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म्यौर पहाड़

म्यौर पहाड़
नवीन पाण्डे, नैनीताल -

दूर बटिक जो देखि जानि,
हरिया - हरिया धानक गाड़ (खेत)।
दूर बटिक बोट लम्ब -लम्ब जास देखिनि,
ग्यूंक, धानाक, मुडुवाक, मादिराक जास गाड़।
कतुक बखत म्योर मन ले नै जा,
पीलि - पीलि दैणाक फूलों दगड़।
एक डाल ख्वार में लि बेर ईजाक पिछाड़,
दैणक फूल, ग्यूक बाल, मुवाक भला - भला जाड़।
दूर बटिक जो देखि जानि,
हरिया - हरिया धानक गाड़।।
ईजैलि, काक - काखिलि, रोप लगा धानौ गाड़,
पलटार लगायीं और आफिले गोड़ी धान।
च्यूराक बोट, तिमिलाक बोट, मेवाक ठुल ठुल दाण,
कतुक बखत इनुकै खाबेर आ उनुकै तराण।
मेरि बैणीलि देखते - देखते, मस्त मारी डाड़,
ईजा  कसिक करि छै तु पछयाण अपण और बिराण।
तु मैके बेवाली भेजि देलि सौरास,
मैं कै फिर ले लागलो यो गाड़ - भिणोंक निसास।
दूर बटिक जो देखि जानि,
हरिया - हरिया धानक गाड़।।
पुर गौक बीच में पुरटान हरिय हैगो,
अशौजक माहैण आगो दातुल कुटौव हात में आगो।
रतै बटिक निकैय बेर ब्याव कार तक इजुलि,
तेरि यो लगन देखि बेरि सब है गयीं त्यार दाद भुलि।
गुड़ाई हैरे खेतन में बौल और न्योली भग्न्यौल,
रूणा-भुणा लागि रै घामैक चटकैलि गाल है गयी लाल।
बखत हैगो गोरू, बाछा, बकरा ऊणा लागि घरा,
हरूलि-परूलि, नीमा गोदुली, पाणि लवा ताल धारा।
दूर बटिक जो देखि जानि,
हरिया-हरिया धानाक गाड़।।
कास छन यो ट्याड़-म्याड़ पहाड़ाक बाट,
दिगौ लालि कतुक मीठ लागनि यो मुडुवाक र्वाट।
दूर बटिक देखि जानि, सौरास जाणि बैणीयां और चेली,
दिगौ लालि कतुक सजा हालि इनुलि घरैकि अक्षतै देलि।
आरूक, खुबानिक, पुलमक और बुरांशाक फूल,
चेलि, बेटियौक त्यार आगो आपण मैतक तरफ ऊल।
हरिया, लाल, पींगयि, छींटन वाइ, बुटन वाइ साडि़,
दिगौ लालि कतुक भैलि लागि रै तुमरि फूलनवाइ साडि़।।
दूर बटिक जो देखि जानि,
हरिया हरिया धानक गाड़।।
आब देखि लिया तुम दिल्ली भाजणि भुला,
कतुक भौल म्यौर पहाड़ देखैणा चानै रौला।
ताल भिड़ माल भिड़ सबै ठौरा हरिभरि रौनका,
कास-कास काव करि हालि, चारों तरफा चमैका।
छियुला अब हैरा गयी बिजुली जगै चमा-चमा,
ठ्याल, जीप आब आ गयीं, डोलिक खत्म आब दिन नामा।
दाव-भाता आज ले पाको ब्या काजक दिना,
दाद-भुलि, काक -काखि ऊनी नानातिना।
दूर बटिक देखि जानि
हरिया-हरिया धानाक  गाड़ यो ‘‘म्यौर पहाड़’’।।