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भारत छोड़ो आंदोलन

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
9 अगस्त को सम्पूर्ण भारत ने भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगाँठ के तौर पर ‘अगस्त क्रांति’ या कहें अगस्त रेवोलुशन मनाई। सन् 1939 में द्वितीय विश्व यु़द्ध के दौरान भारत, जो ब्रिटिश साम्राज्य का एक हिस्सा था, ने धुरीय शक्तियों के साथ युद्ध की स्थिति जैसा घोषित कर दिया था। काँग्रेस पार्टी ने यह रुख अपनाया कि यद्यपि वे फासीवाद के विरोध में थे परन्तु वे ब्रिटिश का भी समर्थन नहीं कर सकते थे। अधिनायकवादी राज्यों और ब्रिटिश साम्राज्य के औपनिवेशिक ताकतों के बीच कोई अंतर नहीं था। भारतीय लोगों की सहमति के बिना भारत को युद्ध में घसीटा जा रहा था, और यह भारत द्वारा छेड़ा हुआ युद्ध भी नहीं था। इसके अतिरिक्त कांग्रेस ने उम्मीद की थी कि समर्थन के रूप में भारत से ब्रिटिश वापसी का बिना शर्त प्रस्ताव प्राप्त कर सकेंगे, पर ऐसा हो न सका। तटस्थता कांग्रेस की आधिकारिक नीति थी। ब्रिटिश को बातचीत की टेबल पर लाने के प्रयास में गाँधीजी ने मुंबई में एक बड़े मैदान में अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की, जिसका नाम बाद में ‘अगस्त क्रांति मैदान’ पड़ गया। इस दौरान अहिंसक प्रतिरोध की पेशकश करने हेतु एक विस्तृत योजना को बनाया गया जिसमें गाँधीजी ने अपना प्रसिद्ध उद्घोष ‘करो या मरो’ का नारा दिया। इसी के साथ स्वतंत्रता प्राप्ति या उस प्रयास में मरने हेतु भारतीयों ने अंतिम संघर्ष शुरू कर दिया। अहिंसक प्रतिरोध की पेशकश करने हेतु एक विस्तृत योजना को बनाया गया लेकिन गांधीजी के भाषण के चैबीस घंटों के भीतर राष्ट्रीय और अन्य स्तर पर लगभग सभी कांग्रेसी नेताओं और उनमें से बड़ी संख्या को कारावास से ही युद्ध करने के लिए उनमें डाल दिया गया।
आंदोलन का अप्रत्यक्ष प्रभाव ब्रिटिश कुमाऊँ पर भी पड़ा, जिसके अंतर्गत ब्रिटिश काल में तीन जिलों - अल्मोड़ा, नैनीताल तथा ब्रिटिश गढ़वाल आते थे। तथा गढ़वाल के अन्य भाग में तत्कालीन परमार शासकों को पुर्नस्थापित किया गया। कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर एचएस धामी से कहते हैं, ”अल्मोड़ा राजनीति का एक गर्म पखवाड़ा था, जहाँ 9 अगस्त को मुंबई में कांग्रेस स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन के रूप में बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में स्थानीय नेतागण सड़कों पर उतर आये थे। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया जिसके एवज में छात्रों ने तुरंत ही पुलिसबल पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया तथा जिससे कुमाऊँ आयुक्त एक्टन गंभीर रूप से घायल हो गया। फलस्वरूप अल्मोड़ा के लोगों पर 6000 रुपयों का जुर्माना लग गया तथा दो छात्र चतुर सिंह बोरा और नत्थू लाल को जेल में बंद कर दिया गया। सरकारी इंटरमीडिएट काॅलेज के शिक्षकों को भी दंडित किया गया तथा जुर्माने के रूप में उनका एक माह का वेतन काट दिया गया।“
अल्मोड़ा की घटना के पश्चात कुमाऊँ भर में यह आंदोलन दहकती हुई आग की तरह फैल गया। द्वाराहाट में दो छात्र नेता हीरा सिंह महर और परमानंद भंडारी ने ग्रामीणों को उकसाया पर इससे पहले कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर सकती, वे फरार हो गए। 18 अगस्त के दिन पुलिस ने देघाट (मल्ला चैकोट) में प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाई जिसमें हरिकृष्णा और हीरा मणि ने राष्ट्र के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया। डा॰ हीरा सिंह भाकुनी के विचार में, ”सालम में ग्रामीणों ने विदेशी दासत्वता के प्रति विरोध किया जिसे दबाने के लिए सरकारी अधिकारियों को भी भेजा गया, परन्तु वे सफल न हो सके। तत्पश्चात् सेना को उन्हें सबक सिखाने के लिए तैनात किया गया। इस भयंकर लड़ाई में दो निडर सेनानी नर सिंह धनक तथा टीका सिंह कन्याल ने अपने जीवन की आहुति दे दी तथा यह लड़ाई के भीषण ज्वार में तब्दील हो गयी। परिणामस्वरुप जाट सैनिकों को निडर प्रदर्शकों की आवाज को दबाने हेतु तैनात किया गया। शुरुआत में जाट सैनिकों ने आतंक की बर्बरता फैलाई, परन्तु शीघ्र ही उन्हें भी पीछे हटना पड़ा और ग्रामीणों ने 43 बंदूकें तथा चार दर्जन हथकडि़यों को जब्त कर लिया। आंदोलन के नायक राम सिंह आजाद को गिरफ्तार नहीं किया जा सका, लेकिन गांधी जी के कहने पर उन्होंने बद्रीनाथ के मंदिर में आत्मसमर्पण कर दिया।“
सल्ट के लोगों ने भी ब्रिटिश सेना के दमन से लड़ने में अनुकरणीय साहस का प्रदर्शन किया। 5 सितंबर के दिन दो भाइयों गंगा राम तथा खीम देव की सल्ट कांग्रेस के मुख्यालय, खुमान में गोली मारकर हत्या कर दी गयी। चूड़ामणि तथा बहादुर सिंह भी गंभीर रूप से घायल हुए तथा चार दिनों बाद चोट के कारण वीरगति को प्राप्त हो गए। उसी दिन 5,000 से अधिक ग्रामीण खुमान में इकठ्ठा हुए तथा गिरफ्तार होने के पश्चात उनके नेता कुला सिंह ने ब्रिटिश को उन्हें वैसे ही मार दिखाने की चुनौती दे डाली जैसे उन्होंने उनके निर्दोष देशवासियों को मार डाला था। एक स्थानीय इतिहासकार डा॰ रितेश साह के विचार से, ”कौसानी और पड़ोसी गांवों में जहाँ सात स्वतंत्रता सेनानी जेल में शहीद हो गए थे, वहाँ गाँधीजी ने अपने दो शिष्यों शांति लाल त्रिवेदी तथा कैथरीन मैरी हेइलमन (सरला बहन) को कुमाऊँ में कौसानी में सक्रिय भाग लेने के लिए भेजा था। यहाँ ‘शैल‘ गांव में कुल 40 परिवारों में से आठ ने आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और यही से दीवान सिंह भाकुनी ने भी जेल में वीरगति को प्राप्त किया।”
लेखक प्रख्यात इतिहासकार एवं पर्यावरणविद् हैं।
’अंग्रेजी के मूल लेख से हिन्दी में अनुवादित