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मलत-मलत नैना लाल भये

मलत-मलत नैना लाल भये
होली से ठीक पहले प्रदेश सरकार के नौ बागी विधायकों के ऐसा स्वांग रखा कि प्रदेश सरकार के माथे पर पसीना आ गया। वैसे तो जोड़-तोड़ की राजनीति नई नहीं है पर ऐसा विद्रोह किसी चलती हुई गाड़ी के पहिये के निकल जाने जितना गम्भीर है। ऐसा लगता है कि भाजपा के विरोध प्रदर्शन के दिन घोड़े की टांग तोड़ने का इल्ज़ाम भाजपा पर आया पर उसने बददुआ कांग्रेस को दे दी कि अपनी राजनीतिक लड़ाई में मुझे क्यों घसीटा। फिलहाल इस बात की कोई गारंटी तो नहीं है कि यह सब घोड़े की बददुआ से हुआ पर सरकार की चाल रोकने के लिये उसके पैरों पर वार जरूर हुआ है और यह वार उसके ही विधायकों ने किया है जो कि कांग्रेस के अंर्तकलह को दर्शा रही है। जहाँ कांग्रेस ने इसे विधायकों की खरीद फरोख्त के मामले से जोड़कर प्रस्तुत किया है वही भाजपा ने इसे कांगे्रस के अंर्तकलह का मामला कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। प्रदेश के हित और राजनीतिक दृष्टि से इसे सही कहा जाय या गलत इसके पीछे सभी के अपने-अपने तर्क हैं। जहाँ इसे बागी विधायक सही ठहराते हैं तो वहीं सरकार इसे धोखा। फिलहाल बागी विधायकों के तेवरों से उत्साहित भाजपा अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने में जुट गयी है। होली में ऐसे रंगों की उम्मीद कांग्रेस ने भी नहीं की होगी। भाजपा ने जहाँ सरकार को बर्खास्त करने की मांग की है वही मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सरकार को सुरक्षित बताया है। इसका निर्णय 28 मार्च को विधान सभा में होना सुनिश्चित हुआ है। वैसे जब से प्रदेश बना है तब से आन्तरिक राजननीति का स्तर किसी भी सरकार में जोड़ने का नहीं दिखा। मौका मिलने पर टांग खींचने से किसी ने भी परहेज नहीं किया। जिसके परिणाम स्वरूप प्रदेश की राजनीति को एक विशिष्ट पदक की और प्राप्ति हो गयी। भाजपा भले ही इस बात पर खुश हो पर कांगे्रस का यह बागी कुनबा उसके लिये कितना विश्वासपात्र साबित होगा और कांगे्रस को असहज में कर चुका इस बात की कितनी गांरटी लेगा कि भाजपा को दबाव मंे नहीं लेगा। बागी नेताओं में प्रमुख हैं-हरक सिंह रावत, विजय बहुगुणा, शैलारानी रावत, कुंवर प्रताप चैम्पियन, सुबोध उनियाल, शैलेन्द्र मोहन सिंघल, उमेश शर्मा, प्रदीप बत्रा और अमृता रावत। होली के इस स्वांग के बाद स्थिति कितनी नियंत्रण में है और सरकार पक्ष में यह 28 तारीख को स्पष्ट हो जायेगा। लेकिन यह स्पष्ट हो गया है कि कांगे्रस अपने बागी विधायकांे के सुर भांपने में नाकाम रही और जिसका खामियाजा उसे इस प्रकार चुकाना पड़ा। ऐसा नहीं कि यह सुर पहली बार उठे हांे लेकिन इस तरीके से घर की नाराजगी सड़कों तक आ जायेगी और सरकार की इज्जत का ऐसा तमाशा बन जायेगा कांग्रेस ने इतने गम्भीर परिणाम की कल्पना भी नहीं की होगी। 2017 में प्रदेश में चुनाव होने हैं और जनता के लिये यह एक मुद्दा जरूर है कि इस चुनाव में वह किस तरह का व्यवहार करे लेकिन उसके पास भी इस समय सीमित विकल्प ही दिख रहे हैं। क्षेत्रीय पार्टी जहाँ अपना अस्तित्व सामने लाने में सफल नहीं हो सकी हैं उसके कारण भी जग जाहिर हैं। देखना तो अब यह होगा कि ऊँट किस करवट बैठता है। कांग्रेस के लिये स्थिति तो होली के इस गीत की तरह हो गयी है-मलत-मलत नैना लाल भयै। प्रदेश सरकार इस आपदा से निकल पाएगी या नहीं और इससे हुए नुकसान से भरपाई किस प्रकार हो पायेगी ये 28 तारिख को स्पष्ट हो जायेगा कि अचानक आई इस आपदा का प्रबन्धन मुख्यमंत्री हरीश रावत किस प्रकार करते हैं।