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मधुमक्खी पालन - कुमाऊँ में सतत विकास हेतु पाँचवां घटक

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
कुमाऊं की पहाडि़यों में ग्रामीण क्षेत्रों के साथ साथ तराई और भाभर क्षेत्र में भी मधुमक्खी पालन काफी लोकप्रिय है। फसल उत्पादन क्षेत्र में इसके महत्व को कुछ प्रगतिशील किसानों ने समझा है जिसके फलस्वरूप यह तेजी से खेती के एक अभिन्न अंग के रूप में अवतरित हो रहा है। परंपरागत कृषि में मिश्रित खेती अथवा बागवानी, पशुपालन और वानिकी के साथ फसल उत्पादन, कृषि के चार मुख्य एवं अभिन्न एकीत घटक होते हैं, परन्तु अब मधुमक्खी पालन पांचवें घटक के रूप में आगे आ रहा है। कुमाऊँ में मधुमक्खी पालन के इतिहास पर कार्य करने वाले वरिष्ठ नागरिक बी एल शाह दृढ़ता से कहते हैं ”कुमाऊं में शहद को एकत्र करने का कार्य बहुत ही प्राचीन समय से चला आ रहा है तथा मधुमक्खियाँ उस समय से ही अपनी बुद्धि, उद्यमिता एवं रचनात्मकता के कारण प्रशंसनीय भी मानी गई हैं। कुमाऊँ में दूध और शहद उर्वरता के द्योतक हैं और हिंदू धर्म में ‘मधु’ या शहद अमरत्व के पांच अमृत  में से एक होता है, अन्य चार हैं घी, दूध, चीनी और छाँछ। कुमाऊँ के मंदिरों में, ‘मधु अभिषेक‘ या देवी-देवताओं को शहद से स्नान कराने की प्राचीन परम्परा अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय है। शहद को सम्पूर्ण फूलों के मिश्रित रस के रूप में वर्णित किया जाता है, इसलिए यह अनेकता में एकता का प्रतिनिधित्व भी करता है।”
वेदों में मधु एवं इसके उत्क्रांत होने का विस्तृत उल्लेख है और शहद के छत्ते को सूर्य के समान वर्णित किया गया है। मधुमक्खियाँ शहद को इनकी कोशिकाओं में उत्पन्न करती हैं जिसे सूर्य का अमृत भी कहा जाता है। एक अन्य रूपक के अनुसार, चारों वेद मधु के समान हैं जो सूर्य की भाँति मीठा, सुंदर एवं सुनहरा होता है। कुछ विशिष्ट मधुमक्खी प्रजातियों की बदौलत एवं उत्तराखंड से प्रारंभ हुई चिकित्सा की आयुर्वेदिक प्रणाली के अंतर्गत उपचारात्मक मधु को आठ अलग-अलग प्रकार में वर्गीत किया गया है। कुल मिलाकर, स्वास्थ्य एवं कई अन्य समस्याओं से निपटने के लिए मधु के साथ दी जाने वाली 634 से अधिक औषधीय तरीके देखने को मिलते है।
कुमाऊँ में जंगलों से मधु को एकत्र करने की प्राचीन परम्परा है। ‘राजकीय मौनपालन केन्द्र’ ज्योलिकोट से गोविंद बल्लभ पाठक के अनुसार ”पहले के समय में ग्रामीण धुएँ का उपयोग कर जंगलों से जंगली मधुमक्खियों के छत्तों से शहद इकट्ठा करते थे हालांकि यह प्रथा कहीं-कहीं अभी भी प्रचलन में है। इस तरीके से मधुमक्खियों का ध्यान छत्ते को बचाने में चला जाता है और वे कम आक्रामक बन जाती हैं। मधुमक्खियों की इस शांत स्थिति का लाभ उठाते हुए, छत्ते को निकाल दिया जाता है और उसमें से शहद को छान कर उपयोग में लाया जाता है। बाद में मधुमक्खियों को लुभाने के लिए घर की दीवारों पर छेद बनाकर और उसके बाद मधुमक्खी की काॅलोनियां को लकड़ी की खोखली दरख्तों में बनाने के लिए उनका उपयोग किया जाने लगा। कुमाऊँ और उत्तरी भारत के अन्य भागों में मधुमक्खी के छत्तों और आधुनिक मधुमक्खी पालन तरीकों को ‘मौनपालन केन्द्र‘ ज्योलिकोट से शुरू किया गया। यह केन्द्र सन 1938 में राजेंद्र नाथ मुटू द्वारा स्थापित किया गया था।” केंद्र ने छत्तों को दरख्तों से बदलकर टोकरी में बनाना शुरू कर दिया, इसके बाद हूवर छत्ता और उसके बाद सात फ्रेम के ज्योलिकोट छत्ते के नाम से जाने जानी वाले अभिनव तरीकों की शुरुआत हुई। ज्योलिकोट में स्थित मधुमक्खी पालन केंद्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त है और यह कुमाऊँ में ही नहीं वरन देश और नेपाल के विभिन्न भागों में मधुमक्खी पालन के प्रसार में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। यह मुफ्त में देश के विभिन्न भागों से ग्रामीणों और उद्यमियों को लंबी एवं छोटी अवधियों के प्रशिक्षण भी प्रदान करता है। उत्तराखंड राज्य से मधुमक्खी पालन करने वाले रामेश्वर सिंह के अनुसार, ”कुमाऊँ में मधुमक्खी पालन हेतु वृहत क्षमता है। शहद अति महत्वपूर्ण भोजन की श्रेणी में आता है और नकद आय भी देता है। वहीं मधुमक्खी के मोम की बाजार में काफी मांग है जिसे शहद से दोगुनी दर पर खरीदा जाता है। मधुमक्खी पालन से फूल के पौधों में परागण द्वारा जैव विविधता को बनाए रखने में मदद मिलती है। यह ग्रामीणों और वन आधारित समुदायों को स्व-रोजगार एवं गावों के शिक्षित युवाओं को संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन से जोड़कर रोजगार प्रदान करता है। इस प्रकार मधुमक्खी पालन कुमाऊँ की अर्थव्यवस्था को बदलने की क्षमता रखता है। एक अध्ययन के अनुसार, मधुमक्खी की 100 कालोनियों (छत्तों) से सालाना 2 लाख रुपये तक की शुद्ध आय अर्जित की जा सकती है। पराग केसर, फूल के परागकोष में उत्पादित होने वाले उत्पादक इकाइयों को कुमाऊँ के किसी भी हिस्से से उत्पादन कर गरीब किसानों की आय में वृद्धि की जा सकती है।“ यह भी देखा गया है कि मधुमक्खी पालन से विभिन्न फसलों की उपज तथा गुणवत्ता में वृद्धि हुई है जिसके फसलस्वरूप इसे ड्डषि एवं बागवानी के सतत विकास हेतु पाँचवे एवं सबसे महत्वपूर्ण इकाई के रूप में अपनाया गया है, अन्य चार हैं बीज, खाद, सिंचाई और कीटनाशक। यह अब आवश्यक हो गया है कि अन्य किसानों को भी प्रेरित किया जाए कि वह मधुमक्खी पालन को कृषि प्रणाली का अभिन्न अंग बनायें और अपनी आजीविका को सुदृढ कर सकें।