विचार विमर्श

भूमिया भाग 3

बसन्त लाल वर्मा, हल्द्वानी
पटवारी की बातें सुनकर, गुप्ता के दिमाग की नसंे चटकने लगीं।
सहारा पाने की नीयत से उसने गर्दन घुमा कर प्रश्न भरी नजर से हरूवा को देखा।
हरूवा ने आँगन में बँधे कुत्ते की तरह हिम्मत तानी और गुप्ता को छोटे बच्चे की तरह डाँटते कहा, ‘‘मेरी ओर क्या देख रहे हो? हैंऽऽऽ। ठीक तो कह रहे हैं पटवारी जी। अब क्या हो सकता है?’’
गुप्ता ने हरूवा को मनाने की कोशिश की लेकिन हरूवा उतना ही अधिक बिदकता बोला, ‘‘आप क्या चाहते हैं कि मैं गाँव वालों की आँखों में मिर्च भी झोंक दूँ और आपके कारण, सोने का हिरन बन कर, भूमिया से छल भी करूँ? हो सकता है ऐसा? बचूँगा मैं? जीते जी कीडे़ पडें़गे मुझ पर। मरते वक्त दो घूँट पानी पिलाने वाला नहीं मिलेगा मुझे। आपको अपनी पड़ी है।’’
‘‘लेकिन तुमने तो कहा था कि फिक्र करने की कोई बात नहीं है। सब ठीक हो जाएगा।’’ गुप्ता ने कहा।
‘‘जब कहा था, तब कहा था। उस वक्त की बात कुछ और थी, अब की बात कुछ और है।’’ हरूवा ने झल्लाते कहा। ‘‘याद है आपको मीटिंग में जब मैंने मन्दिर बनाने की बात टाल देने को कहा था तो टोपी बचानी मुश्किल हो गई थी मेरी।’’
गुप्ता के तन-बदन में आग लग गई। उबाल खाते गुस्से को दबाते हुए उसने कहा,‘‘अब क्या होगा? कुछ बताइए?’’
पटवारी दोनों की बात सुन कर चुस्की लेने लगा।
‘‘अब बताने को रह ही क्या गया है? सुना तो आपने भी होगा भूमिया को जमीन दान देने की बात? कहिए तो दाननामा दिखा दूँ?’’ हरूवा ने थप्पड़ सा जवाब देते हुए कहा, ‘‘देवी देवताओं के सामने, मेरी क्या, किसी की मर्जी चल सकती है क्या? आप क्या समझ रहे हैं कि दाननामा वापस हो जाएगा? पान सिंह है वो पान सिंह, खिमानन्द का जिगरी दोस्त। जिसने पटवारी की बात टाल दी। जमीन देने वाला होता तो तो उसी दिन दे देता जब हम उसके घर गए थे।’’
गुप्ता का माथा ठनक गया। उसे जैसे उसके सुनहरे सपनों का एक पंख कट कर, उसी जमीन के टुकड़े पर गिर गया है, जिसे खरीदने के लिए वह ऊँची उड़ान भर रहा था।
बोझिल दिमाग को हल्का कर के, गुप्ता ने घायल और चरमराती आवाज में कहा, ‘‘पटवारी जी, अगर पान सिंह की जमीन का सौदा नहीं हुआ तो मैं बड़ी मुसीबत में पड़ जाऊँगा। कुछ सोचिए? अब आप ही कुछ मदद कीजिए। आप चाहें तो अभी भी सब कुछ कर सकते हैं।’’
‘‘मदद के लिए मैं हर वक्त हाजिर हूँ सेठ जी। पर एक राय देना चाहता हूँ, अगर आप बुरा न मानें?“ पटवारी ने व्यंग से कहा।
”हाँ-हाँ जरूर दीजिए। आपकी राय सिर आँखों पर“ गुप्ता को लगा जैसे प्यासे को पानी दिखा दिया है।