हमारे लेखक

मेस आयनाक से सरहदी गांधी तक

आबाद जाफ़री, नैनीताल-

पिछले दिनों इंग्लैण्ड निवासी हिन्दी साहित्यकार कादम्बरी मेहरा का एक महत्वपूर्ण लेख ‘मेस आयनाक’ पढ़ते हुए मुझे सरहदी गांधी ;खान अब्दुल गफ्फार खानद्ध याद आ गये। ‘मेस आयनाक’ का शाब्दिक अर्थ है, ‘तांबे का छोटा कुआं’। इस विषय पर सरहदी गांधी ने अपनी आत्म कथा में भी विस्तार से वर्णन किया है। मेस आयनाक पर आगे लिखूंगा मगर पहले सरहदी गांधी के विषय में जानना आवश्यक है। दोनों का सम्बन्ध अफगानिस्तान से है।
मैंने अपने छात्र जीवन में 1969 में उन्हें बरेली में पहली और आखिरी बार देखा था, जब वह गांधी शताब्दी के कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए विशेष रूप से भारत आये थे। भारत में उन्हें बुलाने का श्रेय लोक नायक जय प्रकाश नारायण को जाता है। राजकीय इन्टर काॅलेज बरेली के विशाल मैदान में उनकी सार्वजनिक सभा हुई थी। उनका भाषण भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष, गांधी जी की महानता और सद्भाव पर आधारित था। उनके भाषण का कोई अंश आज मेरे दिमाग में महफूज नहीं है मगर पठानों वाली गरजदार आवाज आज भी कानों मंे गूंजती है। सुरमई रंग के सूती मलेशिया का मामूली कुर्ता-पैजामा पहने हुए थे और एक चादर उनके कंधे पर फकीराना अंदाज से पड़ी हुई थी। उनकी तकरीर ;भाषणद्ध सुनने के बाद जब मैं बस से अपने वतन ;शीशगढ़द्ध लौट रहा था तो जहन में उथल-पुथल मची हुई थी। जज्बात कुछ इस तरह थे जैसे मैंने आज कोई बड़ा कारनामा अंजाम दिया है। जो शख्स सत्य, अहिंसा के पुजारी और महानायक ‘महात्मा’ की सेवा में वर्षों रहा हो उसे साक्षात देखना मेरे लिए किसी कारनामें से कम नहीं था।
कुंअरमान नांरग पहले भारतीय हैं जिन्होंने सरहदी गांधी की जीवनी ‘पश्तो’ भाषा लिखी थी। दूसरी जीवनी मराठी भाषा में तिन्दोलकर जी ने लिखकर लाभान्वित किया था। मार्च 1969 में लोक नायक जय प्रकाश नारायण के प्रयास से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी की जीवनी तीनों भाषाओं में एक साथ प्रकाशित हुई थी। 248 पेज की इस आत्मकथा को मैंने बरेली में ए0एच व्हीलर के स्टाल से 2 रूपये में खरीदा था। लोक नायक द्वारा प्रकाशित आत्मकथा को सर्वाधिक प्रमाणिक माना जाता है।
सरहदी गांधी उर्फ बादशाह खान उर्फ खान अब्दुल गफ्फार खान अपनी माता के हवाले से बदलते थे कि उनका जन्म अफगानिस्तान के अश्त नगर के उत्मान जई गाँव में हुआ था। ;उत्मान जई, यूसुफ जई, अकबर जई, अचक जई बगैरह पखतून पठानों के कबीले हैं, भारत मंे अफगानिस्तान से आने वाले पठान कबीलों की तफसील और उनकी उप जातियों पर उपयुक्त समय पर फिर कभी लिखंूगाद्ध। उत्मान जई गांव पाठनों के एक कबीले का गांव था। सरहदी गांधी के पिता बहराम खान और दादा सैफुल्लाखान नामी-गिरामी जागीरदार थे। अंग्रेजों की बेरहमी ने अफगानिस्तान के गैरतदार पखतून पठानों को बागी बना दिया था। परिस्थितियों ने खान साहब को गंाधी जी के निकट ला दिया। महात्मा गांधी के सानिध्य मंे सरहदी गंाधी की असहनशीलता, सहनशीलता, संयम और अहिंसा में बदल गयी। वह शु( रूप से गान्धियन हो गये थे। अपने गुणांे के कारण ही उन्हें भारतवासियों ने ‘सरहदीगंाधी’ के नाम से पुकारा।
1992 में डाॅ0 गिरिराज शाह ;पूर्व आई0जी0, टास्क फोर्स उ0प्र0द्ध ने मुझे सरहदी गांधी पर कुछ लिखने के लिये प्रेरित किया। वह चाहते थे कि उनकी संस्था ‘उत्तराखण्ड शोध संस्थान’ सरहदी गंाधी पर एक पुस्तक प्रकाशित करें। 30 पेज लिखने के पश्चात् कार्य रूक गया और आज तक रूका हुआ है। अब डाॅ0 गिरिराज शाह जैसा मद्रदान और प्रेरक में कहां से लाऊं?
जिक्र जब छिड़ गया कयामत का,
बात पहंुची तिरी जवानी तक!!
मुझे अपने लेखन का यह ऐब बताने से कोई गुरेज नहीं है कि मुझे आज तक लिखने का सलीका नहीं आया। मंै शब्दों के विस्तार और गइराई में उतर जाने से अकसर अपने विषय से दूर निकल जाता हूँ। मैं यहां ‘मेस आयनाक’ के बारे में लिखना चाहता था मगर सरहदी गांधी का जिक्र इसलिए जरूरी हो गया कि सर्व प्रथम मैंने मेस आयनाक के बारे में 1969 में उनकी आत्म कथा में ही पढ़ा था।
पखतून और ब्लौच पठान, आर्यो की पुश्तैनी नस्ल से ताल्लुक रखते हैं। ‘पश्तो’ आर्यों की ही भाषा है और ‘आर्याना बेजू’ ही आज का अफगानिस्तान है। इस्लाम के आगमन से पूर्व तमाम अफगानी पठान कबीले बौ( थे और उस से पहले हिन्दू थे। भारत का सांस्कृतिक क्षेत्र दुनिया का सबसे विशाल क्षेत्र है। हमारी सांस्कृतिक विशालता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें श्रीलंका, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान का पूरा क्षेत्र सम्मिलित है। गान्धार और तक्षशिला केन्द्र इस सांस्कृतिक इतिहास का स्पष्ट प्रमाण हैं।