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फिर से आकर जंग लड़ो!!

फिर से आकर जंग लड़ो!!
आबाद जाफ़री, नैनीताल

हमारी नई नस्ल के प्रेरणास्रोत, उत्प्रेरक और आदर्श कौन हांेगे? यह सवाल आज के हालातों में सतही हो सकता है। मगर इन हालातों को काबू नहीं किया गया तो डा. सर मुहम्मद इकबाल के लफ़़़जों में-
न समझोगे तो मिट जाओगे, ऐ हिन्दोस्ताँ वालो,
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी, दास्तानों मंे।
जो लोग अपने बड़ों को भूल जाते हैं वह आगे चलकर अपनी असल पहचान खो बैठते हैं। अभी उम्मीद की किरन बाकी है कि कुछ विचारक, चिन्तक और भारतमाता के आदर में लिखने वाले कलम सलामत हैं और उनके हिस्से की रौशनाई बरकार है।
19 दिसम्बर गुजर गया। यह अशफाक उल्लाह खान ‘हसरत’ का शहीद दिवस था। सन 2000 में उत्तराखण्ड राज्य बनने से ठीक 18 दिन पूर्व उनका जन्मशती वर्ष भारतवर्ष में उल्लासपूर्वक आयोजित किया गया था। फिर सब भूल गये। मैंने सरकारी स्कूल के बच्चों से आते-जाते उन्हंे रोक कर पूछा तो उन्होंने 19 दिसम्बर की ‘‘विशेषता’’ से अनभिज्ञता प्रकट की। उन्हांेने मुझे गौर से देखा, मैं उनके अर्थपूर्ण नेत्रों को समझकर आगे बढ़ गया। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि हम अपने बच्चों को अपने शहर और क्षेत्र के रणबाँकुरों, शहीदों और सेनानियों से परिचित कराना अपनी तौहीन समझते हैं। जिसे उर्दू नहीं आती वह उर्दू टीचर और जिसे कुछ भी नहीं आता उसे ‘राष्ट्रपति’ का पदक प्राप्त हो जाता है। दस मिनट का समय विद्यालय में यह सब बतलाने के लिए किसी के पास नहीं है। झूठे, मक्कार, स्वार्थी, पाखण्डी तथा कथित देश भक्तों ने अजीब माहौल बना दिया है। न खुद बतलाते हैं और न बतलाने देते हैं।
यह स्वयं में अदभुत और आश्चर्यजनक उदाहरण है कि अशफाकउल्लाह से पहले ‘राम’ का नाम आता है। अर्थात लोग पंडित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के हवाले से उन्हें जानते हैं। मैं अपने लेखन के अनेक पहलुओं को जब ‘राम’ के व्यापक अर्थांे के साथ जोड़ता हूँ तो हिन्दू समझते हैं कि एक मुसलमान बोल रहा है और मुसलमान समझते हैं कि ‘काफिर’ हो गया है। सभ्यता और संस्कृति की गहराईयों से ना वाकिफ़ आज के ‘पढ़े, लिखे, काबिल’ समाज को क्या नाम दिया जाये?
सितम्बर 1986 में सरकारी मुलाजमत से अवकाश लेकर अध्ययन एवं स्वतन्त्र शोध के लिए लखनऊ चला गया। लखनऊ प्रवास के दौरान काकोरी के एक मित्र जनाब सदर अहमद खान ने खाने पर आमन्त्रित किया। वहाँ खाया भी और घूमे भी। दोपहर पश्चात विश्राम के दौरान उन्हांेने बतलाया कि संयोग से उनके बड़े भाई काकोरी के बाहर हैं। उनके पास उस एफ.आई.आर की प्रतिलिपि है जिसमें दो दर्जन लोगों पर ‘काकोरी कांड’ के मुकदमे दर्ज हैं। मगर उस एफ.आई.आर. में कहीं भी ‘अशफाकउल्लाह खान’ का नाम नहीं है। वह उस कीमती एफ.आई.आर. को अपनी सबसे बड़ी धरोहर बतलाते हैं। यह बतलाते समय मैं उनके चेहरे पर गर्व के भाव महसूस कर रहा था।
अशफाक उल्लाह खान ‘हसरत’ का जन्म शाहजहानपुर के उच्च और संभ्रान्त मुस्लिम पठान खानदान में 22 अक्टूबर 1900 को हुआ था। अफगानी पठानांे की सुन्दरता और डीलडौल विरासत में मिला था। देश स्वतन्त्रता संघर्षांे से गुजर रहा था, उसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। मिशन हाईस्कूल में शिक्षा के दौरान वह पंडित रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के संपर्क में आये। वह अशफाक के बड़े भाई के सहपाठी और मित्र थे। बिस्मिल की टोली में चन्द ही नौजवान थे जो भारतमाता पर मर-मिटने का जज़्बा और जुनून रखते थे। प्रारम्भ में बिस्मिल को शक था कि एक धनी मुस्लिम परिवार का नाजों में पला-बढ़ा लड़का देश के लिए त्याग नहीं कर सकेगा परन्तु शीघ्र ही अशफाक़ देशभक्ति की भावना को सि( करके बिस्मिल के अत्यंत निकट राजदारों में शामिल हो गये। एक कट्टर मुसलमान और दूसरा कट्टर आर्यसमाजी, परन्तु देश पर मर मिटने का जज़़्बा दोनों मंे समान था।
एक बार अशफाक़ गम्भीर रूप से बीमार हो गये। वह बेहोशी में ‘राम’ ‘राम’ बड़बड़ाया करते थे। घर वालों ने किसी दुष्ट आत्मा का प्रभाव समझकर, तान्त्रिक और झाड़फूँक करने वालों की सेवाएं लीं। बाद मंे एक मौलवी साहब को बुलवाया गया। मौलवी साहब को ‘बिस्मिल’ और अशफाक़ की दोस्ती की जानकारी थी। उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल को बुलवाया। बिस्मिल ने आकर अशफाक को आवाज दी तो अशफाक ने आँखें खोल ली और अशफाक़ ने बिस्मिल को गले लगा लिया। फिर बिस्मिल कई दिन तक अशफाक के पास ही रहे।
7 अगस्त 1925 को एक गोपनीय बैठक मंे सरकारी खजाने को ले जाने वाली रेलगाड़ी लूटने की योजना बनायी गयी। 9 अगस्त को इस सवारी गाड़ी से राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान ‘हजरत’, चन्द्रशेखर आजाद, मनमथनाथ गुप्त, शचीन्द्रनाथ बख्शी, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी सहित दस लोग शाहजहानपुर से सवार हुए। सब लोग अलग-अलग डिब्बों में बैठे। आलम नगर और काकोरी के बीच जंजीर खींचकर गाड़ी को रोका गया। अशफाक़ ने तिजोरी को हथौडे़ से तोड़ डाला और खजाना लूट लिया गया। सब लोग फरार हो गये। राम प्रसाद बिस्मिल के दो निकट के सहयोगियों ने विश्वासघात करके क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार करवा दिया। अशफाक उल्लाह बनारस चले गये जहाँ कई क्रान्तिकारियों ने उन्हंे सहयोग किया। वहाँ से बिहार में डाल्टनगंज में शिक्षक हो गये। कई माह तक पढ़ाते रहे। वहाँ से हिन्दू वेश में मथुरा चले गये। कई माह गुजार कर वह दिल्ली आ गये। एक नजदीकी व्यक्ति ने उन्हें पहचानकर दिल्ली मंे 8 सितम्बर 1926 को गिरफ्तार करा दिया। उन्हें लखनऊ लाया गया। मुकदमा चला। शचीन्द्र चन्द बख्शी, राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्लाह खान एक ही जेल में थे परन्तु उन्हें बिस्मिल से अलग कोठरी मंे रखा गया था।
फाँसी से पहले उन्हांेने नमाज पढ़ी और आदत के अनुसार कुरानशरीफ की तिलावत की। सुबह छः बजे फाँसी के तख्ते पर चढ़े और कहा, ‘‘मेरे ऊपर लगाये गये सारे इलजाम गलत हंै, खुदा के सामने इंसाफ मिलेगा।’’ यह कहकर खुद ही फाँसी का फंदा गले मे डाल लिया। यह शहादत 19 दिसम्बर 1927 को हुई। उनका शव लखनऊ से शाहजहानपुर लाया गया और शहादत के दस घन्टे के बाद उन्हें दफ़ना दिया गया।
मैं अशफाक की कब्र पर एक दिन जरूर जाऊँगा और कहूँगा कि तुम्हारे और तुम्हारे ’राम’ के देशवाले सैकड़ों खानों में तकसीम हो-होकर जहरीले हो चुके हंै, फिर से आकर जंग लड़ो!!!