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महात्मा गाँधी की ब्रिटिश कुमाऊँ की यात्राएं

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
अंग्रेजों ने कुमाऊँ गढ़वाल में 1815 में अधिपत्य किया और अंग्रेजों द्वारा अधिपत्य गढ़वाल को कई भागों में बाँटा गया, ब्रिटिश गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल ब्रिटिश गढ़वाल जिले के रूप में कुमाऊँ कमीश्नरी का भाग बना और टिहरी गढ़वाल राज्य गढ़वाल के परभार शासकों के विघटित राज्य के रूप में पुनस्र्थापित किया गया। 1915 में गाँधी जी पहली बार उत्तराखण्ड आए और उस साल वह केवल वर्तमान गढ़वाल मंडल के हरिद्वार और देहरादून ही गए। आर्य समाज के सदस्यों को संबोधित करने के लिए। प्रख्यात लेखक और इतिहासकार राजीव लोचन साह के अनुसार- कुमाऊँ के नेता 1918 से गाँधी जी से प्रार्थना करते रहे उनकी अविस्वणीय उपस्थित के लिए और उनको उत्साहित करने के लिए लेकिन वह कुमाऊँ में पहली वार 1929 में आए। 11 जून 1929 को उन्होंने कस्तूरबा, देवहास गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, प्यारे लाल, आचार्य ड्डपलानी और सुचेता ड्डपलानी के साथ साबरमती आश्रम छोड़ा और 14 जून को नैनीताल पहुँचे। नैनीताल के समीप ही ताकुला में उनके ठहरने के लिए प्रबन्ध किया गया। वह वहाँ राजीव लोचन साह के नाना ‘ममिया’ श्री गोविन्द लाल साह के साथ मोती भवन में रूके। उसी दिन सायं को नैनीताल के निवासियों के द्वारा एक विशाल रैली का आयोजन किया गया। जिसमें पंडित नेहरू और स्थानीय नेता उपस्थित थे। सायंकाल चन्द्रवंशी कुंवर आनन्द सिंह ने नैनीताल के लोगों द्वारा प्रस्तुत गाँधी जी के सम्मान में एक अभिनन्दन पत्र प्रस्तुत किया।
उसी दिन गाँधी जी ने नैनीताल की महिलाओं को संबोधित किया जो उनसे बहुत प्रभावित हुई और उन्होंने गाँधी जी को स्वतंत्रता संग्राम के लिए आभूषण दान दिए। उसी शाम गाँधी जी भवाली चले गए और लोगों से सम्पर्क कर अल्मोड़ा जिले के ताड़ीखेत चले गए। हिमालयन संग्रहालय के निर्देशक डा. हीरा सिंह भाकुनी के अनुसार उन्होंने वहाँ प्रेम विद्यालय का उद्घाटन किया जो कुमाऊँ में स्वतंत्रता संग्राम का केन्द्र बना। इस संस्थान के संस्थापक श्री भगीरथ पाॅडे थे। यह संस्थान इस क्षेत्र में उनके और उनके सहयोगियों के द्वारा असहयोग आन्दोलन का प्रतीक बना। 18 जून को गाँधी जी अल्मोड़ा पहुँचे। जहाँ चैघान पाटा में लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। रेवरैन्ड ई.एस. ओकले जो लोगों को उपनिवेशिक शासन के विरू( भड़का रहे थे उन्होंने अल्मोड़ा के नागरिकों की ओर से गाँधी जी के सम्मान में मानपत्र दिया। गाँधी जी लम्बी और थकावट पूर्ण यात्रा से थक गए फिर भी गला खराब होने के कारण उन्होंने लोगों को संबोधित किया और लोग एकाग्रचित्त होकर पूर्ण खामोशी के साथ उनको सुनते रहे।
इसके बाद गाँधी जी सौन्दर्य से पूर्ण प्रड्डति की छटा लिए कौसानी पहुँचे। 19 जून को वह कौसानी आए और तीन रातें वहाँ व्यतीत की। 22 जून को वह बागेश्वर पहुँचे और स्वराज्य भवन की नींव डाली। जो प्रसि( स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विक्टर मोहन जोशी के प्रयासों का फल था। 23 जून को गाँधी जी कौसानी लौट आए और एक रात वहाँ रहे कौसानी की रहस्यमय प्राड्डतिक छटा से प्रेरित होकर उन्होंने उल्लेखनीय गीता अनाशक्ति योग पुस्तक लिखी। जिस बंगले में गाँधी जी ने रात व्यतीत की अब वह अनाशक्ति आश्रम के नाम से प्रसि( है। यह पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है और गाँधीवादी दर्शन का केन्द्र है।
गाँधी जी 1939 में फिर कुमाऊँ आए और केवल नैनीताल में रहे। उन्हें यूनाइटेड प्रोविनसेस के गर्वनर मैकलम हैली ने निमंत्रण दिया था लेकिन गाँधी जी ने ताकुला में अपने घनिष्ट मित्र गोविन्द लाल साह के यहाँ रूकना उचित समझा, उनके पोते वरिष्ठ अधिवक्ता महेश लाल साह के अनुसार गाँधी जी की दूसरी नैनीताल यात्रा राजनैतिक थी लेकिन उन्होंने ताकुला में गाँधीधाम के उद्घाटन समारोह के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रमों में भाग लिया, जिस धाम की नींव उन्होंने 1929 में ताकुला में डाली थी। कुमाऊँ की पहली यात्रा में 14 जून से लेकर 4 जूलाई 1929 तक कुमाऊँ में रहे। इस यात्रा में उन्होंने दो सौ सत्तर मील की यात्रा की और कठोर पर्वत खण्डों के मार्गों पर भी उनको चलना पड़ा। पच्चीस स्थानों में उन्होंने भाषण दिए। 39 सम्मान पत्र लाखों रू॰ के आभूषणों सहित स्वतंत्रता संग्राम के लिए गए चैबीस हजार रू॰ उन्हें हरिजनों के कल्याण के लिए दिया गया। एक छोटे से शहर से इन रूपयों को प्रदान करना यहाँ के लोगों की दानशीलता का प्रतीक है।
गाँधी जी की उपस्थिति ने ही स्वतंत्रता संग्राम के लिए जन आन्दोलन के लिए लोगों को प्रेरित किया इसलिए गाँधी जी को सच्ची श्रदांजलि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान और उनके नैतिक मूल्यों को याद करना है।