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मेरे राजनीति सफर का एक पहलू!

मेरे राजनीति सफर का एक पहलू!   आबाद जाफ़री, नैनीताल-

श्री कैलाश सिंह जी आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष भी थे और 1977 में प्रदेश के शिक्षामंत्री भी। मेरे मित्र और छोटे भाई लक्ष्मी सहाय सक्सेना (इलाहाबादी) जनता पार्टी की सरकार में राज्यमंत्री, वन थे। वह मेरा बहुत आदर करते थे। उस जमाने में मैं लखनऊ और इलाहाबाद की यात्राएं बहुत करता था। सफर खर्च की व्यवस्था होना या न होना मायने नहीं रखता था। बस मूड की बात थी। खद्दर पहनकर पूरा नेता बन गया था। उत्तर प्रदेश के मित्रों में अधिकांश बाद में प्रदेश और केन्द्र में मंत्री बने। मेरी एक बुरी आदत यह भी है कि मैं जाहिलों से हमेशा दूर रहता हूँ। बचपन से मुझे अनपढ़ लोगों से दूर रखा गया। मेरी वालिदा (माँ ) का मानना था कि जाहिलों के साथ सोहबत अखत्यार करने से तहज़ीब और जुबान बर्बाद हो जाती है। आज भी मैं अपने दिमाग से यह चीज़ नहीं भुला सका हूँ और कुछ लोगों से दूरी बनाए रखता हूँ। मेरे कई मित्र और जानने वाले मुझे घमण्डी समझते हैं। बहरहाल 1978 में एक बार कुल 20 रूपये जेब में थे। इलाहाबाद से मेरे मित्र राशिद इनाम का खत आया कि उर्दू तरक्की मोर्चा की एक आपात बैठक में आपका आना जरूरी है। मैं उस समय उत्तर प्रदेश उर्दू तरक्की मोर्चा का प्रदेश मंत्री था। इलाहाबाद गया। इलाहाबाद से दोस्तों ने टिकिट की व्यवस्था करके लखनऊ भेज दिया। जेब में कुल आठ आना बाकी थे। टेªन से उतर कर सीधा विधायक निवास में लक्ष्मी सहाय सक्सेना के घर चला गया। वह नहा रहे थे। नौकर ने मेरा बैग उनके कमरे में रख दिया और चाय देकर चला गया। सक्सेना नहा कर बाहर निकले तो मुझे देखकर प्रसन्न हो गये। बोले जल्दी फ्रेश हो जाओ साथ-साथ नाश्ता करेंगे। नाश्ता करके मुझसे मेरा प्रोग्राम मालूम किया। मैंने कहा कि कान्ति कुमार जी (एम॰एल॰सी॰) से मिलकर 3) बजे पंजाब मेल से वापस हो जाऊँगा। मेरे पास पैसे नहीं थे इसलिए उनके कुर्ते की जेब में हाथ डालकर पर्स निकाल लिया और पचास रूपये जेब में रख लिए। मैंने कभी लक्ष्मी सहाय सक्सेना से पैसे नहीं मांगे। यही तरीका अखत्यार करता था। वह जानते थे। मुझसे बोले खाली नेता बने फिरते हो। वन विभाग से कुछ भूमि लीज पर दे सकता हूँ काम आयेगी, मैंने कहा कि जमीन-जायदाद की परवाह होती तो मेरी अपनी जागीर या जमींदारी कम थी जो तुम से मागूंगा। वह चुप हो जाते थे।
एक बार नैनीताल के शहीद सैनिक स्कूल में कार्यक्रम था। शिक्षामंत्री कैलाशनाथ सिंह और लक्ष्मी सहाय सक्सेना दोनों मौजूद थे। मैं अपने विद्यालय से वहां देर से पहुंचा। मेरे विभाग के तमाम उच्चाधिकारी वहां उपस्थित थे। मेरे पहुंचने पर शिक्षामंत्री तथा सक्सेना ने खड़े होकर मेरा अभिवादन किया। वह खड़े हुए तो सभी लोग (अधिकारियों सहितद) खड़े हो गये। दोनों ने अपने बीच में सोफे पर मुझे बिठा लिया। शिक्षामंत्री भाषण दे रहे थे। मैं भी बोला था। बाद में मेरे अधिकारियों ने इसकी बड़ी चर्चा की थी। मुझसे घबराते भी थे।
1980 तक राजनीति को अच्छी तरह समझ गया था। इसलिए ‘‘अन्दर की बात’’ से जब वास्ता पड़ा तो राजनीति छोड़ दी, खद्दर उतार दिया और नेतागिरी से तौबा कर ली। 1982 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में एम॰एल॰सी॰ के लिए मेरा नाम पैनल में आया। दोस्तों ने लांबिग करने की सलाह दी मगर मैंने ठुकरा दिया। 2002 में राज्य सभा के लिए आफर आयी। मैंने हाथ जोड़कर माफी मांग ली। राजनीति में लोगों को सीढ़ियां चढ़ने में पचास साल लग जाते हैं। मगर मैंने पांच साल में राजनीति की पूरी दुनिया देख ली। कोई नेता नेतागिरी का रौब झाड़ता है तो उस पर हंसी आती है। राजनीति में अब वह बात कहाँ?