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पुल वाली लड़की

पुल वाली लड़की
राजशेखर पंत, भीमताल
जाड़े की किसी सर्द रात में हो सकता है उसने किसी खुरदरे से हाथ को अपनी कमर के आसपास घूमता हुआ महसूस किया हो । किसी लम्बी काली गाड़ी की अधखुली खिड़की से कभी किन्हीं दो गोरी साफ-सुथरी, सुघड़ बाहों द्वारा धीरे से सरकाये गये खुरदरे कंबल में लिपटे अपने गठरी बने शरीर को तब शायद ढीला छोड़कर उसने धीरे-धीरे सीधा करने का प्रयास किया होगा। घूमते हुए हाथ को जाने-अनजाने यह संदेश देने के लिए कि यह सब उसे अच्छा लग रहा है। ... और फिर...एक झटके के साथ सब कुछ पीछे धकेलते हुए, तोड़-फोड़ कर बह निकलने का आवेग...। कसमसाते हुए शरीर के नीचे, इधर-उधर दबे कंबल के किनारे अचानक मुक्त हुए होंगे...खुरदरे हाथ द्वारा चुपचाप अंदर घुसने लायक बनाये गये रास्ते को एक तरह से चैड़ा और चैड़ा करते हुए और फिर उसके बाद...कट्।
यहाँ पर विजुअल सजेशन में चला जाता है । एक्वेरियम के सामने वाले काँच से चिपकी हुई कोई मछली..., शायद घोस्ट ऐंजिल या ऐसी ही कोई अन्य प्रजाति, जिसमें साधारण गोल्डफिश का सा चुलबुलापन, बेचैनी नहीं होती, जो सिर्फ काँच की दीवार से मुँह सटाये स्थिर सी खड़ी रहती है, जैसे बाहर की दुनिया को काँच के अवरोध के उस पार से देखने के बावजूद भी वह तटस्थ हो।...यहाँ तटस्थता पर थोड़ा ठहराव या फिर थोड़ा ‘इम्फैसिस’ है कहना ज्यादा ठीक होगा। ये हमेशा जरूरी तो नहीं कि जो कुछ भी आप अपने चारों ओर देखें- बड़े-बड़े पोस्टरों में, इधर-उधर फैले अखबार और पत्रिकाओं के फटे पन्नों में, बसों के पीछे लिखे गये विज्ञापनों में या फिर फिजा में बस यूँ ही तैरती रहने वाली आवाजों में- खुद भी उसका एक हिस्सा बनना चाहें। जिन्दगी यूँ भी अक्सर कुछ अहम सवालों के इर्द-गिर्द घूमती है। भूख, प्यास, ठंड, गर्मी, बरसात या रात को सर छुपाने लायक जगह, हमेशा मुँह बाये खड़ी रहने वाली अनिश्चितता...वगैरा-वगैरा। बाहर के पोस्टर और विज्ञापन वाली दुनियाँ तो तब शुरू होती है जब एक बार अंदर के इन सवालों का संतोषजनक उत्तर मिल जाता है। खैर....बात मछली वाले विजुअल की हो रही थी । अप्रत्याशित ढंग से एक अनदेखा हथौड़ा एक्वेरियम के सामने वाले शीशे को तोड़ देता है और फिर पानी के उफनते सैलाब के साथ मछली बह जाती है, उसकी आँखें और टप-टप करने वाले होंठ दोनों बंद हैं।
चलिए यह तो स्पष्ट हो गया इस विजुअल से कि जिन्दगी की तमाम जद्दोजहद के बावजूद कुछ ऐसा है जिस पर आप कभी-कभी नियंत्रण नहीं रख पाते । एक ज्वार सा आता है और आपको संज्ञा शून्य, विवेक शून्य करता हुआ निकल जाता है... । और फिर जिन्दगी के किसी एकान्त, उपेक्षित से किनारे पर किसी अनचाही वस्तु की तरह फेंके जाने का एहसास बहुत शिद्दत से होता है आपको।
पर यह भी तो हो सकता है, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ हो। शाम का धुँधलका गहराने के बाद कोई मोटी सी तोंद वाला पुलिसिया पान चबाते हुए इधर से निकला हो और धकियाते हुए बैठा ले गया हो इसे अपनी जीप में, या फिर कोई रईसजादा... । इस से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ पैसांे, कपड़े या भरपेट खाने के लालच में या फिर किसी बंद कमरे में ठंड से दूर एक यादगार रात गुजारने के ख्याल से वह खुद ही किसी के साथ चली गयी हो। इस उम्र में शादी का वायदा कर जनमजन्मांतर तक साथ निभाने की कसमें खाने वाले, गाँव-पड़ोस या साथ पढ़ने वाले प्रेमीनुमा लोग भी कभी-कभी इस तरह मँझधार में छोड़े जाने का सबब बन जाते हैं।
कुछ भी हो, घटनाक्रम के इस संभावित विस्तार में मुझे अपनी संवेदनाएं दान के कंबल में सिमटे, खुरदुरे हाथों से सहलाये जाने वाले उस शरीर के साथ जुड़ती हुई महसूस होती है जिसे मैं लगातार पिछली कुछ शामों से उस लंबे से पुल के फुटपाथ पर देख रहा हूँ, जिस पर होकर मैं हर मंगलवार शाम के वक्त हनुमान मंदिर जाया करता हूँ। दो विपरीत दिशाओं की ओर तेजी से भागते हुए टैªफिक के शोर में प्रायः डूबा रहने वाला यह पुल मंद-मंथर गति से बहने वाली एक अन्यमनस्का नदी के ऊपर बना है... । गंदे-बदबूदार काले से पानी से अटी एक खूबसूरत नाम वाली नदी। पुल के दोनों किनारों पर बने चैड़े फुटपाथ के ऊपर ऊँची-ऊँची जालियाँ लगा दी हैं सरकार ने, ताकि शहर की श्रद्धालु या लापरवाह जनता कूड़ा-करकट फेंक कर इसे और गंदा न कर सके। अब ये बात दीगर है कि फुटपाथ पर पसरी, दिन ब दिन गंदी हो रही इन जिंदगियों पर लोगों की निगाह कम ही जाती है। अजीबो-गरीब शक्ल वाले बेतरतीब भिखारीनुमान लोगांे की शरणस्थली है यह फुटपाथ। इनके आस-पास बिखरे इंजेक्शनों के ऐंम्प्यूल्स, गोलियों के रैपर और स्मैक का पावडर जलाने के लिए इस्तेमाल की गई पन्नियों के टुकड़ों को देखने के बाद कुछ समझना बाकी नहीं रह जाता । देवी-देवताओं की कुछ तस्वीरें भी सजी रहती हंै इनके आस-पास। दिसम्बर-जनवरी की सर्द रातों में पुल के उस पार बसी पाश कालोनियों से गाहे-बगाहे कोई गाड़ी धीमी होकर कंबल या फिर खाने के पैकेट उछाल देती है, इंसानियत के एक टोकन के रूप में।
पिछले दस-बारह वर्षों में एक प्रोडेक्शन हाउस से जुड़ाव के चलते हर अनुभव को सैल्यूलाइड से जोड़ कर सोचना मेरी आदत बन चुकी है। पुल के

फुटपाथ पर बैठने वाली वह लड़की, जिसे मैं पिछली कुछ शामों से लगातार देख रहा हूँ, शायद चैबीस-पच्चीस वर्ष की रही होगी। घुँघराले बालों से ढका उसका चेहरा अक्सर निहारता रहता है उस नवजात शिशु की पतली सी टाँगों को जो प्रायः उसकी गोद या हथेली पर टिका रहता है।
फिल्म फिर शुरू हो जाती है। अपने चारों ओर के शोर-शराबे और गलीज सी दुनियाँ से कटी हुई एक युवा, अस्त-व्यस्त सी माँ, ‘माँ’ शब्द ‘लड़की’ के साथ जुड़ी जुगुप्सा और उत्सुकता को पीछे धकेलते हुए अकेलेपन के बिंब को थोड़ा गहरा सा देता है। खास कर तब जबकि बाप की जगह खाली हो... अखबार के पन्ने पर तराशी गयी किसी खिड़की की तरह। हर कोई स्वतंत्र होता है उस जगह पर छपी खबर या विज्ञापन का अनुमान लगाने के लिए। खैर... कुछ भी हुआ हो उसके साथ... उसकी सहमति से, समर्पण से, असहमति से या फिर जोर जबरदस्ती... यह सब अब महत्वपूर्ण नहीं है। फिल्म में एक दार्शनिक टिवस्ट आ रहा है यहाँ पर। अखबार के पन्ने पर तराशी गयी खिड़की की खाली जगह अब हथेली में बच्चे को लिए अपनी भाव प्रवण आँखों से उसे अपलक निहारती हुई माँ की तस्वीर से भरने लगती है।... भावनाओं का तीव्र ज्वार या फिर महज पुरुष की भोग्या होने का दंश... कितना अर्थहीन, कितना गौण हो जाता है सब कुछ मातृत्व के सामने। शारीरिक भूख, भावनाओं की तृप्ति या अनचाही यंत्रणा ही सही... पृष्ठभूमि में चला जाता है यह सब... सिर्फ एक एहसास बचता है... पूर्णता का... ठहराव का... जीवन के अर्थ के व्यापक... बहुत व्यापक हो जाने का।
मुझे लगता है कि फिल्म यहाँ पर एक हाइ-नोट पकड़ सकती है।... स्त्री की बेचारगी पर धीरे-धीरे सूपरइंपोज होती उसकी महानता, एक जबरदस्त ट्रांजिशन होगा यह। स्त्री को उसकी मिडिल क्लास, मैलोड्रामाटिक इमेज से बाहर की ओर धकेलता हुआ...। कितना छोटा, कितना बेमानी हो जाता है स्त्री के इस बिंब के सामने उसे सिर्फ भोगने के लिए अपनी ओर खींचता पुरुष। भोग के वह क्षण तीखी गंध वाले किसी पान मसाले के पाउच को दाँतों के कोने से चीरकर मुँह में उलटने जैसे ही रहते हांेगे उसके लिए,...थोड़ी देर मुँह में गुलगुलाने के बाद थूक दिया... पिच्च...बस। वहीं स्त्री के लिए तो यह दैहिक सुख या यातना-जो कुछ भी हो भोगा हो उसने - से धीरे धीरे विरत होते हुए एक नये जीवन के सृजन की भूमिका लिखने जैसा है।...शायद किसी आत्मिक अनुभव से कम नहीं होता होगा जीवन के फलक को धीरे-धीरे यूँ विस्तारित होते हुए देखना। ...एक विजुअल उभरता है मेरे जेहन में- पत्तों से लदे, हवा में झूमते हुए आम या लोक-जीवन से जुड़े ऐसे ही
किसी वृक्ष पर मंजरियाँ निकल रही हैं। बैकग्राउंड में समय की निरंतरता को....

सजैस्ट करता हुआ तेज गति से भागते हुए बादलों का टाइमलैप्ड फ्रेम... और फिर पेड़ की टहनियाँ झुक जाती हंै फलों के बोझ से, जैसे समेट लेना चाह रही हों क्षितिज में उड़ते पक्षियों, हरे भरे खेतों... शायद सारे संसार को, कैमरा लो-एंगिल से जूम-इन होता है... कट्... कट्... कट्।
इस थीम पर वाकई एक अच्छी स्टोरी लाइन तैयार हो सकती है, मुझे अपने क्रिएटिव डाइरेक्टर से बात करनी होगी। कम से कम आइडिया तो डिस्कस किया ही जा सकता है। एक नया एंगल हो सकता है यह फैमिनिस्ट काज़ के लिए। मुझे लगता है कि इसके प्रमुख हिस्सों को शूट भी उसी पुल के इर्द-गिर्द किया जाना चाहिये। ...तेजी से भागता टैªफिक और उस पर नजरें गढ़ाये बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स, साइड कटर्स ‘जिन्दगी की तेज रफ्तार’ और ‘कहीं आप पीछे न छूट जायें’ का संदेश देते हुए,... इस भागम-भागी के बीच पुल के नीचे बहती एक ठहरी हुई सी दिखायी देने वाली गंदी बदबूदार नदी। उसके ऊपर फुटपाथ के कोने पर काफी कुछ वैसे ही दीखने वाली एक अदद जिन्दगी... । पुल के आखिरी छोर से शुरू होने वाली ढलान पर टिका कैमरा ट्रैफिक पर पैन होता हुआ उस लड़की, नहीं ‘माँ’ या शायद लड़की... नहीं माँ ही ठीक है... पर आकर फ्रीज हो जाता है, पीछे लगी ऊँची-ऊँची जालियों के उस पार बह रही है वह अन्यमनस्का नदी... ।
अरे... प्रोडेक्शन हाउस आ गया। गाड़ी पार्क कर मैं अपने केबिन का रुख करता हूँ, तभी मेरी नजर कोने में पार्क की गयी सफेद आल्टो पर पड़ती है।... ‘‘तो आज वह शूट पर नहीं है।’’ उत्साहित सा होकर मैंे आगे बढ़ता हूँ। स्टोरी लाइन के कुछ खास हिस्सों को मैं उससे भी डिस्कस करना चाहूँगा। अभी दो महिने पहले ही ज्वाइन किया है उसने। जामियाँ की फ्रेश गे्रजुएट है, कैमरा और एडिटिंग का जबरदस्त टैलेंट है उसमें। मुझे लगता है कि उसके चेहरे की खूबसूरती उसके द्वारा कंसीव किये गये हर शाॅट में रिफ्लेक्ट होती है। इस फिल्म में बतौर कैमरा एसिस्टेंट इसे ही रखना होेगा, और कम से कम पेपर एडिट तो इसी से करवाना होगा, गहरी समझ है इसमें इमोशन्स की।
कारीडोर से गुजरते हुए मैं एडिटिंग रूम में झाँकता हूँ। मानीटर पर वह किसी नए एडिट का स्क्रेच वीडियो देख रही है। रिवाइन्ड और फारवर्ड बटनों को दबाती उसकी शोख उंगलियाँ की-बोर्ड पर तेजी से फिसल रही हंै। ठिठक कर एक भरपूर नजर डालता हूँेे मैं उस पर। टाइट जींस के ऊपर काला श्रग पहना है उसने। लापरवाही से पहनी हुई जाकी-कैप के किनारों से निकली बालों की एक घुमावदार लट उसके गोरे प्रोफाइल को और खूबसूरत बना रही है। हथेली पर अपनी ठोढ़ी को टिकाये वह किसी पाज किये हुए फ्रेम को सोचने वाले अंदाज में घूर रही हैं... अपने निचले ओठ को धीरे-धीरे चबाते हुए।
एक सनसनी सी महसूस होती है मुझे अपने अंदर, शीशे के उस पार मानीटर के सामने बैठी लड़की और पुल वाली लड़की... नहीं ‘माँ’, नहीं लड़की ही ठीक होगा- आपस में गड्ड-मड्ड हो रही है,... कंबल के अंदर चुपचाप घुसने के लिए जगह बनाता खुरदरा हाथ... पानी के सैलाब के साथ बहती एक्वेरियम की मछली...उफ्...एक आब्सेशन की तरह घना होता जा रहा है सब कुछ। अपने चैम्बर की ओर बढ़ते हुए मैं सोचता हूँ स्टोरी लाइन की ओपनिंग, क्लाइमैक्स के अलावा और क्या कुछ और कैसे डिस्कस किया जा सकता है इससे। नहीं... आज शाम और फिर शायद कल भी मुझे दोबारा उस पुल पर जाना होगा। कुछ नये बिंबांे, विजुअल्स और कैमरा एंगल्स की इंट्यूटिव फील वहीं पर हो सकती है। क्रिएटिव डाइरेक्टर और खासकर उस लड़की से बात करने से पहले पूरी तरह से तैयार होना जरूरी है। अनुभूतियों की गहराइयों को कैमरे की आँख से तलाशना कोई हँसी खेल थोड़े ही है।
स्टूडियो से लौटते हुए मैं गाड़ी को पार्किंग पर लगा पैदल ही उस पुल की ओर बढ़ जाता हूँ.... यंत्रचलित सा। यहाँ लगातार आते हुए तीन दिन हो चुके हैं मुझे। शाम की उदास रोशनी में बच्चे और माँ को बार-बार देखा, समझा और महसूस किया है मैंने। पुल की रेलिंग के सहारे पिछले बीस मिनटों से खड़ा हूँ मैं। पर आज वह अपनी जगह पर नहीं है। पिछले तीन दिनों में ऐसा कभी नहीं हुआ। फुटपाथ के कोने पर पड़ा उसका फटा कंबल बार-बार आश्वस्त कर रहा है मुझे कि वह यहीं कहीं आसपास है।... शाम का अंधेरा धीरे-धीरे घना हो रहा है। तीखी हैलोजन लाइट में सराबोर पुल के ऊपर टेªफिक बढ़ रहा है... मेरी बेचैनी की तरह। फुटपाथ पर इधर-उधर बिखरी अजीबो-गरीब शक्लों को मैं गौर से देखता हूँ। शायद उस बूढ़े से बात की जा सकती है जो दूसरे छोर पर बैठा है, देवताओं की कुछ तस्वीरों के साथ। पर्स से कुछ सिक्के निकालकर अपनी बेचैनी पर तटस्थता का मुलम्मा चढ़ाने की कोशिश के साथ मैं उस लड़की... नहीं ‘माँ’ के बारे में पूछता हूँ।
‘‘अरे बाबू... ऊ गोपाल की महरिया... ? गाँव गयी ससुरी,... गोपाल रिक्शा चलावत है ना, दिन में कालोनी माँ चैका-बासन कर संझा करे इहाँ बैठ ऊका इंतजार करत रही... ई मंदिर की परसादी और लोगन की दान-दक्षिणा की दिहाड़ी पकाने,... गोद में बच्चा रहा ना, हमार धंधा खोटा हुई रहा था, ...चलो ससुरी गई तो...
बूढ़ा बड़बड़ाये चला जा रहा है। हाथ में पकड़े सिक्कों को उसकी ओर उछाल कर मैं धीरे-धीरे पार्किंग-लाॅट की ओर बढ़ने लगता हूँ। पुल के उस ओर लगी कुछ खूबसूरत औरतों के चित्रों वाली बड़ी होडिंग के बीच का हिस्सा एक खिड़की की शक्ल में फटकर झूल रहा है। इस खिड़की से अब और कुछ झाँकता उभरता नहीं दीख रहा है मुझे, सिवा अपने बेचैन अक्स के। मैं गौर से देख रहा हूँ।... यह विज्ञापन किसी गर्भ-निरोधक का है।