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मुक्ति की तलाश में

राजशेखर पंत, नैनीताल -

ताई जी को आज फिर से अस्पताल में भरती कराना पड़ा। पिचासी वर्ष की उम्र, शरीर में आॅस्टिओपोरोसिस की समस्या के कारण नौ जगह फ्रैक्चर, चार वर्ष पहले पेसमेकर का लगना, और साथ में उनका अस्मेटिक होना, ब्लड प्रेशर की पुरानी समस्या अलग से- वो तो गनीमत है कि diabitic नहीं हैं। उनकी जिन्दगी, और जिसे साहित्यिक भाषा में ‘भोगा हुआ यथार्थ’ कहा जाता है, के बारे में गीता से ही सुना है। स्त्री होने के कारण, जो कुछ भी उनकी पीढ़ी के लिए भोगना स्वाभाविक था, शायद उन्होंने भोगा है। पति की तटस्थताय ईडिपस काॅम्प्लेक्स जैसे किसी किसी मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति के अन्दर सिमटे हुए वो सारे विरोधाभास जिन्हें उनके जमाने की पत्नियाँ या बहूए सामाजिक संगठन का एक स्वाभाविक हिस्सा मान कर चुपचाप स्वीकार कर लेती थीं- उनकी पीढ़ी की लगभग हर स्त्री की तरह उनके जीवन का भी एक अविभाज्य हिस्सा रहा है। मुझे याद है गीता के साथ मेरे विवाह के बाद जब मेरे माता पिता और मैंने उसके नौकरी करने या न करने, उसके पहनावे, अपने माता पिता के पास उसके रहने या जाने और मुझे मिलने वाली तनख्वाह के पैसों को खर्च करने जैसे निर्णयों का अधिकार पूरी तरह उसके ऊपर छोड़ दिया था तो ताईजी को खुशी के साथ साथ बहुत ताज्जुब भी हुआ था। मेरे द्वारा उनके रसोई घर में जा कर मूली को सिल-बट्टे में कूट कर अपनी पसंद का सलाद बनाना जैसी सामान्य सी चीजें उन्हें बहुत खुश कर देती थीं। अपने अतीत को कुरेदते हुए उन्होंने मुझसे एक दिन कहा था कि उनके जमाने में तो यह विश्वास आम हुआ करता था कि वैवाहिक बंधन में पुरुष की स्थिति टमाटर की बेल की तरह है, जिसका बचा रहना जरूरी है। जहाँ तक इस बेल को फैलने के लिए सूखी टहनियों (ठंगरों) की जरूरत है वो तो मिल ही जाते हैं। यानि कि जहाँ तक लड़की का प्रश्न है उसकी अहमियत उस झाड़ से ज्यादा नहीं है जिसके ऊपर बेल फैलती है। कुमाऊँनी भाषा में ताईजी द्वारा कही गयी यह उक्ति (अपुन लग बची रून चै, ठंगर तो कतुके मिल जानी) पर मैंने एक कहानी भी लिखी थी, लगुली टमाटर, जो प्रकाशन के बाद काफी चर्चा में भी रही। मुझे प्रायः लगता है कि रामायण, महाभारत और पुराणों के काल्पनिक कथानकों के साये में पली-बढ़ी यह पीढ़ी शायद सिर्फ त्याग और समर्पण के लिए ही आयी थी इस धरती पर। और फिर ताज्जुब होता है यह देख कर कि इन्हें कभी इस बात का आभास भी नहीं हुआ कि समाज को, परिवार को सँगठित करने के लिए किस तरह अपनी सारी जिंदगी होम कर दी इन्होंने। दूसरों के लिए ही जिए थे ये लोग, छोटी-छोटी सी चीजों में अपनी खुशियाँ तलाशते हुए, पति, बच्चों, सास, ससुर को अपना बनाया हुआ खाना पसंद आना ही एक बड़ी खुशी, बड़ी उपलब्धि थी इनके लिए। बीमार हैं ताईजी आज। पता नहीं कब तक जियेंगी। गीता पिछले एक महीने से उन्हीं के पास है। वह अक्सर पूछती है मुझसे ‘‘क्यों भोग रही हैं ताईजी इतना कष्ट, इन्होंने तो कभी किसी का बुरा सोचा भी नहीं होगा?’’ पर जिन्दगी शायद गणित का एक सीधा सपाट समीकरण भी तो नहीं है जहाँ 2+2 हमेशा 4 होता है। बहुत से ‘क्यों’ और ‘क्या’ हैं जिनका उत्तर हमें कभी नहीं मिल पाता। मुझे ब्रायन वीज की किसी किताब में पढ़ी कुछ बातें याद आती हैं- कभी कभी कष्टों को भोगना आने वाली मुक्ति की भूमिका बन जाता है। क्या है मुक्ति? क्या सिर्फ जन्म मरण की कथित मजबूरी से मुक्त होना भर? क्या यही जीवन की अंतिम परिणति है? मुझे याद आ रही है तोरू दत्त की एक कविता, जड़ भारत के पौराणिक आख्यान पर लिखी हुई। इतना बुरा तो नहीं है मोह की मुक्ति की तलाश ही जीवन का उद्देश्य बन जाये। वो जो अपने आस-पास हैं उन्हें प्यार करना गुनाह तो नहीं है। फिर क्यों बन जाती मुक्ति की तलाश जीवन का अंतिम उद्देश्य? बहुत से प्रश्न हैं जिनका उत्तर संभवतः इतना आसन नहीं है। ब्रायन वीज की किताब में ही जिक्र है एक समर्पित सी महिला का। जिसने अपना जीवन दूसरों की भलाई में ही खपा दिया, बगैर किसी फल की इच्छा किये हुए। जीवन के अंतिम पड़ाव में यही महिला पावों की किसी बीमारी के चलते बिस्तर तक ही सीमित रह कर चल बसी। उसकी पुत्री को - जिसे शिकायत थी कि ऐसा अंत क्यों हुआ उसकी माँ का- अपनी माँ मृत्यु के बाद हुए स्वप्न दर्शन से जानती है कि उसके लिए जीवन में दूसरों के द्वारा की गयी मदद के महत्व को भी समझना जरूरी था। वरना शायद इस अनुभव के आभाव में मुक्ति संभव नहीं होती। तो क्या है मुक्ति? उन सब लोगों को हमेशा के लिए ‘गुड बाय’ कह देना जिन्हें हम प्यार करते हैं, अपना कहते हैं जिन्हें...काश जीवन एक गूढ़ पहेली न होकर एक सीधा सपाट सा सत्य होता।