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बिटिया के बहाने

बिटिया के बहाने
इन्दिरा उपे्रती ‘रश्मि’
गुडि़या की फ्राकें सिलना
उसे सजाना, उसे संवारना
दो पल सुकून के चुरा लेना
गुडि़या से खेलती हूँ, अक्सर
बिटिया के बहाने.............
यथार्थ की दुनिया जहां
एक दूसरे को बेवकूफ बना लेने की होड़
जीने के बहाने मिटाने की होड़
मुस्कुरा लेती हूँ अक्सर
बिटिया के बहाने............
इतनी सुन्दर - सुन्दर ‘गुडि़याएं’
तब नहीं होती थीं शायद
होती भी होंगी, पर थीं पहुँच से कोसों दूर
शौक पूरे कर लेती हूँ अब, अक्सर
बिटिया के बहाने.............
दो पल के लिए ही सही
पर बचपन की, बिन बैर भाव की
ताजगी भरी, खुशनुमा दुनियाँ में
सैर कर लेती हूँ अक्सर
बिटिया के बहाने.............
सुना था बचपन लौट आता है दोबारा से
बच्चों के बहाने से
मेरा तो ‘सर्वस्व’ लौट आया है
बिटिया के बहान............