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मधुमेह की रोकथामः विश्व स्वास्थ्य दिवस

मधुमेह की रोकथामः विश्व स्वास्थ्य दिवस
प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के तहत प्रत्येक वर्ष 7 अप्रैल के दिन वैश्विक जागरूकता के रूप में विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। सन 1948 में सम्पन्न हुई पहली विश्व स्वास्थ्य सभा में सन 1950 से विश्व स्वास्थ्य दिवस को मनाने का निर्णय लिया गया था। उत्तराखंड चिकित्सा सेवा के निदेशक पद से सेवानिवृत्त डाॅ अनिल साह ने इस संदर्भ में कहा था,”विश्व स्वास्थ्य दिवस को विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना, और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे बड़े कार्य की तरफ विश्व का व्यापक ध्यान आकर्षित करने के रूप में मनाया जाता है।” वह जोड़ते हुए कहते हैं,”प्रत्येक वर्ष डब्ल्यूएचओ स्वास्थ दिवस को अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर विशेष विषय पर मनाता है, इस वर्ष का विषय ‘मधुमेह को पराजित‘ करना है।”
डब्ल्यूएचओ के दिशा निर्देशों के साथ विश्व स्वास्थ्य दिवस 2016 मनाने का राज्य सरकार का उद्देश्य निम्न है (अ) कम और मध्यम आय वर्ग के लोगों में मधुमेह बिमारी की हो रही वृद्धि  को रोकने हेतु जागरूकता बढाना (ब) रोग से पीडि़त लोगों के लिए उपाय, मधुमेह को रोकने, निदान और इलाज हेतु अभिनव प्रयास करना (स) तथा निगरानी बढ़ाना।
उत्तराखंड सरकार का ध्यान ‘मधुमेह को पराजित‘ करना रहा है, यह काफी हद तक निवारण होने वाला गैर-संक्रामक रोग है जो तेजी से विकसित दुनिया के कई देशों में आये दिन बढ़ रहा है। उत्तराखंड में स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो वर्षों में मधुमेह के मामलों में वृद्धि  हुई है। स्वास्थ्य विभाग के पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार 2013 में मधुमेह के रोगियों की संख्या 42,570 थी जिसमें से 4,407 टाइप 1 मधुमेह और 38,163 टाइप 2 मधुमेह की बीमारी से पीडि़त थे। वर्तमान में राज्य में टाइप 2 मधुमेह के रोगियों की दो लाख से अधिक की संख्या है जिसमे लड़कियों की तुलना में लड़के इस रोग से अधिक पीडि़त हैं। पूर्व में उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर, देहरादून और हरिद्वार के मैदानी इलाकों में शहरीकरण और आर्थिक समृधि  के कारण मधुमेह के रोगियों में तेजी से बढोत्तरी देखने को मिली थी। देहरादून से एंडोक्राइनोलजिस्ट डाॅ सविता अग्रवाल के अनुसार ”बढ़ती हुई आय एवं जंक फूड खाने के कारण कैलोरी की खपत में बढ़ोत्तरी हो जाती है। इन जिलों में अन्य जिलों की तुलना में अमीर लोगों की संख्या ज्यादा है जो सुस्त जीवन जी रहे हैं। अगर वे अपने जीवन शैली और खानपान की आदतों में परिवर्तन नहीं करते हैं, तो मधुमेह महामारी की तरह जैसे देश के कई अन्य भागों में फैला है, यहाँ भी फैल जाएगा।” दुर्भाग्य से अब पहाड़ी जिलों में भी जीवन शैली में परिवर्तन के कारण मधुमेह रोगियों की संख्या में बड़ी वृद्धि  हुई है। पूर्व में लोग पैदल चलना ज्यादा पसंद करते थे लेकिन अब अधिक मोटर सड़कों और वाहनों के कारण गांवों में भी ग्रामीणों ने इस आदत को छोड़ दिया है। उत्तराखंड चिकित्सा सेवा के संयुक्त निदेशक डाॅ ललित रावत दृढ़ता से कहते हैं, ”मधुमेह की बीमारी जो पहले 40 साल से ऊपर के लोगों में अधिक होती थी अब तेजी से युवाओं में बढ़ रही है। वर्तमान में ऐसे रोगियों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है जिनकी उम्र 20 साल से कम है। इसलिए युवाओं में मधुमेह की बढ़ती बीमारी चिंता का विषय है।”
टाइप 2 मधुमेह की बीमारी में शरीर इंसुलिन का प्रतिरोधी हो जाता है। यह मुख्य रूप से लोगों में मोटापा और पर्याप्त व्यायाम की कमी के कारण होता है। इस बीमारी को सामान्य वजन को बनाकर नियमित रूप से व्यायाम और एक स्वस्थ आहार लेने से रोक जा सकता है। सरल जीवन शैली से टाइप 2 मधुमेह की बीमारी को रोका या इसके शुरू होने में देरी की जा सकती है तथा इसका निदान आत्म प्रबंधन, शिक्षा और उपचार के माध्यम से भी किया जा सकता है।
मधुमेह की अधिक गंभीर बीमारी, टाइप 1 में इंसुलिन की कमी के कारण अग्न्याशय में इस्लेट कोशिकाओं का बनना बंद हो जाता है। अगर इस बीमारी का इलाज समय रहते नहीं किया जाता है तो इससे आँखें, गुर्दे, नसों और हृदय को नुकसान होने का खतरा बढ़ जाता है जो बाद में कोमा या मृत्यु का भी कारण बन सकता है। टाइप 1 मधुमेह को कभी-कभी ‘किशोर मधुमेह‘ भी कहा जाता है क्योंकि यह आम तौर पर बच्चों और किशोरों में अधिक होता है, हालांकि यह हर किसी उम्र में देखा गया है।
एक अनुभवी और नैनीताल के लोगों के डाॅक्टर, डाॅ डी सी अवस्थी कहते हैं, ”उत्तराखंड में मधुमेह एक बड़ी समस्या है जिसे सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ निपटाया जाना चाहिए। रोग सम्बंधित दवा, समूह के हस्तक्षेप और जागरूकता शिविरों से रोग को कम और मधुमेह रोगियों में रुग्णता तथा मृत्यु दर को कम किया जा सकता हैं।” मधुमेह के उपचार में चैबीसों घंटे की प्रतिबद्धता  की आवश्यकता है। सचेत प्रबंधन और बेहतर जीवन शैली के विकल्पों द्वारा जीवन के खतरों को कम तथा मधुमेह से संबंधित जटिलताओं को नियंत्रित किया जा सकता है।