देता था। परूलि दिन भर क्या करती है? खाती भी है या नहीं खाती? घर के अंदर क्या हो रहा है? किसी बात से गिरूवा को कोई मतलब नहीं था। भाई के फटे-पुराने कुर्ते -पाजामे मिल गये तो पहन लिये, भाभी ने थाली परासे दी तो खा लिया नहीं तो बाबू की लाई बोतल पकड़ी और लुढ़का रहा। शादी के बाद भी उसकी दिनचर्या में कोई अंतर नहीं आया। पिता ने समझा था शादी के बाद खुद ही संभल जायेगा इसलिए वे दूर के गाँव से परूलि जैसी सुरूपा, सुशील, हुनरमंद लड़की ढंूढ लाये। नजदीक के गाँव वालों को तो गिरूवा के हाल पता ही थे। कौन जो दे रहा था उसे अपनी बेटी? गिरूवा के पिता जी भी अब उसे देते-देते थक गये, लड़के की दशा जैसी की तैसी देखकर वे बिना बात परूलि पर अपना गुस्सा निकालते।