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पौराणिक गाथाओं के चिरंजीवी अश्वत्थामा

पौराणिक गाथाओं के चिरंजीवी
मीना नयाल, नैनीताल-
अश्वत्थामा
सशरीर युग-युगान्तरों तक जीवित रहने वाले पौराणिक चरित्रों में अश्वत्थामा का व्यक्तित्व अनोखा है। खासतौर पर इसलिये कि इन्हें अमरत्व का वरदान नहीं श्राप मिला था। ये द्रोणाचार्य एवं ड्डप की बहन कृषि  की पुत्र थे (ये दम्पति किसी माता की कोख से उत्पन्न नहीं थे)। भगवान शिव की आराधना के फलस्वरूप इनका जन्म हुआ था। जन्म लेते ही साधारण शिशु की तरह रूदन न करके इनके मुख से उच्चैःश्रवा की तरह हिनहिनाने की घोर शब्द सुनायी दिया। तब इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा। जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक पर एक मणि थी। इस मणि के प्रभाव से इन पर किसी भी प्रकार के विष, सर्पदंश, शत्रु, जन्तु, जानवर तथा रोग व्याधि का प्रभाव नहीं पड़ सकता था। द्रोणाचार्य अपने इस पुत्र को प्राणों से भी अधिक प्रेम करते थे। अश्वत्थामा का बचपन घोर दरिद्रता में बीता कि दूध तक उन्हें प्राप्त नहीं हो पाया। बाद में भीष्म ने धनुर्विद्या में द्रोण की निष्णात निपुणता को जानकर उन्हें कुरू राजकुमारों का आचार्य बना दिया। तब अश्वत्थामा के जीवन का दारिद्रय समाप्त हुआ। कुरू राजकुमारों के साथ उन्होंने अपने पिता से विविध ज्ञान और धनुर्विद्या सीखी। वह आग्नेयास्त्र, षर्जन्यास्त्र, वायव्यास्त्र, नारायाणास्त्र, ब्रह्मशिर आदि दिव्यास्त्र व सभी शस्त्र चलाने में पारंगत थे। सभी युद्ध  कलाओं में इन्हें दक्षता प्राप्त थी। अलग-अलग समय में इन्होंने महर्षि दुर्वासा, परशुराम व महर्षि वेद व्यास से भी शिक्षा प्राप्त की थी।
इनकी बुद्धिमता , ज्ञान, शौर्य, कत्र्तव्यपराणता व ब्रह्मतेज के कारण दुर्याेधन इन्हें अपना परम मित्र मानता था। अर्जुन जैसे अनुपम धनुर्धर को अपने कौशल से अचम्भित करने वाले महारथियों  में भीष्म, द्रोण, कर्ण व स्वयं द्रोणी ;अश्वत्थामाद्ध थे। अपने पिता द्रोण के लिये द्रोणी के मन में अपार आदर और प्रेम था। महाभारत के युद्ध  में उनके पिता को छल द्वारा मारा गया। उससे भी अधिक दुख इन्हें इस बात का हुआ कि शस्त्र रहित व शोक में निमग्न पिता के केश पकड़कर द्यृष्टद्युम्न ने उनका शीश काट डाला। अपने गरिमामय, पराक्रमी पिता की ऐसी दुखद व अपमानजनक मृत्यु अश्वत्थामा के अतीव शोक और क्रोध का कारण बनी। वे पांचालों (द्यृष्टद्युम्न पांचाल वंश के थे) और पांडवों को समाप्त करने की प्रतिज्ञा लेते हैं।
‘महाभारत’ युद्ध  के इस अंतिम सेनापति के हृदय में अपने मृत्यु को प्राप्त हो रहे मित्र दुर्याेधन के प्रति घोर दुख और दया का प्रबल आवेग था, तो पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने की तीव्रतम अग्नि भी। ऐसे में अश्वत्थामा ने रात्रि में पाण्डवों के शिविर में घुसकर पाँच पाण्डव समझ कर द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर डाली और द्रोपदी के भाई द्यृष्टद्युग्न को भी मार डाला। अपने पुत्रों की निर्मम हत्या पर क्रोध और पीड़ा से व्याकुल पांडवों ने अश्वत्थामा को पीछा किया। भय व प्रतिशोध से प्रेरित होकर अश्वत्थामा ने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया। बचाव के लिये अर्जन ने भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया। दोनों तरफ से छोड़े गये प्रचण्ड शक्तिवान दिव्यास्त्रों से निकली हुये अग्नि ज्वालायें सृष्टि को नष्ट कर देंगी, इस आशंका से महर्षि वेद व्यास ने दोनों को अपने अपने दिव्यास्त्र वापस लौटाने को कहा। अर्जुन ने उनकी आज्ञा को मानकर अपना दिव्यास्त्र वापस ले लिया। अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र को वापस लेना नहीं जानते थे। उन्होंने उस अचूक अस्त्र को अर्जुन की पुत्र वधू उत्तरा के गर्भ की ओर लक्ष्य कर दिया। भगवान ड्डष्ण ने धर्म की रक्षा हेतु धरा पर अवतार लिया था। अतः धर्म मार्ग पर चलने वाले पाण्डवों के एक मात्र वंशज की (परीक्षित की) ब्रह्मास्त्र के रक्षा की। अश्वत्थामा के ऐसे घोर पाप पर क्रूर  होकर श्रीकृष्ण  ने अर्जुन को उसके माथे की मणि निकाल लेने का आदेश दिया और अश्वत्थामा को श्राप दिया कि वह अपने कंधों पर सारे मनुष्यों के पाप ढोयेगा। वह हजारों वर्षाें तक (कलियुग के अन्त तक) निर्जन स्थानों पर एकदम अकेला भूत की भांति भटकेगा। उसके माथे से सदैव रक्त और मवाद बहता रहेगा। वह घाव कभी नहीं भरेगा। माना जाता है कि लगभग 5000 वर्षाें से अब तक अश्वत्थामा निर्जन स्थानों और जंगलों में भटक रहे हैं।