दिशा तथा दशा

वन्य कन्द मूल फल-फूल भाग 1

वन्य कन्द मूल फल-फूल
कु॰ हंसा बिष्ट, नैनीताल -

विद्यालय में मध्यांतर में साक्षी को शिक्षक-शिक्षिकाओं के साथ बातचीत में अपने छोटे भद्या (भय्या का  बेटा) चेतन के बचपन की बात आ गयी। जब चेतन चार साल का रहा होगा तो एक बार उसके स्कूल के हिन्दी टैस्ट में प्रश्न दिया गया था कि ‘पाँच सब्जियों के नाम लिखो।’ चार सब्जियों के नाम तो उसने वही लिखे थे, जो उसकी मिस ने लिखाये थे, लेकिन पाँचवां नाम उसने ‘क्वेरेला’ लिखा था। मिस ने उस शब्द को काटकर करेला लिखा और नम्बर दिए थे, 4/5। चेतन घर आकर मेरी ईजा से नाराज था, ‘आमा अगर क्वेरेला सब्जी नहीं होती तो तुमने पकाकर खिलाई क्यों? और अगर होती है तो मिस ने काटा क्यों?’ ईजा ने मेरे बड़े भद्या तनुज को बुलाया जो उन दिनों 7-8 साल का रहा होगा। तनुज कह रहा था, ‘जब इसे पाँचों सब्जियों के नाम याद थे तो फिर इसने क्वेरेला क्योें लिखा? क्वेरेला क्या होता है?’ नाराज चेतन बोला, ‘उस दिन आमा ने वो फूलों की सब्जी नहीं बनाई, जिसमें दही भी डाला था।’ ईजा समझ गई। हंसते हुए बोली, ‘अरे! क्वेराल कह रहा है। ’ ईजा ने चेतन को गोद में बिठाया, प्यार किया और मुझे पूरा किस्सा बताया। मैंने भी चेतन को प्यार किया, शाबासी दी और कहा, अगर मेरा भय्या क्वेरेला की जगह क्वेराल लिखता तो मिस पूरे-पूरे नम्बर भी देती और खुश होती कि चेतन को रोज की रटी-रटायी सब्जियों के अलावा भी बहुत कुछ पता है।
‘साक्षी’, शिक्षिका सीमा जी बोली, ‘बिल्कुल ठीक । बच्चे को व्यावहारिक ज्ञान भी होना ही चाहिए। जो हमने लिखा बच्चे ने रट लिया, लिख दिया, यह ठीक नहीं है।’ निर्मला जी बोली, ‘बिल्कुल ठीक लिखा बच्चे ने जो खाया, समझा उसे ही तो लिखा था चेतन ने।’
शिक्षक बहादुर जी बोले, ‘हमारे स्कूल में बच्चों को ऐसी कितनी सब्जियाँ याद हैं जो खेतों में नहीं उगाई जाती?’ कैलाश जी बोले - ‘चलो आज इनसे भी पूछते हैं।’ मैंने सोचा विचार तो अच्छा है इनसे आज चर्चा करते हैं लेकिन फिर सामुहिक सहमति बनी कि कक्षा-8 के बच्चों से कहा जाय कि अपनी दादी, ताई, माता-पिता से भी पूछ कर लाना कि हमारे क्षेत्र में क्या-क्या वनसम्पत्तियाँ हैं जो हमारे खाने के काम आती हैं, दवा और अन्य उपयोग में आती हैं। तब तक हम लोग भी कुछ पुस्तकें जानकारी हेतु एकत्र कर लेंगे।
शनिवार । माध्यान्ह भोजन के बाद। मध्यांतर के बाद। गोष्ठी हेतु कक्षा 8 के बच्चे उत्सुक हैं। कई तो पर्वतीय कन्द मूल फल-फूल पत्तियाँ भी एकत्र करके लाए हैं। शिक्षक-शिक्षिकाएँ भी कुछ पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएं लाए हैं, जानकारियों के लिए। मैंने बात शुरू की, ‘बच्चो! जब खेती-बाड़ी प्रारम्भ नहीं हुई थी, तब मानव कन्दमूल फल, फूल पत्तियों को खाता होगा। हमारी दादी-नानी तो कहती थीं कि हर ऋतु के शाक-सब्जी, कन्दमूल, फल-फूल जरूर खाने चाहिए, इनमें बदले हुए मौसम से लड़ने की ताकत भी होती है क्यूंकि इनसे हम पोषक पदार्थ, विटामिन भी लेते हैं। आप लोगों ने जानकारियाँ एकत्र की हैं? सभी बच्चे एकत्र की गयी जानकारियाँ देने को आतुर थे। ’
लवेन्द्र और हेमंत बोले,‘जी क्वेरियाल के ऊँचे-ऊँचे पेड़ होते हैं। इनकी कलियाँ और फूलों की सब्जी बनती है। शिक्षिका निर्मला जी बोली, ‘शाबास! यह समुद्र समह से 1200 से 1800 मी. ऊँचाई वाले स्थानों में उगता है। इसकी लड़की ईंधन के काम पत्तियाँ चारे के काम आती हैं, इसके फूलों की सब्जी, रायता बनता है इसे कचनार, क्वेराल भी कहा जाता है।’
अखिलेश बोला, ‘सब्जी तो सकीना की कलियों की भी बनती है इसकी झाडि़याँ होती हैं, फूलों का रंग गुलाबी होता है।’ सभी शिक्षकों ने उसे शाबासी दी।
अचानक जगदीश हँसने लगा, बोला ‘ जी हमारी आमा तो सिसूणे की सब्जी तक बना देती है।’ कैलाश जी बोले,‘तो फिर हंस क्यों रहे हो? बच्चों सिसूण तो सभी पहचानते हो ना! उसकी पत्ती व तने में जो रोम होते हैं उनमें फार्मिक अम्ल होता है जो पानी में घुलनशील होता है। इसे बिच्छू घास इसलिए कहते हैं क्योंकि इससे त्वचा में झनझनाहट होती है।’ सूरज बोला, ‘सिसूण मेें वो ककणी जैसी क्या होती है?’, जब पत्तियों, तनों में एक फफूँद लग जाती है तो गाँठे बन जाती हैं, इन्हें सिनकाकेडि कहते हैं। इन्हें भी पकाकर खाया जाता है। इसके अलावा हस्ताकार वाली बिच्छू घास को आवा कहा जाता है इसके फूल जो बालियाँ जैसी दिखती हैं उनकी सब्जी, पाचन के लिए उत्तम मानी जाती है।
शेष अगले अंक में