अपना शहर

भयावह चीड़

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
जंगल की आग को रोकने हेतु चीड़ के जंगलों में कटौती के उत्तराखंड सरकार के हाल के प्रस्ताव ने एक नया विवाद पैदा कर दिया है तथा लोग इस कदम को लेकर बहुत आशंकित हैं। एक कठोर प्रजाती के रूप में चीड़ ने उत्तराखंड में वन क्षेत्र का कुल 71 प्रतिशत में से 16 प्रतिशत से अधिक भू-भाग में अधिक्रमण कर लिया है और वहीं चीड़ के पिरूल जंगलों में आग लगने के मुख्य कारणों में से एक हैं। लोग आरोप लगाते हैं कि इस प्रकार उत्तराखंड सरकार बिल्डर माफिया को खाली भूमि उपलब्ध करा देगा, जो खनन माफिया के साथ बहुत शक्तिशाली हो गए हैं। वन भूमि की हजारों हेक्टेयर भूमि पर अतिक्रमण किया गया है, लेकिन वन विभाग एक मूक दर्शक जैसा बना हुआ है। इसी प्रकार हाल के दिनों में कुमाऊँ के तराई क्षेत्र में वन भूमि का 16,000 हेक्टेयर कृषि माफिया ने कब्जा कर लिया हालाँकि इस मामले में ग्रीन ट्रिब्यूनल को सूचित कर दिया गया, लेकिन विरोध का एक स्वर भी विभाग द्वारा नहीं हुआ। इसी तरह उत्तराखंड में अब तक आद्रभूमि की पहचान और रिकाॅर्ड के नहीं होने का बिल्डर माफिया खूब फायदा उठा रहे हैं। उन्होंने बेशर्मी से इन भूमि पर अतिक्रमण कर ग्रुप हाउसिंग तथा व्यावसायिक योजनाओं की प्रलोभित शुरूआत की है। इस संबंध में नैनीताल झील की जीवन रेखा माने जानी वाली सूखाताल - जो आद्र्रभूमि है, में अतिक्रमण के खिलाफ एक जनहित याचिका भी दायर की गई है।
कुछ एक्टिविस्ट और पर्यावरणविदों ने चीड़ को हिमालय प्रणाली की पारिस्थितिकी हेतु एक खलनायक के रूप में परिभाषित किया है क्योंकि यह जंगलों में आग का कारक है, एक सूखा एवं शुष्क वातावरण बनाता है, भूमि में अन्य वनस्पतियों को नहीं होने देता, तथा जिसे अधिक राजस्व जुटाने हेतु अंग्रेजों द्वारा बढ़ावा दिया गया था। एक सामाजिक कार्यकर्ता संजय साह कहते हैं, ”जहाँ बार-बार जंगल में आग लगती है वहाँ जल संसाधनों का स्तर नीचे चला गया है तथा पानी के स्रोत भी सूख गए हैं“।
चीड़, एक बड़ा सदाबहार वृक्ष है जो बढईगिरी हेतु उपयोगी लकड़ी प्रदान करता है, तथा जिसे संशोधित करने के पश्चात अंग्रेजों ने रेलवे में स्लीपरों के रूप में भी इस्तेमाल किया था। यह रेसिन के तौर में भी राजस्व बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। चीड़ के पिरूल को अधः पतन के बाद गोबर के साथ मिश्रण करने पर खाद के रूप उपयोग किया जाता है तथा इसका इस्तेमाल मवेशियों के लिए गर्म बिछोना हेतु भी होता है। विश्वविख्यात परिस्थिति विज्ञान शास्त्री प्रोफेसर एस पी सिंह के अनुसार ”चीड़ के जंगलों में प्रजातियों की विविधता कम और वन्य जीवन दुर्लभ होता है। इनकी मृदा में जैविय क्षमता या धरण तथा पोषक तत्व की मात्रा कम होती है। बारिश के कारण होने वाले कटाव को रोकने में भी यह कम सक्षम होता है। लेकिन चीड़ एक कठोर प्रजाति एवं दबाव सहिस्णु वृक्ष है जो भूस्खलन से अव्यवस्थित स्थानों, क्षतिग्रस्त भूमि को स्थापित करने का सामथ्र्य रखता है। यह सफलतापूर्वक किसी भी अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियों की तुलना में संभवतः बेहद कम नमी और पोषक तत्वों वाले स्थानों पर आसानी से उत्पन्न हो जाता है“।
मिओसिन काल से चीड़ हिमालय में मौजूद है। वह गरम वैश्विक जलवायु का समय था इसलिए उस अवधि के दौरान दो प्रमुख पारिस्थितिकी तंत्रों जंगलों और घास ने पहली बार अपनी उपस्थित बनाई थी। एक प्रख्यात इतिहासकार स्वर्णलता रावत दृढता से कहती हैं ”19 वीं सदी के आगे के वानस्पतिक सर्वेक्षण भी चीड़ को देशी प्रजातियों की श्रेणी में लाते हैं“।
चीड़ के जंगलों में आग लगने के अवसर पर बोलते हुए कुमाऊँ के मुख्य वन संरक्षक राजेंद्र सिंह बिष्ट कहते हैं ”बारिश के बाद घास के उत्पन्न होने से गर्मियों के दौरान चीड़ के जंगलों में चीड़ के पिरूल और कूड़े को जलाने की पहाड़ों में एक पारंपरिक प्रथा है, जिसके कारण जहाँ चीड़ की तुलना में अन्य अधिकांश प्रजातियाँ पनप नहीं पाती हैं, वहीं चीड़ के बीजों का अंकुरण प्रतिशत अच्छा रहता है। अगर यह चारे का एक महत्वपूर्ण स्रोत होता तो नियमित रूप से चीड़ के जंगलों में लगने वाली आग कभी लगती ही नहीं“।
प्रोफेसर सिंह जोड़ते हुए कहते हैं, ”पर्यावरण कार्यकर्ता अक्सर जोर देकर कहते हैं कि चीड़ पाॅलिथीन की भाँति है जो आसानी से विघटित नहीं होता। यह हास्यास्पद है क्योंकि चीड़ के पत्ते अपघटित होकर जैविक पदार्थ बनाते हैं। हालांकि यह सत्य है कि उनकी अपघटन गति चैड़ी पत्ती की प्रजातियों की तुलना में धीमी होती है। लेकिन हिमालय के उच्च स्थानों में ठंडे मौसम की कई प्रजातियां एक धीमी या इसी तरह के अपघटन दर की होती हैं। अपघटन की धीमी गति शायद पोषणहीन स्थानों में उपयोगी हो सकती है क्योंकि पोषक तत्व का निकलना क्रमिक तथा पारिस्थतिकी तंत्र से घटना सीमित मात्रा में होता है“।
कोई भी प्रणाली कितनी भी स्थिति-स्थापक या मजबूत हो लेकिन हर वर्ष की आग को नहीं झेल सकती है। चीड़ इसलिए नहीं विषमतापूर्वक फैला है क्योंकि यह सरकार और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार राक्षसी प्रवर्ती का बताया गया है बल्कि इसका कारण आबादी और पशुओं के घनत्व में बढ़ोत्तरी, ऊपरी मृदा का क्षरण तथा मानवीय लालच के कारन उत्पन्न हुई विक्षुब्ध व्यवस्था है। बंजर ढलानों के बजाय हरे चीड़ का जंगल होना ज्यादा बेहतर है और यदि आवश्यक हो तो इन जंगलों को हटाने हेतु छोटे क्षेत्रों में प्रायोगिक आधार पर चरणों में मंजूरी दी जानी चाहिए।