युवा कलम

वन्य कन्द मूल फल-फूल भाग 2

वन्य कन्द मूल फल-फूल
कु॰ हंसा बिष्ट, नैनीताल -

गोविन्द की बारी आयी तो वह बोला,‘सर कैंरू की सब्जी भी तो खाई जाती है।’ हाँ कैरू अर्थात शतावर एक काँटे युक्त झाड़ी है। कैरू की जड़ों का गुत्था शतावरी कंद है जिससे कई दवाएं बनती हैं। इसकी नई कोपलों को उबालकर, इसके रेशे निकालकर, इसकी सब्जी बनाई जाती है। बहादुर सर ने बताया। मनीष बोला, ‘ये विमल कुछ छिपा रहा है, दिखाओ क्या है?’ विमल ने गेठी दिखाई। गेठी बेल में लगने वाली रचना है। इसे पत्र प्रकलिका या बलबिल कहते हैं। कड़वी गेठी डायबिटीज में लाभदायक होती है। गेठी को गरम राख में दबाकर इसका भरता भी बनाया जाता है। इसका रायता भी बनता है। मैंने बताया।

किसन और विनोद बातें कर रहे थे ‘तुम बोलो’, ‘नहीं तुम बोलो’। कार्यालय स्टाफ के सुरेश  जी बोले, ‘बोलने में हिचक रहे हैं, सीधे हैं।’ सीमा जी बोली, ‘ये सीधे हैं? जलेबी की तरह सीधे हैं।’ अनिल बोला, ‘वो ही तो! जलेबी की तरह इसकी पत्ती मुड़ी रहती है  और इसकी सब्जी खाई जाती है उसे लिगूंड़ कहते हैं।’ हाँ ये फर्न के पौधों की बाल पत्तियाँ हैं जो खुलने से पहले जलेबी की तरह मुड़ी रहती हैं। इसकी सब्जी बड़ी स्वादिष्ट होती है। ऐसा ही कोत्थ्यूड़ भी होता है जो लिगूंड़ से पतला होता है।
किसन बोला, ‘जी! हमारी आमा कहती है कि तिमूर के दानों की रसदार सब्जी और दाल बनती है और इसके तनों से दातुन भी बनते हैं। ’

मैंने कहा, ‘च्यू की तो किसी ने बात ही नहीं की।’ जी, हाँ च्यू को तो मशरूम भी कहते हैं। कक्षा 6 के एक बच्चे ने सरलता से कहा। दर्शकों के रूप में बैठे कक्षा 6 और 7 के बच्चे भी गोष्ठी में शामिल हो गये थे। ‘हाँ यह एक कवक है। इनकी कुछ प्रजातियाँ विषैली भी होती हैं, इन्हें पहचान कर के ही खाना चाहिए। जानते हो बच्चो! वैसे वनस्पतियों का संचित भोजन स्टार्च है लेकिन कवक का संचित भोजन ग्लाइकोजन है जो जन्तुओं में होता है।’

अब कक्षा 7 का बच्चा बोला, ‘जी! तैड़ भी तो खाते हैं शिवरात्रि के दिन।’ ‘हाँ तैड़ अर्थात् तरूड़ की जड़ें शकरकन्द की तरह हाती है। इन्हें व्रत के दिन फलाहार के रूप में लिया जाता है।’ बच्चो! इसके अतिरिक्त ‘तिमिल’ की सब्जी से भी पाचन ठीक होता है।जी!जी! तिमिल के बड़े-बड़े पेड़ों मेें तिमिल लगते हैं। इनको पकने पर खाते हैं। इनकी पत्तियाँ पूजा पाठ के दिन काम आती हैं । एक बच्चा बोला। शाबाश! शिक्षकों ने शाबाशी दी। निर्मला जी बोली, ‘वैसे आजकल जो लंच डिनर से पहले सूप मिलता है वैसा सूप क्यौल के भूमिगत भाग से भी बनता है।’ हाँ! क्यौल हल्दी-अदरख की तरह की ही जंगली वनस्पति है। इसके भूमिगत भाग का सूप एपीटाइजर है।

तभी विद्यालय में मुझसे मिलने आयी ग्रहणी गीता जी बोली, ‘अगर आप मुझे एक सप्ताह का समय दें तो कई और पौधों के नाम, मैं आपको बता सकती हूँ जैसे आलू की खेती में उग जाने वाला पतवार ल्यूणी जिसकी पत्तियाँ सैक्यूलैण्ट है, उसकी हरी सब्जी बड़ी अच्छी होती है। पानी के निकट उगने वाला ‘सिलैरी’ की हरी सब्जी आँखों के लिए अच्छी बताई जाती है।

तभी रेनू जी बोली, ‘बच्चो आज बताओ किन-किन सब्जियों के बारे में बातें हुई? बच्चे उत्सुक होकर बताने लगे, ‘जी क्वेराल, सकीना, सिसूण, आवा, गेठी, तरूड़, लिगूंड़, कोत्यथ्यूड़, कैरू, सिलेरी, ल्यूणी, च्यू, तिमूर, तिमिल..............., ’ ‘शाबाश! एक जंगली फल तो मैं भी बता सकती हूँ ‘बेढुली’ बिल्कुल तिमिल जैसा, लेकिन बहुत छोटा, छोटी सी झाड़ीनुमा बेल में होता है, इसकी सब्जी से भी पाचन ठीक होता है।’

सभा का समापन करते हुए मैंने कहा, ‘आप लोगों ने बहुत अच्छी जानकारियाँ दी है। अब इन जानकारियों से एक प्रोजेक्ट बनाना है हमारे वन्य मूल-फल-फूल।’
दूर खड़ी भोजन माताएं कांती और जानकी आगे आयी और बोली, ‘अगली बार हम भी बताएंगे।’