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भारतीय शिक्षा में ईसाई मिशनरियों की भूमिका

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
औपनिवेशिक भारत में ईसाई मिशनरी ने प्रभावशाली अभिनेताओं का किरदार निभाया है। इस चिंता से कि यह भारतीय धार्मिक संवेदनशीलता में विघ्न न डाले, ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने क्षेत्रों में इनके काज-काम पर प्रतिबंध लगा दिया था, पर तत्पश्चात ईसाई मत को लेकर बढ़ती हुई लोकप्रियता के बाद सन 1843 से इनके संचालन की अनुमति दे दी गई। पहले के कुछ मिशन स्कूल बॉम्बे प्रेसीडेंसी, बंगाल तथा पंजाब में स्थापित किए गए। इस अवधि के दौरान मिशनरियों ने भारत को परिणत और यहाँ की रूढिवादिता को बदलने हेतु पश्चिमी छात्रवृत्ति के कोष की उपयोगिता को उचित माना। सन 1857-58 के विद्रोह के पश्चात आधिकारिक तौर पर मिशनरियों के काम-काज पर रोक लगा दी गयी परन्तु जैसा कि मेथोडिस्ट चर्च के रेवरेड फादर एडमंड बताते हैं कि विडंबना यह थी कि ”वे शिक्षा पर हावी होने आये थे और अपने मत का प्रचार करने के प्रयासों में पश्चिमी शिक्षाशास्त्र के उपयोग का अधिकारी भी उन्हें ही बना दिया गया।“
वर्तमान समय में ईसाई मिशनरी स्कूलों ने गैर-ईसाई दक्षिण एशियाई अभिजात वर्ग के लोगों में शिक्षा के क्षेत्र में मुख्य भूमिका निभाई है। शिक्षाविद् फादर हरमन मिंज कहते हैं, ”पूर्व की ईसाई मिशनरियों ने भारतीयों में काफी हद तक धार्मिक अंधविश्वास के उन्मूलन में भागीदारी निभाई। परन्तु सन 1858 के बाद मिशनरी संस्थाओं और ब्रिटिश शिक्षा नीति के मध्य एक मौलिक अंतर आ गया था। मिशनरी संस्थानों ने शायद धर्मान्तरण पर बल दिया लेकिन उन्होंने कभी भी भारत की प्राचीन संस्ड्डति एवं शिक्षा प्रणाली को कमतर नहीं माना। दूसरी तरफ मैकाले का अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी शिक्षा को लेकर बहुत ही आंशिक रवैया था।“ अंग्रेजों का उद्देश्य ऐसे लोगों के एक वर्ग को बनाना था जो खून और रंग से तो भारतीय हांे लेकिन विचार से अंगरेज हांे। दूसरे शब्दों में उन्होंने ब्रिटिश शासन में निचले वर्ग में पदांे को भरने हेतु भूरे रंग के अंग्रेजों को बनाना शुरू कर दिया था। प्राचीन भारतीय ज्ञान के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए मैकाले ने कहा था ”हमारे सामने प्रश्न यह है कि क्या हमें ऐसे चिकित्सा और ज्योतिष विज्ञान को सिखाना चाहिए जो अंग्रेजांे के लिए शर्मनाक हो।“ यह बयान उसकी सांप्रदायिक अभिमान और अज्ञानता को दर्शाता है। अब ब्रिटिश लेखकों ने भी मैकाले की संकीर्ण सोच को स्वीकार कर लिया है। लेकिन दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद भी शिक्षा प्रणाली जिसका आधार मैकाले द्वारा क्लर्क बनाने के लिए किया गया था, में कोई बदलाव नहीं किया गया। हालाँकि, पूर्व और वर्तमान में मिशनरी संस्थाओं ने ऐसे विद्यार्थी तैयार किये जो प्रगतिशील हैं तथा जाति, पंथ या धर्म से ऊपर सोच रखते हैं।
कापुचीन चर्च के फादर कुलदीप कहते हैं भारत के अन्य भागों की तरह, ईसाई मिशनरियों ने 19 वीं सदी में स्वतंत्रता के बाद कुमाऊं और गढ़वाल में स्कूलों की स्थापना का कार्य शुरू कर दिया था। मिशनरी यहाँ के मानवीय मूल्यों से अवगत थे तथा उनकी शिक्षा प्रणाली मानवता और स्वतंत्रता पर आधारित थी, जहाँ किसी भी जाति और वर्ग के छात्रों को दाखिला दिया जाता था। उनके द्वारा दिए जाने वाली शिक्षा का उद्देश्य पश्चिमी यूरोपीय विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का पाठ पढाना था। वर्तमान परिस्थितियों में भी उनका उद्देश्य राष्ट्र-निर्माण हेतु शिष्ट, अच्छे हरफनमौला तथा अच्छे नागरिकों को तैयार करना है। उनका ध्यान शिक्षा तथा शारीरिक फिटनेस के मध्य एक सुनहरा संतुलन कायम करना है। मिशनरी संस्थाऐं ऐसे विद्यार्थियों का निर्माण करने पर विश्वास नहीं करतीं जो सिर्फ  तक ही सीमित हो, यही कारण है इन स्कूलों के छात्र प्रत्येक क्षेत्र में उत्ड्डष्टता दिखाते हैं जहाँ उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पूर्व में मिशनरियों ने उत्तराखंड के नैनीताल, मसूरी, रानीखेत, देहरादून और पौड़ी आदि क्षेत्रों में उत्ड्डष्ट संस्थान खोले जिसके फलस्वरूप आज यह प्रदेश स्कूली शिक्षा हेतु एक शैक्षिक केंद्र बन गया है। राज्य के विभिन्न हिस्सों में अन्य संस्थाऐं भी खुली हैं, लेकिन उनमे तथा मिशनरी संस्थाओं में बहुत बड़ा अंतर है। सेवानिवृत्त प्राचार्य स्वर्ण लता रावत कहती हैं, ”मिशनरी स्कूल छात्रों का सर्वांगीण विकास, क्षमता निर्माण, शैक्षिक भ्रमण तथा कार्यशालाओं आदि के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण पर ध्यान केंद्रित करता है। यहाँ शिक्षकों और छात्रों के मध्य एक अनुकूल संबंध बना रहता है। स्कूल पर्यावरण तथ वृक्षारोपण के कार्यक्रमों पर भी ध्यान केंद्रित करता है।“
शिक्षकों की चयन प्रक्रिया भी भिन्न होती है। पढ़ाने के साथ-साथ वे नेतृत्व और अभिनव विचारों के गुणों के साथ सह-पाठयक्रम गतिविधियों में स्कूल के लिए एक परिसंपत्ति होते हैं। साक्षात्कार के बाद भावी शिक्षक को अपनी खुद की पसंद के विषय पर एक व्याख्यान कक्षा में देना होता है। स्कूल के छात्रों को सामान्य पृष्ठभूमि से आये छात्रों के साथ कार्य करने हेतु प्रोत्साहित किया जाता है, गांव भ्रमण गतिविधियों से भी बच्चों को जोड़ा जाता है तथा हिल स्टेशनों पर स्थित मिशनरी स्कूलों के छात्रों को शहर की सभी गतिविधियों में शामिल किया जाता है। उन्हें प्रगतिशील होना सिखाया जाता है एवं मानवीय मूल्यों को उनमें कूट-कूट कर भरा जाता है। आॅल सेंटस कालेज,नैनीताल की प्रधानाचार्य किरण जरमायाह ने एकदम सही अभिव्यक्त किया है, ”उन्हें जीवन में उत्तम लड़ाई लड़ने हेतु सिखाया जाता है, Certa Bonum Certamen.