हमारे लेखक

मर्यादा

मर्यादा
हंसा बिष्ट
(राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त, पूर्व प्रधानाध्यापिका)
खुर्पाताल (नैनीताल)
हम अक्सर आमा (दादी) से यही सुनते-‘‘आपण खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूसा हर चीज में मर्यादाक् पालन करण चैंछ। मर्यादा में रै बेरन करि हर काम सही हुंछ।’’ (अपना खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा हर चीज में मर्यादा  का पालन करना चाहिए। मर्यादा में रहते हुए किया गया हर कार्य सही होता है।) वास्तव में पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित होकर बच्चे ऐसे कपड़े पहन रहे हैं जो आधा शरीर भी नहीं ढकते। ऐसा भोजन पसन्द करते हैं जो हमारे परिवेश में किसी प्रकार भी सही नहीं बैठता। ऐसा रहन-सहन पसन्द करते हैं जो भारतीय नहीं कहा जा सकता। आमा लोगों की बातें सुनकर बच्चे परेशान होकर सोचते कि आखिर हम आजकल के बच्चे ऐसा क्या कर रहे हैं जिससे मर्यादा भंग हो रही है। एक दिन हमने ईजा (माँ) से पूछा,‘‘ईजा मर्यादा पालन कसिक करि जाँछू।’’ (माँ मर्यादा का पालन कैसे किया जाता है।) हमारे हर प्रश्न का उत्तर देने के लिए ईजा के पास एक कहानी होती थी। उसी के माध्यम से वह हमें अपनी बात बड़ी आसानी से समझाती।
पुराने समय की बात है। राजा का दरबार लगा था। जहाँ फरियादियों को न्याय मिल रहा था। जनता की सुख-सुविधा की व्यवस्था के लिए चर्चा हो रही थी। याचकों (माँगने वालों) को धन व वस्त्र दिए जा रहे थे। कोई खाली हाथ नहीं जा रहा था। तभी माधव नाम का एक साधारण व्यक्ति दरबार में उपस्थित होकर बोला-महाराज मुझे आपकी सहायता के रूप में थोड़े धन की आवश्यकता है। राजा ने कहा,‘‘यदि तुम याचकों की पंक्ति में सम्मिलित होते तो तुम्हें भी उनके साथ-साथ धन मिल जाता और यदि याचक बनकर धन नहीं लेना चाहते हो तो सभा के सम्मुख किसी भी प्रकार की कला का प्रदर्शन करो। तुम्हें धन दिया जाएगा। राजा की बात सुनकर राघव वहाँ से चला गया।’’
दूसरे दिन लोगों ने देखा कि जंगल के पास वाले टीले में  कोई साधु महाराज शान्त मुद्रा में ध्यान मग्न बैठे हैं। धीरे-धीरे वहाँ लोगों की भीड़ लगने लगी। दर्शनार्थी महात्मा जी के आगे फल-मेवा, मिष्ठान्न आदि समर्पित करते, लेकिन उन्हें इन वस्तुओं से क्या लेना-देना। वे तो ईश्वर में ध्यान लगाए थे। आते-जाते लोगों द्वारा राजा के महल तक भी साधु बाबा की ख्याति पहुँच गयी। राजा अपने मंत्री के साथ सेवकों को लेकर दर्शन हेतु चल पड़े। राजा के सेवकों ने महात्मा जी के चरणों में सोने-चाँदी व धन से भरा थाल रखा, लेकिन उन्होंने उस थाल को देखना तो दूर अपनी आँखें भी नहीं खोली। राजा, मंत्री व सेवक थाल लेकर वापस लौट आए।
दूसरे दिन माधव पुनः दरबार में पहुँच कर कुछ धन की माँग करने लगा। राजा ने माधव को पहचान लिया और बोला-कल जब तुम साधु वेश में थे तुम्हें इतनी धन सम्पदा समर्पित की लेकिन तुमने उसे स्वीकार नहीं किया। आज फिर थोड़े से धन के लिए सहायता क्यों माँग रहे हो। माधव ने कहा-माधव महाराज मैंने साधुवेश में धन स्वीकार इसलिए नहीं किया मैं साधुवेश में ठगी नहीं करना चाहता था। मैंने साधुवेश की मर्यादा का पालन किया। आज में अपनी कला का मूल्य लेने आया हूँ। मैंने साधुवेश धारण कर कला का ऐसा प्रदर्शन किया कि एक राजा होकर आप भी दर्शन हेतु उपस्थित हो गए।
ईजा द्वारा सुनाई गयी कहानी से हम समझ गए कि व्यक्ति की सही वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन उसे मर्यादित रखते हैं उसी के अुनरूप उसका व्यक्तित्व भी होता है।।