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बदलता नेपाल का महेंद्रनगर

चन्दन बंगारी, रामनगर-
भारत का नेपाल से रोटी बेटी का रिश्ता सदियों पुराना है। उमेश डोभाल सम्मान समारोह के आयोजन को लेकर टनकपुर में बैठक और स्थानीय पत्रकारों से मुलाकात के बाद भारत की सीमा से लगे नेपाल के महेंद्रनगर में जाने का कार्यक्रम अचानक तय हो गया। हम चार लोग मैं, उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट के सचिव एल मोहन, वरिष्ठ पत्रकार गणेश रावत, कार्तिक बिष्ट को घुमाने की जिम्मेदारी चंपावत जिले में ईटीवी के तेजतर्रार पत्रकार कमलेश भट्ट ने संभाली।
टनकपुर से शारदा बैराज पहुँचने पर साइकिल पर भारी भरकम सामान का बोझ डाले लोग नेपाल की ओर जाते दिखाई देते हैं जिनमें अधिकांश महिलाएँ होती हैं। पूछने पर पता चलता है कि ये लोग जरूरत के साथ ही बेचने के लिए भी सामान ले जाते हैं। पहाड़ों की तरह नेपाल में भी मेहनतकश महिलाएँ ही हैं। भारीभरकम सामान को खींचते हुए पसीने से लथपथ महिलाओं के चेहरे पे मेहनत की मुस्कान देखी जा सकती है। यहाँ मेहनत से लेकर हर काम में महिलाएँ आगे दिखाई पड़ती हैं। शारदा बैराज में अंग्रेजों की बिछाई ट्रेन की पटरी भी दिखाई पड़ती है। आश्चर्य की बात है कि आज तक ये पटरियाँ सही सलामत ही हैं। बैराज के पास रखा अंग्रेजी जमाने का इंजन बरबस ही ध्यान अपनी ओर खींचता है। बैराज से निकलती शारदा नदी आस्था का केंद्र होने के साथ ही कई किस्म के रंग-बिरंगे परिंदों का डेरा भी है। नदी का विहंगम नजारा बेहद खूबसूरत है। उत्तराखंड परिवहन निगम की मैत्री बस भी हमारे साथ ही महेंद्रनगर की ओर प्रस्थान करती है। दोनों देशों के रिश्तों को प्रगाढ़ करने के लिए बस की शुरुआत की गई थी। एसएसबी की चेक पोस्ट में एंट्री के बाद हम पहुँचते हैं नो मेंस लैंड के पार नेपाल की गड्ढा चैकी में। चैकी के पास बने कार्यालय से एंट्री पास जारी होता है और पास ही मनी चेंजर बैंक यानि नेपाली भाषा में ‘भारू/नेरू सटहि काउंटर’ भी है। जहाँ भारतीय मुद्रा के बदले नेपाली मुद्रा लेने की सुविधा है। यहाँ से करीब 12 किलोमीटर दूर महेंद्रनगर है। रास्ते में पके हुए गेहूँ के लहलहराते खेत और नए डिजाइन में बनते मकान दिखाई पड़ते हैं। हालांकि रास्ते में जगह-जगह लाल रंग से माओवादी पार्टी की ओर से भारत विरोधी नारे लिखे दिखाई पड़ते हैं। ये नारे ही नेपाल के लोगों में भारत के खिलाफ जहर फैलाते हैं और दोनों देशों के रिश्तों में तनाव भी पैदा करते हैं। मवेशी आंदोलन के दौरान सीमा से लगे क्षेत्रों में खासा तनाव था। बताया गया कि कुछ समय पहले लखीमपुर खीरी में एक नेपाली की हत्या के बाद महेंद्रनगर में भारतीय कार को आग के हवाले कर दिया गया था। कईं बार भारत की सीमा पर नेपालियों के साथ हुई वारदातों के बाद महेंद्रनगर और अन्य जगहों पर आए भारतीयों को आक्रोश झेलना पड़ता है।
महेंद्रनगर के एक आलीशान होटल के एक हिस्से में बने कैशिनो में नौजवान भारतीयों की भीड़ दिखती है। कैशिनो में नेपाली लोगों के खेलने पर मनाही है। कैशिनो में बड़ी संख्या में नौजवान आते हैं और रुपये लुटाकर घर लौट जाते हैं। साथी कमलेश बताते हैं कि यहाँ खेलने वालों में से जीतने वालों की तादाद 5 से 10 फीसदी ही होती है। चस्का ऐसा कि जीतने के अगले ही दिन वो ज्यादा जीतने के चक्कर में हार जाता है। वैसे भारत में नोटबंदी के बाद कैशिनो में खेलने वालों की संख्या में गिरावट हुई है। अब महेंद्रनगर के बाजार में वैसी रौनक नहीं दिखाई पड़ती है। सड़कों के किनारे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मोबाइल, बाइक, कार और इलेक्ट्रानिक उत्पादों के शोरूम और आलीशान होटल चकाचैंध बढ़ाते हैं। लेकिन सड़कों में बेहतर सफाई होने के साथ ही वाहनों की रेलमपेल नहीं दिखती है। महिलाओं और युवतियों में फैशन का क्रेज ज्यादा है। सड़कों में ज्यादातर साइकिल दिखती हैं। लेकिन टुकटुक भी सवारियाँ ढोते नजर आते हैं। उच्च वर्ग के लोग महंगी बाइक और कार घुमाते दिखाई देते हैं। होटल और दुकानों में शराब मिलना आम बात है। कमलेश भाई की गुजारिश पर महेंद्रनगर की प्रसिद्ध और लजीज डिश शेकुवा का आनंद भी उठाया। चटनी, परमल के साथ बकरे के मांस को कबाब की तरह भट्टी में पकाकर परोसा जाता है। इसे खाने के लिए मजबूत दाँतों की जरूरत होती है। नेपाली लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं।
महेंद्रनगर में नेपाल की सरकारी बस सेवा नहीं है। यही कारण है कि यहाँ का बस अड्डा बदहाल है। माँ काली बड़ी ट्रेवल्स कंपनी है। इसी कंपनी की बसें ही भारत के साथ मैत्री सेवा में चलती हैं। महेंद्रनगर और आसपास के क्षेत्रों में भारत सीमा से व्यापार की वजह से यहाँ के लोग आर्थिक रूप से मजबूत तो हैं, लेकिन इसके बाद के क्षेत्रों में रहने वाले गरीबी की मार झेल रहे हैं। गरीबी की वजह से ही नौकरी के लालच में बड़े पैमाने पर लड़कियों को भारत लाया जाता है और फिर देह व्यापार के दलदल में धकेल दिया जाता है। हालांकि सीमा पर चैकसी और एनजीओ की सक्रियता से कईं केस पकड़े जाने के बाद तस्करी थोड़ा कम हुई है। घूमने और नेपाल की अन्य चीजों को समझने के लिए वक्त ज्यादा चाहिए था, लेकिन हमारे पास वक्त की कमी थी। सो अगली बार नेपाल को और ज्यादा करीब से जानने का मन में इरादा रखकर वापस लौटना पड़ा। हाँ, साथ में नेपाल में प्रसिद्ध चाऊ चाऊ (मैगी) के पैकेट भी साथ ले आये, अलग सा स्वाद चखने की चाह में। शुक्रिया नौजवान पत्रकार साथी कमलेश का, जिन्होंने हमें रोचक जानकारियों के साथ रोमांचक सैर कराई। जल्द फिर मिलने के वादे के साथ।