विचार विमर्श

भूमिया भाग 2

बसन्त लाल वर्मा, हल्द्वानी
‘‘भूमिया क्या होता है कह रहे हैं आप? बताऊँऽऽऽ क्या होता है?’’ पटवारी की भौंहें तन गई। उसकी आवाज में रूआब की गुर्राहट गूँजी।
गुप्ता काँप गया। उसकी समझ में नहीं आया कि पटवारी का दिमाग अचानक क्यों खराब हो गया? वह भौंचक पटवारी को देखने लगा।
भूमिया को श्रद्धा से नमन करने वाले पटवारी के दिल को, गुप्ता की बदतमीजी व अनर्गल बातों से, ठेस लगने के कारण, पटवारी की आँखों में गुस्सा कूदने लगा। उसकी जुबान, बिना लगाम दौड़ते घोड़े की तरह बेकाबू हो गई। वह आग बरसाता बोला, ‘‘सुना भी है आपने कभी भूमिया का नाम? जानते भी हैं आप कुछ भूमिया के बारे में? जो मन में आया, बक दे रहे हैं। मुझसे आप कह रहे हैं कि कमाल की बात कर रहा हँू। कमाल की बात मैं कर रहा हूँ या आप? सोच समझ कर बात किया करो। अपने को बहुत बड़ा अफलातून समझते हैं आप?’’
गुस्से के कारण तमतमाया पटवारी का चेहरा देख, गुप्ता के बदन में कँपकपी छूट गई।
अपनी नासमझी पर शर्मिन्दा होते हुए गुप्ता ने हाथ जोड़ कर माँफी माँगी। वह खुशामद करता बोला, ‘‘गलती हो गई पटवारी जी। आइन्दा भूमिया के बारे में एक लब्ज़ नहीं कहूँगा। अब तो नाराजगी छोडि़ए। आप इस मामले को किसी भी तरह सुलझाइए। आप जो कहेंगे, मुझे मंजूर है।’’
गुप्ता समझा कि उसकी बात सुन कर पटवारी मोम की तरह पिघल जाएगा? हाँ, पटवारी की बेकाबू जुबान जरूर थम गयी।
गुप्ता का मायूस चेहरा देख, पटवारी उस पर तरस खाता बोला, ‘‘भूमिया-भूमिया है सेठ जी। आपको यह मालूम नहीं कि वह जितना कृपालु है, उतना ही रूद्रालु भी है। अगर मैंने भूमिया के मन्दिर बनवाने के काम में बाल भर भी अड़चन पैदा कर दी तो मैं बेमौत मारा जाऊँगा। मेरा तो खानदान पागल हो जाएगा। कभी बच्चा बिना वजह बेहोश होगा तो कभी घरवाली रोटी पकाते-पकाते ऐंठ जाएगी। कभी भैंस अचानक दूध देना बन्द कर देगी, कभी गाय को बाघ ले मरेगा। आपका क्या बिगडे़गा? आप तो कार में बैठ कर फर्रऽऽ से दूसरी जगह चल देंगे। लोग तो मुझे चूतिया कहेंगे।’’
पटवारी की आन तान की बातें सुन, गुप्त के हलक में काँटे उतर आए। उसकी कुछ समझ में नहीं आया कि वह कैसे अपनी बात को समझाए? विमूढ़ सा बैठा वह पटवारी का मुँह ताकने लगा।
गुप्ता को गनेल की तरह चिपका देख, पटवारी ने कहा, ‘‘माफ करना सेठ जी, मैं इस चक्कर-वक्कर में नहीं पड़ता। बाल बच्चेदार आदमी हूँ। जब जान है तो जहान है। सब कुछ देखना पड़ता है सेठ जी। आगे-पीछे सोचना पड़ता है। मेरी मानो तो आप भी ये जमीन-वमीन का खुँमार अपने दिमाग से उतार दीजिए। जितना भगवान ने दिया है उस पर सन्तोष कीजिए। खोपड़ी में लिखा किसने देखा है? किसने सोचा था कि पान सिंह भूमिया मन्दिर व पाठशाला के लिए जमीन दान दे देगा?’’