संपादकीय

ब्रिटिश काल में कुमाऊँ पत्रिकारिता

ब्रिटिश काल में कुमाऊँ पत्रिकारिता
अनिल सिंह भरड़ा, नैनीताल -
राष्ट्रीय आंदोलन, स्वतंत्रता संघर्ष में पत्रकारिता ने बड़ी भूमिका निभाई थी। यह धरासणा आंदोलन में जेम्स मिलर का प्रभाव था कि अंगे्रज सरकार जाँच के लिए तैयार हुए एवं अन्य आंदोलनों के समय भी पत्रकारिता ने हर वाक्ये को महत्ता से प्रकाशित किया। तभी तो बाल गंगाधर तिलक (केसरी, मराठा), गांधी जी (नवजीवन, हरिजन) आदि ने अपने पत्रों, अखबारों के माध्यम से आंदोलन को मजबूत धार दी। पत्रकारिता ही वह हथियार था जो सदैव अपनी बात कहने मनवाने का माध्यम बना। देश के किसी भी कोने में हो, चाहे वर्तमान में हो या पुरातन, सदैव पत्रकारिता के जरिये अपनी बात की अभिव्यक्ति बहुत अच्छे तरीके से होती है।
ब्रिटिश काल में स्वतंत्रता के लिए सम्पूर्ण भारत लड़ रहा था। कुमाऊँ क्षेत्र भी किसी न किसी तरीके से आंदोलन में अपनी भूमिका के लिए तैयार रहता था। पत्रकारिता को माध्यम बनाकर कुमाऊँ में भी आंदोलनों की शुरूआत हुई । जब विनोद (1868, नैनीताल) के प्रकाशन के साथ स्थानीय पत्रकारिता का उदय हुआ। शीघ्र ही अल्मोड़ा अखबार (1871 अल्मोड़ा कुर्मांचल समाचार (1893, अल्मोड़ा) आदि पत्र प्रकाशित होने लगे एवं कुमाऊँ कुमुद (1922 अल्मोड़ा), स्वाधीन प्रजा (1930 अल्मोड़ा), समता (1935, अल्मोड़ा), प्रमुख पत्र थे। इन पत्रों ने स्थानीय आंदोलनों को राष्ट्रीय आंदोलनों से जोड़ने के अलावा स्थानीय मुद्दों जैसे जातिवाद, सांमतीकरण आदि मुद्दों को प्रकाशित किया जो समाज में असमानता की भावना को बढ़ाते थे। कुछ विशेष वाक्ये जैसे सन् 1911 में अल्मोड़ा में जार्ज पंचम के राजतिलक के अवसर पर आयोजन हुआ। जिसमें दलितों को प्रवेश नहीं करने दिया गया। इस घटना ने शिल्पकारों को अपना उत्थान करने के लिए और अधिक प्रेरित किया। सन् 1935 में समता में हरिप्रसाद टम्टा ने 1911 की इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा-
‘‘इन्ही बातों की बदौलत मेरे दिल में इस बात की लौ लगी थी कि मैं अपने भाइयों को दुनिया की नजरों में इतना ऊँचा उठा दूं कि लोग उन्हें हिकारत की निगाहों से नहीं बल्कि मुहब्बत और बराबरी की नजरों से देखें।’’
सन् 1913 में नैनीताल में सुनकिया गांव में शिल्पकारों का शुद्धिकरण करके जनेऊ संस्कार करने की घटना को लेकर स्थानीय स्वर्ण समाज में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और शिल्पकारों ने मुक्ति संघर्ष तीव्र कर दिया।
राष्ट्रीय आंदोलनों में जान फँूकने हेतु जो इन पत्रों का शीर्षक होता था वही दिलों में जोश जगाने के लिए काफी था जैसे भारत छोड़ो आंदोलन के समय जब प्रेस बन्दी लागू हुई तो शक्ति 1942-1945 तक प्रकाशित न हो सका। उसके पश्चात् जनवरी 1946 में एक नये शीर्षक के साथ-ये जिन्दगी है कौम की तू कौम पे लुटाये जा।
इसी तरह कुमाऊँ कुमुद भी-
‘‘सत शांति शील क्षमा दया धर पाँव जग में दीजिये।
परद्रोह को तज प्रेम से मिल देश सेवा कीजिये। ’’
इनके अलावा भी अन्य स्थानीय मुद्दों जैसे 1921 के कुली बेगार प्रथा को समाप्त करने में शक्ति पत्र का योगदान, जंगल कटाव के विरोध में शक्ति पत्र के लेख हमेशा स्मरणीय रहेंगे। स्वाधीन प्रजा के प्रथम वर्ष के लेख जो ‘‘कुमाऊँनी लोक गीत ये जंगल तुम्हारे है’’ और ‘‘कमाऊँ की क्रान्ति’’ बेहद विस्मरणीय हैं।
अतः स्थानीय मुद्दों राष्ट्रीय आंदोलनों आदि में कलम के द्वारा क्रान्ति जैसी बात संभवतः पूर्ण लगती है जो अनेक महान व्यक्तियों, उनके विचारों, लेखों द्वारा संभव हो सका जो सदैव प्रेरणा स्रोत हैं।