युवा कलम

बगैर जन सहभागिता के सम्बन्ध के......

बगैर जन सहभागिता के सम्बन्ध के
संभव नहीं विकास की ड़गर
    भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है। इसे चलाने में यहाँ के प्रत्येक नागरिक की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। हम चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग कर अपने प्रतिनिधि का चयन करते हैं और वह प्रतिनिधि देश चलाने में अपनी भूमिका का निर्वहन करते हैं। कही हमारी सहभागिता इतने में ही तो सिमट नहीं रह जा रही है। कहीं हमारा दृष्टिकोण सिमट के सीमित तो नहीं हो जा रहा है। आज हमें आगे बढ़ने के सामुदायिक सहभागिता, महिला सहभागिता, संसाधन सहभागिता, राननितिक सहभागिता, स्वच्छता आदि के लिए भी अपनी सहभागिता बढ़ाने की आवश्यकता है। बढ़ती गन्दगी, कई प्रकार के प्रयासों के बाद भी प्लास्टिक को नहीं रोक पाना, जंगलों के क्षेत्रफल में कमी, मनुष्य व जानवरों का संघर्ष जैसे कई उदाहरण हैं जो कि सहभागिता से समाधान तक पहुँचाये जा सकते हैं। शिकायत करने से ज्यादा जरूरी है कि अपना योगदान सुनिश्चित किया जाय। सहभागिता के माध्यम से ग्रामीण अंचलों का विकास किया जा सकता है। शिक्षा के स्तर को और भी परिस्कृत किया जा सकता है। जो भी व्यक्ति जिस भी क्षेत्र में सक्षम है उसे उस क्षेत्र में अपना योगदान देने के लिए आगे आना ही होगा चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या चिकित्सा का या फिर तकनीकी से जुड़ा। यह क्रम अगर चल पड़े तो बड़े ही दूरगामी परिणाम हमें देखने को मिलेंगे। योगदान होना जरूरी है। कम या ज्यादा, समय और सामथ्र्य की बात है। इस समय सहभागिता कोे बढ़ाते हुए यह सोचना जरूरी है कि समाज में विषमताऐं पनप रही हैं। जो समस्याऐं अभिशप्त हो चुकी हैं उन्हें, कैसे कम या खत्म किया जा सके, क्योंकि शरीर में उत्पन्न रोग निदान न होने पर पूरे शरीर को ही अपनी चपेट में ले लेता है। हमारा उद्देश्य यह हो की हम कैसे व्यवसाय तकनीकी विकास, पोषण, चिकित्सा और योजनाओं को लोगों तक पहुंचाये, ताकि इसका लाभ हर वर्ग तक पहुंच सके। गावों से पलायन कम हो , संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके। रोजगार के नये अवसर पैदा हो सके। आज के दिन व्यक्ति भारत के किसी भी गाँव में बैठकर यूरोप की किसी भी मल्टीनेशनस कम्पनी को सेवाएँ उपलब्ध करा सकता है। इसी विचार धारा का लाभ लोगों तक पहुंचाने के लिये सामाजिक सहभागिता को बढ़ाना होगा। तभी विकास सम्भव हो पायेगा।