एक संदेश

मरना एक गाँधी का

मरना एक गाँधी का
डाॅ॰ दीपा कांडपाल, नैनीताल
इतने वर्षो बाद भी
ताजा है इस देश की हवाओं में
मरना एक गांधी का।
चिथड़े-चिथड़े हो रहे हैं
अब भी
सत्य के प्रयोग करने वाले सिर
इस तरह टुकड़े-टुकड़े में
मर रहे हैं गाँधी जी फिर-फिर
जब कि
गांधी एक व्यक्ति नहीं विचार है
ऋषि परम्परा का
दैनिक व्यवहार है
अपनी माटी में सजने वाले
सपनों का आकार है
जो टूट सकता है
बिखर सकता है
मगर मर नहीं सकता
क्योंकि उसके चिंतन का
शाश्वत आधार है
इतना बलवान समय भी
उन द्यावों को मरहम नहीं
दे पा रहा है
वरन्
इतिहास मुखौटा पहनकर
खुद को आज भी
दोहरा रहा है।