संस्कृति

मेरी कैलाश मानसरोवर यात्रा 2012 भाग 2

मेरी कैलाश मानसरोवर यात्रा 2012
श्रीमती सुधा खाती, नैनीताल -

पिछले अंक से आगे.....

 लगभग डेढ़ घंटे के पश्चात हम अपने पहले पड़ाव न्यालम पहुँचे। वहाँ पहुँचते ही तिब्बती संस्कृति तथा भवन निर्माण कला व कलाकृति को देखकर लगा कि हर संस्कृति में जानने व सीखने के लिए बहुत कुछ है जिनसे हम आज तक अनभिज्ञ रहे थे। लकड़ी के दरवाजों और चैखटों में हाथों से रंगीन फूल-पत्तियाँ बनाते देखकर कलाकारों की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सके। ऊँचे भवनों में कलाकार बड़े धैर्य के साथ रंगीन चित्रकला करते दिखायी देते हैं।

न्यालम में आकर प्रकृति का भरपूर आनन्द लिया। चीन के अतिक्रमण के विषय में पढ़ा था। यहाँ आकर चीन के झंडे देखकर विश्वास हुआ कि तिब्बत पर चीन के अतिक्रमण की बात सत्य है। हर होर्डिग पर चीनी भाषा में कुछ न कुछ लिखा था जिसे समझना असम्भव था। न्यालम में रात बिताने के बाद अगले दिन ट्रैकिंग पर एक पहाड़ी पर ले जाया गया जो आगे की यात्रा के लिए एक अभ्यास था। इस क्षेत्र में सफेद और काली याक को चरते हुए देखा। तिब्बती लोग याक का दूध प्रयोग करते हैं। दूध से वह छुरपी बनाते हैं जिसे सुपारी की तरह मुंह में रखकर खाया जाता है। बीच-बीच में सरसों के खेत व चारागाह थे जिनमें भेड़े झुण्ड बनाकर चलती हैं। ट्रैकिंग से लौटने के बाद पुनः हमने स्थानीय दुकानों पर खरीददारी एवं भ्रमण किया। छोटी-छोटी दुकानों में चीन द्वारा निर्मित सामान रखा था।

अगले दिन लैण्ड- क्रूजर द्वारा हम लोग सागा के लिये चले। चीन द्वारा बनाई गयी सड़कें बहुत आरामदायक थीं। तिब्बती कार चालक बहुत ही अनुभवी एवं कुशल होते हैं। मार्ग में किसी के भी वाहन में कोई भी समस्या आने पर सभी चालक अपने वाहनों से उतरकर हर सम्भव एक दूसरे की सहायता को तत्पर रहते हैं, चाहे वह वाहन किसी और दिशा से क्यों न आ रहा हो। तिब्बती चालक कुछ मील की यात्रा के पश्चात् अपनी गाडि़यों के काफि़ले को रोककर एक साथ मोमो ‘यहाँ का प्रमुख भोजन’ खाकर तथा जूस पीकर पुनः यात्रा प्रारम्भ करते थे। इस दौरान समस्त यात्री भी अपने कैमरे लेकर ऊँची-नीची पहाडि़यों तथा दर्राें की तस्वीर कैमरे में कैद करने में व्यस्त हो जाते थे। इससे ज्ञात होता है कि तिब्बतियों में आपसी मेल-जोल है तथा वे एक दूसरे की सहायता करने में सदैव तत्पर रहते हैं। मार्ग में हमने तिब्बती चालकों द्वारा बजाये गये तिब्बती संगीत का भी आनन्द लिया। पहाड़ों के बीच से निकलती हुई सड़कों को देखकर लगा कि चीन ने इन्हें बनाने में बहुत परिश्रम किया है।

कहते हैं यदि आदमी का मन प्रसन्न हो और हर पल एक नई बात जानने और देखने की जिज्ञासा हो तो उसे कभी थकान का अनुभव नहीं होता। अच्छे सहयात्री का साथ यात्रा की दूरियों को कम कर देता है। इस यात्रा में सभी सहयात्रियों के उत्साह से सभी को प्रेरणा मिली। इतनी लम्बी यात्रा में स्थान- स्थान पर प्राकृतिक सौन्दर्य हृदय में नया ज़ोश भर देता है। छोटी-छोटी झाडि़यों का दूर-दूर तक फैलाव शिवजी के वाघंम्बर होने का आभास देता था। विशाल चट्टानों की आतियाँ, कभी श्री गणेश, कभी महादेव प्रतीत होती थीं। सभी लोग इन्हें अपनी भावनाओं के अनुसार ही देखते हैं। यात्रा का आनन्द लेते हुए हम लोग सायंकाल सागा पहुंचे। सागा चीन का एक सैनिक छावनी के रूप में विकसित हो रहा नगर है। चीन भारत एवं नेपाल सीमा की चैकसी को ध्यान में रखते हुए यहां पर अपनी वायु सेना का बेस बना रहा है। साथ-साथ सागा शहर पूर्व, पश्चिम एवं दक्षिण तिब्बत को जोड़ने वाली सड़कों का जंक्शन है। यही कारण कि यह नगर आधुनिकता की ओर अग्रसित है। यहां पर पर्यटकों के लिए तीन सितारा होटल की सुविधा, आधुनिक माल, रैस्टोरेन्ट, नाइट क्लब एवं स्नानागार की सुविधा उपलब्ध हैं।

सागा में एक अनुभव ऐसा था जिसे आपके साथ बांटना चाहूँगी। यहाँ होटल में शौचालय की व्यवस्था उचित नहीं थी। कैलाश यात्री अधिकांशतः खुले मैदानों का प्रयोग करते हैं, जो शौचालय बने भी थे उनमें स्वच्छता की कमी थी। बाहर खुल मैदानों में सुबह अथवा रात्रि में जाने पर स्थानीय लोगों के पालतू कुत्तों का आतंक था जो एक आहट पर झुण्ड मेें आकर एक साथ ऐसे भौंकना प्रारम्भ कर देते थे कि डर जाना स्वाभाविक था। फिर भी यात्री खुले मैदान में ही जाते थे यहाँ आकर सभी अपने घर की सुख सुविधाओं को भूलकर असुविधाओं में भी आनन्दित थे। स्नान के लिए मुख्य बाजारों में सुविधापूर्ण स्नानागार बने हुए थे, जिसमें एक बार का खर्च भारतीय मुद्रा में रू 150 से 180 के बीच था।

अगले दिन पुनः सागा से आगे की यात्रा प्रयाग के लिए प्रारम्भ हुई। रास्ते में एक शान्त नदी दिखाई दी, कार चालक ने बताया की यह ब्रह्मपुत्र नदी है, जिसे तिब्बत में यारलुगं के नाम से जाना जाता है। यही ब्रह्मपुत्र बंगलादेश  एवं भारत में बाढ़ एवं विनाश का रूप भी है, मार्ग में हमने ब्रह्मपुत्र नदी के स्वच्छ जल का आनन्द लिया।
सायंकाल हमारा दल प्रयाग पहुंचा। प्रयागं एक प्राचीन बसावत है। यहां पर छोटी- छोटी दुकाने हैं। इनके मध्य एक छोटा सा आधुनिक स्टोर भी दिखाई दिया जिस में पर्यटकों के उपयोग का सामान उपलब्ध था। इस स्थान पर हमें कहीं भी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र नहीं दिखाई दिये। प्रयागं में हमारे रहने की व्यवस्था एक होटल में थी। सभी पर्यटकों  को आने वाले दिन का इन्तजार था।

प्रातः काल आठ बजे हमारा दल प्रयाग से मानसरोवर के लिए चला, मार्ग में रेत के टीले, जंगली जानवर देख कर बहुत आनन्द आया, दोपहर के समय हमारा दल मानसरोवर झील के करीब पहुंचा,  कहते हैं कि तिब्बत में स्थित अतिसुन्दर झील मानसरोवर, महादेव तथा माँ पार्वती का मिलन स्थल था। जहाॅँ दो राजहंस साथ-साथ तैरा करते थे। आज उक्त राजहंस के दर्शन तो नहीं हुए, हाँ इस सुन्दर झील को देखने का सुअवसर मिला। जिसके पल-पल बदलते रंग मन को बहुत शांति देते हैं। मानसरोवर झील सिंधु, सतलज, करनाली तथा ब्रह्मपुत्र का उदगम् स्थल है। झील देखकर मन में विचार आया कि यह कौन चित्रकार है जिसने एक ही रंग में कितने रंग मिलाए हैं। झील के किनारे सभी यात्रियों ने स्नान के पश्चात् शिर्वाचन किया और इस दुनियाँ के रचनाकार की रचना से अभिभूत हो उसका ध्यान किया। यहीं से कैलाश पर्वत के दर्शन भी हुए जो एक ऐसा शांत पर्वत है जो किसी महाशक्ति का आभास देता है। सूर्य की किरणें कैलाश पर्वत के सौंदर्य को और भी बढ़ा रही थीं। कैलाश पर्वत को दुनिया का पवित्रतम् स्थल माना गया है। इस पर्वत को तिब्बती बाँन नाम से पुकारते हैं, जैन धर्म के अनुयायी अष्टपाद का नाम देते हैं। इसी स्थान पर ऋषभदेव को पुर्नजन्म से मुक्ति प्राप्त हुई थी। मानसरोवर में कौवे बहुत बड़े तथा चमकदार काले रंग के होते हैं जिनके चांेच तथा पंजे लाल होते हैं। हमारे दल ने रात्रि विश्राम मानसरोवर में किया।

 (बाकी अगले अंक मेें )
                         क्रमशः