विचार विमर्श

भूमिया भाग 1

बसन्त लाल वर्मा हल्द्वानी
गाँव आज भी पटवारी, पटवारी है। अपने इलाके का हाकिम, जिसे चाहे नचा दे, जिसे चाहे फँसा दे। बाद में भले ही कुछ हो, लेकिन कुछेक दिनों के लिए नींद तो उड़ा ही देता है।
पटवारी की कही बात को पलटने का मतलब है, गंगनाथ का चिपट जाना।
अगर नाराजगी गंगनाथ की हो या गोल्लू की हो, तो भी कोई खास बात नहीं है। अपने ईष्ट देव ठहरे। फूल-पाती, धूप-बाती दे कर माफी माँग ली, खुश हो जाते हैं। लेकिन नाराजी से बिदके पटवारी को मनाने के लिए अगर चार धाम के देवता भी आ कर, उसके सामने घुटने टेक दें, तो भी उसका मुँह, गुस्से से टेड़े का टेड़ा रहता है। सीधे मुँह बात कर दे, तो पटवारी किस बात का?
गाँव में, जब से ये पटवारी आया था, तभी से वह इलाके में अपनी ताकत व हस्ती का झन्डा फहराता आ रहा था।
चन्द सालों में, पटवारी ने अच्छी खासी रकम जोड़ कर, अल्मोड़ा में अपना मकान बना लिया था और बच्चों का एडमिशन पब्लिक स्कूल में करा दिया था। अपने बच्चोें को अंग्रेजी की किताबें पढ़ते देख, पटवारी को उनके डी0 एम0, एस0 डी0 एम0 या इन्जीनियर या डाक्टर बनने के सपने दिखाई देते थे।
और सटवारी-सटवारी को शराब पीने की बुरी लत न लगी होती, अनाप-शनाप पैसा फूँकने की आदत पड़ी न होती, तो शायद उसके घर के भी नैन नक्श, उसके गाँव वालों की आँखों में रिटते रहते। लेकिन तीन साल तक इस पटवारी का साया बन कर भी, वह अपने घर की रसोई की छत ही बदल सका था। इसी बात को लेकर, अपनी बीबी के साथ, कभी-कभी उसकी तनातनी हो जाती थी।
आँगन में बैठा पान सिंह, बीड़ी पीता, घर की ओर देख सोचने लगा कि इतनी सुबह-सुबह, कौन लोग आ रहे हैं? और कहाँ जा रहे हैं?
नीचे का उतरते वो लोग, झाड़ी की ओट में कभी ओझल हो जाते तो कभी दिखाई देते। कुछ पल के बाद उसे तीन लोग लमालम उतरते नजर आए।
पान सिंह उन्हें पहचानने की कोशिश करने लगा लेकिन सूरज की रोशनी सीधे मुँह में पड़ने के कारण, उसकी आँखें झिलमिला गईं।
ठीक से नहचान सकने के कारण, पान से दाएँ हाथ की हथेली को झाँप की तरह भौंह के ऊपर रखा और सिकोड़ता गौर से देखते हुए पहचानने की कोशिश करने लगा।
खिमानन्द की कही बात सही निकली कि वो लोग उससे मिलने आने वाले हैं।
हरूवा की उछल कूद करती चाल, पटवारी के हाथ में घूमता डन्डा और सटवारी के कन्धे में लटकता झोला देख कर, पान सिंह को तीनों को पचानने में कोई देर नहीं लगी।
वो तीनों जिव पगडन्डी से अब उतर रहे थे, वह रास्ता उसके खेतों के किनारे होता, सीधे उसी के मकान मंे आ कर मिलता था।
उसने आँगन में चटाई बिछा कर, ऊपर से दन डाल दिया।
पान सिंह के घर में कदम रखते ही थाली को दोनों हाथों में थामे, पान सिंह का लड़का आँगन में खड़ा हो गया। पान सिंह ने लपक कर, एक एक गिलास चाय सब को दे दी। सभी सुडुक-सुडुक चाय पीने लगे।
क्रमशः