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राजनीति एक बिजनेस है?

‘राजनीति एक बिजनेस है?’
संदीप बिष्ट, नैनीताल-
वामपंथी छात्र संगठनों तथा दक्षिणपंथी छात्र संगठनों के बीच आज देश के कुछ विश्वविद्यालयों में जो जंग चल रही है वह कुछ विश्वविद्यालयों जिनमें जवाहरलाल नेहरू विश्व- विद्यालय, जाधवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय हैं। ये जंग जुबानी तथा वैचारिक न होकर कहीं आगे जा चुकी है। जब जेएनयू में देश विरोधी नारे लगे उसके बाद वहाँ के अध्यक्ष व अन्य छात्रों को गिरफ्तार किया गया और वामपंथी नेताओं ने इन छात्रों का खुलकर समर्थन किया तो उस दिन लगा कि वामपंथ भारत में अपनी रही सही साख भी खो रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जो जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष तथा अन्य छात्रों ने देश के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी की उससे समझ में आया कि ये वामपंथी भारत को टुकड़े-टुकड़े करके सीरिया तथा इराक जैसी स्थितियां पैदा करना चाहते हैं। दिल्ली के आॅफिस व पांच सितारा घरों में बैठकर छत्तीसगढ़ तथा मणिपुर की बातें करना तथा देश मेें अराजकता के माहौल पैदा कराना और क्या है इस वामपंथ आन्दोलन का मतलब। बंगाल व केरल में इनकी सरकारें रही हैं फिर क्यों वहाँ की जनता ने इन्हें नकार दिया। अब और कितने दिन देश में ये इस जेएनयू प्रकरण को जिन्दा रखेंगे और कन्हैया कुमार जैसे 29 वर्ष के विद्यार्थी को भुनायेंगे। वाम- पंथ भारतवर्ष में कुछ विश्वविद्यालयों में कुछ सौ छात्रों के बीच मौजूद हैं। पश्चिमी बंगाल में विधानसभा चुनाव है तो मुस्लिम वोटों पर सबकी नजर गढ़ी हुई है तो वह चाहे वामपंथी हो या कांगे्रस सभी अपनी राजनीति चमकाने के चक्कर में देश द्रोही के खिलाफ सख्त बयानबाजी से बच रहे हैं। जहाँ इस देश में 20-21 साल में जहाँ युवक-युवतियाँ मेहनत कर रोजी रोटी कमाते हैं और टैक्स देते हैं। वहीं जेएनयू में वह 29 साल का छात्र (जिस उम्र में लोग देश के विकास में योगदान देने लगते हैं) इन करदाताओं के पैसे पर तथाकथित पढ़ाई करते हुए इस देश के दुश्मनों का साथ देकर देश तोड़ने वालों का समर्थन करता है और देश की सेना पर बलात्कारी होने का आरोप लगाता है। देश के विपक्षी नेता उसे बचाने के लिए आगे आते हैं। यह सब इसी देश में हो सकता है क्योंकि यहाँ सरकारें अपने वोट बैंक बचाने के लिए कार्य करती हैं। यहाँ वामपंथी मुखौटा पहन कर लोग करोड़ों की सम्पत्ति पर कब्जा कर बैठे हैं। खुद समाजवादी तथा दलित कहने वाले कुछ 20-25 वर्षों की नेतागिरी के बाद अपने बेटे-बेटियों की शादियों में अरबों खर्च कर देते हैं तो इस देश में राजनीति एक सेवा मात्र नहीं है बल्कि एक बिजनेस है। ये नेता लोग पाँच-पाँच वर्ष बारी-बारी से बिजनेस-बिजनेस खेलते हैं और देश की जनता को मूर्ख बनाते हैं और बीच-बीच में कन्हैया जैसे परजीवियों को भी मौका देते हैं कि वे भी इस गन्द में मुंह चलाये और देश के सैनिक कभी आतंकवादियों से कश्मीर में लोहा लेते हैं और कभी नक्सलियों से छत्तीसगढ़ व उड़ीसा में जूझते हैं। विपक्ष तथा सत्ता पक्ष दोनों ही शोर मचाते हुए जनता को आधा-आधा बांट कर दंगों का मजा उठाते हुए इस देश की सर्वोच्च सत्ता पर बारी-बारी से काबिज होते हैं। न तो सत्ता पक्ष ही इन परजीवियों पर ठोस कार्यावाही करने का तैयार है और न ही वह यह दर्शाना चाहती है बस एक भ्रम की स्थिति बनी रहे और समय के साथ ये सभी देशद्रोही छूट जायें। कांग्रेस अपनी लोकसभा में दुर्दशा को देखकर यह तय नहीं कर पा रही है कि देश प्रेम या देशद्रोह क्या है और भाजपा अपनी सत्ता को खोने के दुःख से यह तय नहीं कर पा रही है कि जेएनयू में देशद्रोह हुआ था या नहीं। संसद के हमलावरों तथा कश्मीर, मुम्बई व अन्य कई जगह हजारों बेगुनाह लोगों तथा सैनिकों के कत्ल के आरोपी आतंकवादियों तथा उनके सरगनाओं के समर्थक इन चन्द परजीवी छात्रों तथा इनके मातहतों को इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है। सरकार अगर इच्छाशक्ति रखे तो इनको न तो इतना समर्थन मिले और न ही इतना मीडिया समर्थन। लगता है कि सत्ता पक्ष भी इस तरह के महौल को बनाने देना चाहता है ताकि बहुसंख्यक वोट उनकी तरफ ध्रुवित हो जायें। परन्तु इससे आम जन के बीच खाई बढ़ेगी और समाज में अराजकता तथा अस्थिरता का महौल बढ़ेगा।