संस्कृति

पवित्र वस्तुओं में गौ का स्थान भाग 1

पवित्र वस्तुओं में गौ का स्थान
के॰सी॰ सुयाल, नैनीताल -
ईश्वर के अवतार के कुछ विशेष प्रयोजन होते हैं। ईश्वर की स्वचालित सृष्टिव्यवस्था में जब गड़बड़ी उत्पन्न होती है तो उसे ठीक करने के लिये ईश्वर को स्वयं अवतार ग्रहण करना पड़ता है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।। गीता।।
अर्थात हे अर्जुन ! जब जब धर्म की हानि होती है तब अधर्म के विनाशार्थ मैं अवतार धारण करता हूँ।
इस क्रम में तुलसीदास जी ने धर्म की पुनस्र्थापना की व्याख्या निम्न प्रकार की है-
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधु सुता प्रिय कंता।। मानस।।
अर्थात भगवान के अवतार के मुख्य उद्देश्यों में गौ, पृथ्वी, संत, देव व विप्र इनका हित करना है। देखा जाय तो इन सभी तत्वों में गौ ही प्रधान है। इसका कारण है कि भूमि के द्वारा गाय का पालन पोषण होता है तथा वह उसे धारण करती है तथा संत, ऋषि  मुनि व विद्वान लोग धर्म कर्म द्वारा पृथ्वी को पोषण देते हैं। मंत्र द्विजों के द्वारा प्रयोग होते हैं। इन मंत्रों यज्ञों का प्रयोग देवों को प्रसन्न करना है। देवगण प्रसन्न होकर विश्व का पोषण करते हैं देखें। श्री भगवत गीता -
देवान भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः सद्यः श्रेयमवाप्स्यसि।।
इस प्रकार देवगण यज्ञों व मन्त्रों के, मन्त्र विद्वान ब्राह्मणों के तथा ब्राह्मण यज्ञादि सामग्रियों  व भरण पोषणार्थ गौओं पर निर्भर हैं। इसीलिए गावः त्रैलोक्य मातरः कहा गया है। पुष्टि के लिये महाभारत का अनुशासनपर्व देखें-
धारयन्ति प्रजाश्चैव पयसा हविषा तथा।
एतासां तनयाश्चापि ड्डषियोगमुमासते। जनयन्ति च धान्यानि बीजानि विविधीनी च।।
अर्थात ये गौऐं अपने दूध, दही व घी से प्रजा का पालन करती है। इनके पुत्र (बैल) खेती के द्वारा धान्य व बीच उत्पन्न करते हैं।