अवर्गिकृत

बाबा नीब करौरी ‘महाराज’

अनिल पंत, नैनीताल-
महाराज जी के परम् भक्तों की संस्मरण कथायें पिछले अंकों में आप पढ़ ही चुके हैं। इस अंक में महाराज जी के परम् भक्त कथावाचक व्यास जी जो प्रतिवर्ष श्रावण मास में नैनीताल के परमाशिवलाल साह धर्मशाला में कथा की संस्करण प्रकाशित किये जा रहे हैं।
महाराज जी के बारे में बनारस के प- शंकर प्रसाद व्यास जी बताते हैं कि महाराज जी ने गंगा किनारे उनके द्वारा राम कथा सुनी थी जो उन्हें बहुत अच्छी लगी और उन्होंने कैंची आश्रम में उनसे कहा कि इन पर्वतों में सिð आत्मायें वास करती हैं तू इन्हें रोज दिन में हनुमान जी की कथा सुनाया कर। कैंची के निर्जन स्थान में उन दिनों श्रोतागणों की संख्या बहुत कम थी। कुछ ही ग्रामीण महिलायें उनकी कथा सुनने आती थीं। व्यास जी का विद्वतापूर्ण प्रवचन बृहत् जन समुदाय मंs हुआ करता था। इस परिपेक्ष्य में उन्हं यह कार्य नीरस प्रतीत होने लगा। किसी प्रकार वे तीन दिन तक यह कार्य करते रहे। तदन्तर आपने बाबा जी से निवेदन किया कि कथा तो वे बराबर सुना रहे हैं पर उनकी कथा सुनने वाले यहाँ पर नहीं हैं। बाबा बोले ‘‘तुम्हें लोगों से क्या लेना, हमने तुझसे सिð आत्माओं को कथा सुनाने के लिए कहा था।’’ वे फिर बोले ‘देख कल एक बुडि़या भी कथा सुनने आयेगी। उसकी भद्दी शक्ल देखकर उससे घृणा मत करना नहीं तो वह श्राप दे जायेगी।’ दूसरे दिन जब वे इस अरूचिकर कार्य को करने लगे तो उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ। कृष्ण बलराम कुटी जहाँ कथा सुनाने की व्यवस्था थी, का कमरा प्रतिष्ठित व्यक्तियों से भरा था। उपस्थित लोगों में श्री कमलापति त्रिपाठी मुख्यमंत्री, उ- प्र-, श्री वाई- पी- चह्वाण, केन्द्रीय गृहमन्त्री, श्री श्यामा चरण शुक्ला, मुख्यमंत्री म. प्र. और अनेक राजनैतिक दल के नेतागण, और इन सबके आगे वह बुडि़या भी बैठी थी जिसका वर्णन बाबा कर चुके थे। प्रवचन के समाप्त होने पर वह बुडि़या सबसे पहले कमरे से बाहर चली गयी और ऐसी गायब हुई कि फिर नहीं दिखाई दी। यह सब खेल बाबा की प्रेरणा शक्ति था। कथा सुनने का नियन्त्रण किसी को दिया ही नहीं गया था न ही इसका प्रचार ही किया था।
व्यास जी महाराज इसी तरह अनेक संस्मरण सुनाते हैं और कहते हैं कि महाराज ने कहा कि तुम श्रावण मास नैनीताल के धर्मशाला में राम कथा सुनाकर जनकल्याण का कार्य करो। तब से आज तक प्रति वर्ष श्रावण मास में व्यास जी महाराज के आदेश पर भक्तजनों को राम कथा सुनाया करते हैं और कहते हैं कि मुझे आभास होता है कि एक निश्चित स्थान पर बैठकर महाराज भी प्रतिदिन कथा सुनते हैं।
व्यास जी अपना अनुभव सुनाते हुए कहते हैं एक दिन कैंची मन्दिर में शाम के समय महाराज जी के साथ टहलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। महाराज जी मेरे कन्धे पर हाथ रखकर चल रहे थे। वे अपने विचारों में मग्न दिखाई दिये। मैं भी मौन चल रहा था। एकाएक मेरे मन में विचार आया कि लोग महाराज जी को हनुमान जी का अवतार कहते हैं। इस बात पर विश्वास कैसे किया जाय? मेरे ऐसा सोचते ही लगा कि मेरे कन्धे पर रखा महाराज का हाथ कुछ भारी प्रतीत हुआ और धीरे-धीरे भार बढ़ता ही चला गया। यहाँ तक कि कन्धा जवाब देने लगा। हाथ सहज रूप से मेरे कन्धे पर पड़ा था और उनका आकार यथावत् था। मैं भीतर ही भीतर बहुत परेशान हो गया और हाथ को हटाने में भी संकोच कर रहा था। ऐसी विवशता में मैं मन ही मन महाराज से प्रार्थना करने लगा कि मुझे मेरी धृष्टता के लिये क्षमा करें। ऐसा कहते ही स्थिति पूर्ववत हो गयी और मेरी धारणा पक्की हो गयी कि महाराज निश्चय ही हनुमान जी के अवतार हैं । महाराज की अनेक छवियों में एक छवि ऐसी भी है जिसमें महाराज का बाँया हाथ वानर (हनुमान) की तरह है।