संस्कृति

मेरी कैलाश मानसरोवर यात्रा 2012 भाग 1

मेरी कैलाश मानसरोवर यात्रा 2012
श्रीमती सुधा खाती, नैनीताल -

एक प्रसिद्ध शायर ने कहा है-
सैर कर दुनियाँ की गा़फि़ल जि़न्दगानी फिर कहाँ।
जि़न्दगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहाँ।।
श्री विजय मोहन सिंह खाती जी ने सन् 1976 में विश्व भ्रमण से लौट कर आने के पश्चात् अपनी यात्रा के संस्मरण लिखे थे जिन्हें पढ़कर मेरा हृदय उद्वेलित होता था कि मुझे भी कभी लम्बी यात्राओं तथा सीमापार जाने का अवसर मिलेगा अतः मुझे जब कैलाश मानसरोवर जाने का प्रस्ताव मिला तो मैं अत्यन्त प्रफुल्लित हुई कि ईश्वर ने मेरी इच्छा कितनी शीध्र पूर्ण कर दी। 8 जुलाई 2012 को कैलास मानसरोवर यात्रा में जाने का सौभाग्य मिल गया।
आज मैं भी जब अपनी प्रथम कैलास मानसरोवर यात्रा पर अपनी यात्रा के कुछ संस्मरण लिखने जा रही थी तो मुझे वही वाक्य याद आ गया। लेकिन इस यात्रा में जाने वाले लगभग सभी यात्री नौजवानी की दहलीज को कभी का पार कर चुके थे, अतः मैं किसी शायर के लिखे इस शेर से अपनी यात्रा का विवरण दे रही हूँ-
जुर्ऱतों से कह दो परवाज में कोताही ना करें।
हम परों से नहीं हौसलों से उड़ा करते हैं।।
कैलाश मानसरोवर यात्रा में अलौकिक प्राकृतिक सौंदर्य का आनन्द लेकर हम सकुशल दिनाँक 20 जुलाई 2012 को वापस लौटे। इन अनुभवों की अमिट छाप मेरे हृदय में अंकित हुयी है। उन संस्मरणों को मैं प्रस्तुत करती हूँ। यात्रा में जाने के विषय में मुझे जब पता चला, तब मेरे दिलो दिमाग में तिब्बती समुदाय, वहाँ के लोग, वहाँं की संस्कृति, भौगोलिक परिस्थिति के विषय में जानने की उत्सुकता थी। इससे पूर्व समाचार पत्रों तथा दूरदर्शन के माध्यम से कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों के अनुभव सुनकर जिज्ञासा रहती थी कि इस यात्रा को यात्री किस प्रकार पूरा करते हैं। सुना तो यही था कि यह सबसे दुर्गम तथा सबसे बड़ी धार्मिक यात्रा है।
समाचार पत्रों की मिली जानकारी के अनुसार पिथौरागढ़ मार्ग काफी कठिन होने के साथ-साथ काफी दुर्गम भी है। मार्ग में स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं का भी सामना करना पड़ता हैै। इन्हीं पूर्वानुमानों से दिल में एक भय और आशंका थी कि क्या इस यात्रा को मैं पूरा कर भी पाऊँगी या नहीं, पर मेरा सौभाग्य रहा कि हमारी यात्रा का आयोजन नेपाल के रास्ते से हुआ।
ये मत सोचिए कि कितने लम्हे हैं जि़न्दगी में।
ये सोचिए कि कितनी जि़न्दगी है हर लम्हे में।।
नैनीताल वाई. टी. डी. ओ. के सहयोग से 8 जुलाई 2012 को नैनीताल से यात्रा प्रारम्भ हुई। वहाँ तक पहुँचने के लिए दो मार्ग हैं- जिनमें से एक पिथौरागढ़, धारचूला तथा दूसरा काठमाण्डू नेपाल से तिब्बत मार्ग से होकर जाता है।
काठगोदाम से सम्पर्क क्रान्ति रेल द्वारा यात्रा करते हुए हम लोग दिल्ली पहुँचे। जहाँ हमारा रात्रि विश्राम था। अगले दिन प्रातः 8 बजे दिल्ली से हवाई जहाज द्वारा लगभग डेढ़ घंटे की यात्रा करके हम लोग नेपाल की राजधानी काठमाण्डू पहुँचे। त्रिभुवन हवाई अड्डे पर हमें अपने-अपने होटल तक ले जाने के लिए वाहनों की व्यवस्था थी। होटल महाराजा पैलेस में पहुँचने पर हम लागों का नेपाली रीति-रिवाज से अभिनन्दन किया गया जो एक नया अनुभव था। 9 जुलाई को सावन का प्रथम सोमवार होने के कारण काठमाण्डू के प्रसिद्ध श्री पशुपतिनाथ मंदिर में मेला लगा हुआ था। भक्तों की अपार भीड़ थी। हमारे सहयात्रियों द्वारा मंदिर में दर्शन एवं पूजा-अर्चना की गयी। तत्पश्चात् हम लोगों को काठमाण्डू के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल बुधा नीलकंठ, स्वयम्भूनाथ एवं भक्तपुर की सैर करायी गयी। सायंकाल सभी पर्यटकों को आगामी कैलाश मानसरोवर यात्रा के विषय में नेपाली मार्ग-प्रदर्शक (गाईडों) द्वारा यात्रा, मार्ग की जानकारी, स्वास्थ्य सम्बन्धित निर्देश एवं यात्रा में प्रयुक्त होने वाले वस्त्र, सामान, दवाईयाँ एवं भोजन सम्बन्धी विषय की विशेष जानकारी प्रदान की गयी। सभी यात्रियों को एक बड़ा बैग, एक पिटठू एवं एक-एक जैकिट यात्रा के लिए दिया गया जो हमारी यात्रा में बहुत काम आये। हमें ठण्ड से रक्षा के लिए एक टोपी तथा दस्ताने साथ रखने का भी आदेश हुआ। यात्रा के दौरान मौसम की अनिश्चितता के कारण हमें साथ में एक बरसाती भी ले जाने के लिए कहा गया जिसकी इस यात्रा में आवश्यकता नहीं हुई। हमारा समस्त सामान एक बड़े बैग में रखवाकर ट्रक में लदवाया जाता था। हर विश्राम स्थल पर हमें हमारा बैग जिन पर नम्बर पड़े थे वापस मिल जाता था। हम केवल एक छोटा पिट्ठू जिसमें आवश्यक सामग्री जैसे ग्लूकोज, पानी, साबुन, खाद्य सामग्री मेवे, चाॅकलेट आदि ले जाते थे। ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आक्सीजन की मात्रा कम होने के कारण पानी अधिक से अधिक पीना होता है। शरीर में ऊर्जा एकत्रित करने के लिए कुछ न कुछ खाते रहना आवश्यक होता है। यहाँ ठंडी तेज हवाऐं चलती हैं, जिसके कारण त्वचा जर्जर हो जाती हैं।
अगले दिन प्रातः 9 बजे हमारी कैलाश मानसरोवर की यात्रा प्रारम्भ होनी थी। यात्रा प्रारम्भ करने से पूर्व वाई टी डी ओ टूर नैनीताल द्वारा काठमाण्डू में पूजा-अर्चना की व्यवस्था की गयी थी। तत्पश्चात हमारा प्रस्थान बस द्वारा काठमाण्डू से न्यालम के लिए हुआ। मार्ग में केदारी नेपाल बार्डर पर हमारी दोपहर की भोजन व्यवस्था थी, जहाॅ पर सभी यात्रियों से उनके पासपोर्ट लिए गये। कुछ दूर पैदल चलने के बाद नेपाल और तिब्बत को जोड़ने वाले Friendship Bridge  को पार करके हम चीन की खासा चैक पोस्ट पर एकत्रित हुए जहाँ पर हमारे पासपोर्ट तथा सुरक्षा जाँच की गयी। खासा बार्डर पर नेपाल के लोग यहाँ की तरह मजदूरी करते हुए दिखायी दिये जो नेपाल से आटा, चावल एवं सब्जियाँ लेकर सामान के साथ इस पार से उस पार जा रहे थे। खासा में बहुत चहल-पहल थी। वहाँ पर चीन एवं तिब्बती समुदाय के लोग व्यापारिक गतिविधियों में व्यस्त दिखायी दे रहे थे। खासा शहर अपने आप में एक आधुनिक शहर दृष्टिगोचर होता है। यहाँ पर आधुनिक सुख-सुविधाओं के होटल एवं रेस्टोरैन्ट दिखायी दिये। इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि नेपाल के व्यापारी अपने व्यापार के सम्बन्ध में यहाँ आते-जाते रहते हैं। नेपाल का केदारी बार्डर भारतीय महाद्वीप में चीन निर्मित सामान पहंुचाने का एक महत्वपूर्ण केन्द्र है।
समस्त औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद लैण्ड-क्रूजर जिसमें 4 लोगों के बैठने की व्यवस्था थी, हम लोग आगे की यात्रा के लिए रवाना हुए। सभी चालक तिब्बती थे। जिनसे वार्तालाप कठिन था लेकिन इशारों से हम अपनी बात उन्हें समझाते थे। इस यात्रा में 26 यात्री उत्तराखण्ड के तथा 19 पुणे के थे। एक ट्रक में नेपाल से साथ आये रसोईया तथा 5 सहायक थे जो खाने-पीने की पूरी व्यवस्था रखते थे। कहाँ पर चाय देनी है, कहाँ सूप पिलाना है, कहाँ पर भोजन के लिए रूकना है, सभी पूर्णतया व्यवस्थित एवं अनुशासित था।
(बाकी अगले अंक में)