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पिथौरागढ़ के राजा रौयसिंह ”पिथौरागढ़ के रत्न“

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -

राजा रायसिंह एशिया और पैसेफिक के भूतपूर्व यूनेस्को के महानिदेशक ने शिक्षा के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर में इतिहास में गौरव प्राप्त किया, लेकिन दुर्भाग्यवश भारत में लोग उनके योगदान के लिए नगण्य रहे। 1997 में उन्होंने यूनेस्को के शिक्षा का अन्र्तराष्ट्रीय सम्मेलन को सम्बोधित किया और तब से यह राजा रौयसिंह व्याख्यान माला के रूप में उन्हीं को समर्पित है। यह व्याख्यान माला राजा रौयसिंह के सम्मान और यूनेस्को सदस्य राज्य, ;एशिया और पैसेफिक महाद्वीप कोद्ध सहायता करने और शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने के लिए तथा विकास के लिए शैक्षिक जागृति को बढ़ावा देने के लिए राजा रौयसिंह के अथक प्रयासांे को और उनके अभूतपूर्व योगदान को मान्यता प्रदान करने के लिए है। उन्होंने एक प्रभावशाली संस्था के रूप में यूनेस्को बैंकाक कार्यालय के विकास के लिए एक यन्त्र के रूप में काम किया जिससे यह संस्था इन सदस्य राज्यों के शैक्षणिक मामलों को सुलझा सके और उन राज्यों को समय-समय पर संबोधित कर सके।
राजा रौयसिंह का जन्म 5 अप्रैल 1918 में हुआ। उनके पिता की अल्पकाल में ही मृत्यु हो गई थी और राजा रौयसिंह का पालन पोषण पिथौरागढ़ के चण्डाक में स्थित कुष्टाश्रम के अस्पताल के आवास में हुआ उनकी माता जो कुष्टाश्रम में काम करती थीं और आश्रम की माँ मैरीरीड (1854-1943) कैलिफोर्निया की एक मैथोडिस्ट ईसाई की गहन देख-रेख में उनका पालन-पोषण हुआ। रीड ने 1891 में चण्डाक में कुष्टाश्रम खोला और वहीं चिर शांति में विश्राम कर रही हैं। पिथौरागढ़ के एक ख्याति प्राप्त शिक्षा शास्त्री के अनुसार राजा रौयसिंह एक कुशाग्र छात्र थे और उनकी शिक्षा पिथौरागढ़ के राजकीय विद्यालय में हुई। स्कूली शिक्षा में वे अद्वितीय थे तथा उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति के साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय गए। दर्शनशास्त्र में और अंग्रेजी साहित्य में स्नातक स्तर में उन्होंने सम्मान प्राप्त किया। आंग्ल साहित्य में उन्होंने एम.ए. की परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया। सिविल सर्विस परीक्षा में भी उन्होंने भाग लिया और 1942 में भारतीय नागरिक सेवा में सम्मिलित हो गए। उनकी पहली नियुक्ति आगरा में हुई। जहाँ वह अपनी पत्नी जोरीन बोनीफेशियस से मिले। 1954 में वह उत्तर प्रदेश के शिक्षा निदेशक बने। तब से शिक्षा उनकी रुचि और एक मात्र लक्ष्य बन गया।
1957 में वह केन्द्रीय सरकार के शैक्षिक परामर्शदाता बने और इस पद पर 1964 तक रहे। इस अवधि में शिक्षा में परिवर्तन की मांग और विचारधारा उठने लगी। इस संधि युग में उन्होंने अपना ध्यान राज्य और केन्द्रीय सरकार के बीच में शैक्षिक क्रियाकलापों में जागरूकता की ओर रेखांकित किया। उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग के रवि मेहता के अनुसार-राजा रौयसिंह के इस प्रयास से शैक्षिक संस्थाओं में सुधारों के जाल स्वरुप शैक्षिक शोध, प्रशिक्षण और सेवा के लिए काउंसिल आॅफ एजूकेशनल रिसर्च, टेªनिंग और सर्विस संस्थाओं का प्रदुर्भाव हुआ। अमेरिका के कई ख्याति प्राप्त प्रशिक्षक इस संस्था के साथ प्रारम्भिक वर्षों में जुड़े थे। विशेषतः कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के निर्देशन में शिक्षक विद्यालयों का निर्माण हुआ। राजा रौयसिंह की महत्वपूर्ण उपलब्धि विज्ञान शिक्षण की गुणवत्ता और वैज्ञानिक प्रतिभाओं को उभारना थी। 1964 में राजा रौय सिंह को एशिया के लिए यूनेस्को का क्षेत्रीय निदेशक बनाया गया (एशिया और पैसेफिक) अपने कार्यकाल में उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं जिनमें एशिया और पैसेफिक में शिक्षा, शैक्षिक गतिविधि में प्रौढ़शिक्षा, एशिया में शैक्षिक योजनाएं और परिवर्तनशील संसार में परिवर्तनशील शिक्षा प्रमुख है। 1985 में यूनेस्को में अपने कार्यकाल की समाप्ति के बाद इलिनोयस के इवैन्सटन शहर में स्थानी रुप से बस गए।
एशिया में वह शिक्षा के अग्रदूत के रुप में याद किए जायेंगे। उन्होंने राष्ट्रीय और स्थानीय सरकारों के बीच शिक्षा के बीच में सहयोग और समन्वय की भावना उत्पन्न की। अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ और शिक्षा मंत्रालयों के बीच उनकी यह समन्वय व सहयोग की भावना को हमेशा याद किया जाऐगा। हमेशा परिवर्तनशील संसार के नवयुवकों के दिशा निर्देशन में उनका शैक्षिक दर्शन कभी भुला नहीं सकते।
3 अप्रैल 2003 में अमेरिका के प्रतिनिधि सभा में राजा रौयसिंह का 85वाँ जन्मोत्सव मनाया गया। अमेरिका के प्रतिनिधि-सभा के इस समारोह में माननीय जेम्स एलीच ने कहा ‘‘अध्यक्ष महोदय में प्रतिनिधि सभा की ओर से एक महान-ख्याति प्राप्त अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षक को सम्मान प्रदर्शित करता हूँ मिस्टर राजा रायसिंह को 85वें जन्मोत्सव पर सम्मान देता हूँ। इस प्रतिनिधि सभा में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के हाउस कमेटी के सदस्य के रूप में और सयुक्त राष्ट्र को प्रभावशाली बनाने के आयोग के सह अध्यक्ष के रूप में उनका सम्मान करता हूँ। मैं मानता हूँ शिक्षा में गुणवत्ता के सुधार के लिए प्रभावशाली सहयोग, अन्तर्राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में पारस्परिक सूझबूझ का होना पहली अनिवार्यता है। इस क्षेत्र में राजा रौयसिंह का अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा में समर्पण इस कांग्रेस में सम्मिलित सदस्यों का ध्यान आकर्षित करने के लिए आवश्यक है।’’ इस महान अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा शास्त्री का निधन 3 नवम्बर 2005 को हुआ और उनका पार्थिव शरीर अंतिम क्रिया से पूर्व सैंट औगसिटीन (अपिस्कोपल चर्च) में राजकीय सम्मान प्रदर्शित करने और श्रद्धांजलि हेतु रखा गया था।