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म्यौर पहाड़ (6)

म्यौर पहाड़ (6)
नवीन पाण्डे, नैनीताल
हरि भरि म्यौर पहाड़, फिर लै पीणौक पाणिक अकाव,
गूल गध्यार मस्त भै, कसिक मिलौल पाणि करनु काव।
बाजै बांजाणि आब कम है गयीं, पात-पात काटि हालि,
जतुक बचि ले रयिं बोट, उ ले उल्टी गिनती जालि।
हिमा हिमाल टोर गध्यार, और कतुक उच्च डान,
रोज रोज बरख ले हुँ, फिर लै म्यार खेत सुखिया छन।
गौ-गौन में बिजुलि पुजि, पाणि रोक बणायी डाम,
योस बखत आ, जाल नि सोच, कभै न याद नै फाम।
अरजी पात लेखि हजार, जाणि लागि सरकारा द्वार,
जाँ जाँ ले हम खोर टेकनु, पुरि नै भै हमरि पुकार।
हरि भरि म्यौर पहाड़, फिर ले पीणौक पाणि अकाव,
गूल गध्यार मस्त भै, कसिक मिलौल पाणि करनु काव।
नौव, धार, डिग्गी सबै सुखि गयिं, निभैआब रखवाल,
जै छै ले कुनौ इनु बात, कान, अंगुव डालि बेर सुणि ल्याल।
सालु बोटनाक बल्ली बणा हालि, बाजांक सुखा बेर क्वाल,
शीशम, सागौन आब ठुलि कोठिनाक शान, कुडि़नाक छन बेहाल।
दिल्ली, पंजाब, चंडीगढ़, बम्बई सबै है गयीं पहाड़क वशिन्द
यांक पुश्त-पुश्ताक रौणि, आब है गयीं उनार बन्द।
तारीराम, खुशाल सिंह, बुद्धिवल्लभ सबै उनार आगिल पछिल,
जब ऊनी उ लम्बी गाडि़ लि बेर, यो है जानि रंगील चंगील।
हरि भरि म्यौर पहाड़, फिर ले पीणौक पाणि अकाव,
गूल गध्यार मस्त भै, कसिक मिलौल पाणि करनु काव।
रोपाइ वाल खेत बंजर, प्याज, आलु आब नै देखिन,
ग्यूँ, मडुं, मादिर उजडि़ गों, गुड़ाव रोपार आब नै देखिन।
पहाड़ बटि भावर भाजि, भाबर बटिक दिल्ली पुजि ग्यान,
दिल्ली पुजि बेर आब कि करनु, गाडि़कि नौकरि ले नि देखयान।
गाड़ गध्यार आब सुखि ग्यान, घट में ले पाणि काँ बै आल,
पीस्यु, चावल आब हम मोल ल्युनु, कंटोल वाल ले कहाँ लाल।
बण उजाडि़ बंजर है गयीं, रूख काट बेर हम है गयाँ वीरान,
हिसाव, किरमोड़, काफौव कहाँ खानु, जंगौव सबै आग लाग ग्यान।
हरि भरि म्यौर पहाड़, फिर ले पीणौक पाणि अकाव,
गूल गध्यार मस्त भै, कसिक मिलौल पाणि करनु काव।
बरसाताक टैम आब बारिस न हाँ, जाड़, गरमी में रोज बरख,
टैम सैत आब उल्ट आगो, दयौ, बारिस और भारि भूकम्प।
गोर बाछ चरूणौ माड़ नि भै, घसयारि नै तै बण नि भै,
हम सब शहरी है गैयाँ, गोर, भैंस पावणैं हमें टैम नि भै।
ष्लकाड़-पताव सब हरा गयीं, घरनमैै सबै गैस जागण लागि,
मडुवाक, काकुनिक खाट आब काचै रूनि, बाँजाक सालुक लकाड़ निमणन लागिं।
नौवक पाणि सुखि, डिग्गी सीमैन्ट टूटि धाराक ढुड़ आब नि हुन चिफाव,
पाणि-पाणि कौने रूनि लोग आब, टिनाक कनस्तर छोड़ आब बिसलैरी बोतल निकाव।
हरि भरि म्यौर पहाड़, फिर ले पीणौक पाणि अकाव,
गूल गध्यार मस्त भै, कसिक मिलौल पाणि करनु काव।
क्रमशः