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योरोप और अमेरिका का ‘चिकिन-वार’

योरोप और अमेरिका का ‘चिकिन-वार’
आबाद जाफ़री, नैनीताल
जागीरदारों और भारतीय नवाबों के ‘रईसजादों’ के शौक की दास्तानें भी कमाल की हैं। कबूतरबाजी, बटेरबाज़ी, पतंगबाजी और कुम्मारबाज़ी (जुआ) शाही लौंडांे के पसंदीदा शौक थे। इन्ही में मुर्गों की लड़ाई (चिकिनवार) भी थी। इन सब खेलों के ‘उस्ताद’ भी होते थे, जो इन जानवरों को पारस्परिक जंग के लिए तैयार करते थे। सैकड़ों लोग (उस्ताद) रोजगार से लगे रहते थे। सफेद लोग बला के जहीन थे, कोई सोच भी नहीं सकता था कि धरती पर इंसानों के बीच यह जंग कभी लड़ी जायेगी और चिकिन को हथियार बनाया जायेगा। योरोेप और अमेरिका इस हथियार से भी लडं़ेगे।
द्वितीय विश्व युद्ध में योरोप की अर्थव्यवस्था को भारी क्षति पहँुची थी। वहाँ अनेक आर्थिक समस्याओं के साथ-साथ खाद्य सामग्री का भी भयानक संकट पैदा हो गया था। विशेश रूप से चिकिन दुर्लभ हो गया था। योरोप के अमीर लोग ही चिकिन खा सकते थे, आम आदमी की पहुँच से यह ‘गिजा’ दूर थी। अमेरिकी अर्थव्यवस्था द्वितीय महायुद्ध में भी स्थिर रही। विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों की उन्नति के साथ-साथ पोल्ट्री फार्म भी फलफूल रहे थे और वह अमेरिकन की खाद्य सामग्री का महत्वपूर्ण अंग था। अमेरिका ने इस परिस्थिति का लाभ उठाया और मुर्गी व्यवसाइयों ने जहाजों पे मुर्गियाँ भर कर योरोप भेजना आरम्भ कर दिया। योरोप की मण्डियाँ अमेरिकी मुर्गियों से भर गयी। अमेरिकी चिकिन योरोप में सर्वाधिक सस्ता और सुलभ था, जिससे आम लोगों का बहुत भला हुआ। कुछ ही दिनों में सम्पूर्ण योरोप की मार्केट पर अमेरिकी चिकिन का कब्जा हो गया। योरोप के पोल्ट्री फार्म बन्द होने लगे।
डेनमार्क ने सर्वप्रथम इसे आर्थिक साजिश ठहराते हुए कहा कि अमेरिका हमारी मार्केट पर कब्जा करने के लिए सहायता के नाम पर ऐसा कर रहा है। फ्रांस की ओर से कहा गया कि लोग अमेरिकी चिकिन खायें, उसमें नामर्द बनाने का विशेष हार्मोन मौजूद है। जर्मनी ने कहा कि अमेरिकी मुर्गियों को मोटा करने के लिए विशेष प्रकार का जहरीला पदार्थ खिलाया जाता है जो स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। परन्तु इस तरह के प्रोपेगन्डे का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। योरोपीय चिकिन व्यवसाइयों ने अपनी-अपनी सरकारांे पर दबाव बनाया। योरोपीय सरकारांे ने अमेरिकी चिकिन पर 25 प्रतिशत आयात टैक्स लगा दिया, इसका नाम ‘चिकिन टैक्स’ रखा गया। इस भारी टैक्स से अमेरिका के मुर्गी व्यवसाइयों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
मुर्गियों के इस विवाद में अमेरिका और योरोप के मध्य 3 वर्ष तक दूतावासों के माध्यम से बातचीत चलती रही। अंततः अमेरिका ने ‘नाटो’ में अपनी भूमिका सीमित करने की धमकी दे डाली लेकिन ‘मुर्गियों की इस जंग’ में यह धमकी बेकार साबित हुई। विवश होकर अमेरिका ने योरोप के ट्रकांे पर 25 प्रतिशत का जवाबी ‘आयात टैक्स’ ठोक दिया। अमेरिका ने इस टैक्स का नाम योरोप के जवाब में ‘चिकिन टैक्स ही’ रखा।
अमेरिका में सबसे लोकप्रिय गाड़ी ‘लाइट ट्रक’ माना जाता है। सम्पूर्ण अमेरिका के देहात में लाइट ट्रकों का बोल-बाला है। अमेरिका की आटो इण्डस्ट्री अति आधुनिक और विकसित है परन्तु योरोप की गाड़ियाँ तथा ट्रक अमेरिका की अपेक्षा अधिक मजबूत और कम खर्चीले होने के कारण योरोप की आटो इंडस्ट्री को कोई क्षति नहीं पहुँची। जबकि अमेरिका की आटो इन्डस्ट्री घाटे में जाने लगी। विवश होकर अमेरिका ने टैक्स लगा दिया। साथ ही अमेरिका की आटो इन्डस्ट्री ने लाइट ट्रकों के डिजाइन, बनावट और उनको कम खर्चीला बनाने में सफलता प्राप्त की। आज वहाँ योरोपीय ट्रकों के स्थान पर 87 प्रतिशत अमेरिकी ट्रक ही मिलते हैं। उनका डिजाइन चिकिन के पिजरों और क्रेट्स की भाँति हैं। 1961 में घटित इसी समस्या को इतिहास में ‘चकिन वार’ कहा जाता है।