विचार विमर्श

वर्ल्ड वेटलैंड्स दिवस

वर्ल्ड वेटलैंड्स दिवस
प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
वर्ल्ड वेटलैंड्स दिवस हमें 2 फरवरी 1971 को रामसर कन्वेंशन हस्ताक्षर के होने का स्मरण कराता है। पहली बारयह सन् 1997 में बड़े उत्साहपूर्वक मनाया गया था। हर साल अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सरकारी एजेंसियों, गैर सरकारी संगठनों एवं सभी स्तरों के नागरिकों के समूह को इस दिवस में जागरूकता बढ़ाने के लिए शामिल किया जाता है। प्रख्यात शिक्षाविद् डाॅ॰ होशियार सिंह धामी कहते हैं, वेटलैंड्स या आद्र्रभूमि हर देश और हर जलवायु में होती है। ये दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति में से एक है जहाँ अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक संख्या में पौधों और जीव-जंतुओं की प्रजातियां पायी जाती हैं।
आद्र्रभूमि अत्यधिक दोहन की चपेट में होती हैं, खासकर जब उन्हें अनुत्पादक या सीमान्त भूमि के रूप में देखा जाता है। कई मायनों में, आद्र्रभूमि को विकास बढ़ने के कारण आघात सहन करना पड़ता है। आद्र्रभूमि के घटते क्षेत्रफल की संख्या दुनिया के सभी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ जमीन और पानी के लिए वैश्विक मांग में वृद्धि होने के कारण इसके घटने की गति आगे भी तेज होने की काफी संभावना है। कुमाऊं के पूर्व मुख्य वन संरक्षक प्रकाश भटनागर कहते हैं, उत्तराखण्ड सरकार ने आद्र्रभूमि के भीतर की गतिविधियों में प्रतिबन्ध लगाया है। आद्र्रभूमि का गैर झीलों में रूपांतरण और उसमें कचरे का ढेर और अनुपचारित अपशिष्ट डालना पूरी तरह से प्रतिबंधित है। लेकिन राज्य में आद्र्रभूमि का विस्तृत अध्ययन नहीं किया गया एवं उन्हें रामसर कन्वेंशन के अनुरूप पहचान नहीं मिली है। रामसर कन्वेंशन के अनुसार झील, नदियां, बाढ़ के मैदान झीलों के दायरे में आते हैं और इन्हें संरक्षित करना अति आवश्यक है। परन्तु उत्तराखण्ड में औद्योगिक क्षेत्रों में व्यापक रूप से यह रिपोर्ट किया गया है कि औद्योगिक कचरे के कारण नदियां और भूमिगत जल प्रवाह बुरी तरह प्रदूषित हो चुका है।
उत्तराखण्ड में नैनीताल जिले में बिन्दुखत्ता से एक सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश असन्तोष प्रकट करते हुए कहते हैं, पास में स्थित पेपर मिल के कारण पानी के साथ ही वायु भी प्रदूषित हो रही है। जल प्रदूषण से पशुओं को भारी नुकसान हो रहा है और बंदरों द्वारा नाले का पानी पीने से, जहाँ उद्योग का दूषित पानी छोड़ा जा रहा है, मृत्यु हो रही है। लालकुआँ, किच्छा और पंतनगर के लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है क्यूंकि वहाँ भूमि की उत्पादकता में तेजी से कमी आई है। इसी तरह कोसी एवं बहल्ला नदियाँ भी औद्योगिक प्रदूषण से दूषित हो गयी हैं। पास के काशीपुर तहसील के क्षेत्रों में जैसे दोहरी परसा, अजीतपुर, सानखेड़ा एवं मुकुंदपुर में ग्रामीणों ने अपने क्षेत्र में हो रहे नुकसान के खिलाफ स्वर तेज कर दिया है। पास के उत्तर प्रदेश क्षेत्र में स्थित रामपुर जिले के स्वार तहसील में ग्रामीण जो इस औद्योगिक विकास के शिकार हैं, इस लड़ाई में अपना समर्थन दे रहे हैं। उन्होंने मिलकर अपनी इस लड़ाई हेतु ‘कोसी प्रदुषण समिति’ का भी गठन किया है। लेकिन धीरे-धीरे इस आंदोलन का स्वर नेताओं की निष्क्रियता एवं वोट बैंक की राजनीति के कारण मंद पड़ता जा रहा है।
उत्तराखण्ड राज्य के गठन के साथ, पत्थर क्रेशरस को नदी से खनन का माल पहुँचाने में तेजी आई है। गौला, गंगा, कोसी, बौर, दाबका और अन्य नदियों से खनन, कानूनी एवं अवैध दोनों रूप से किया जा रहा है। इन अवैध गतिविधियों और उसके एवज में पर्यावरण के खतरों के बारे में कई बार सूचित किया गया है, लेकिन अभी तक कोई निवारक कदम नहीं उठाया गया है। इन क्षेत्रों में खनन से निचले स्थानों में बाढ़, नदियों की दिशा बदलने एवं कटाव का भारी खतरा बढ़ गया है।
सबसे बड़ा खतरा नैनीताल की झील व क्षेत्र को है। नैनी झील के जलग्रहण क्षेत्र, सूखाताल में अंधाधुंध निर्माण किया जा रहा है जिसका मलबा झील में फेंका जा रहा है। सूखाताल एक आद्र्रभूमि है जो बरसात के मौसम के दौरान भर जाती है। भारतीय जल विज्ञान संस्थान एवं आईआईटी, रुड़की की रिपोर्टों के अनुसार, नैनी झील के पानी की 50 प्रतिशत से अधिक की आपूर्ति सूखाताल द्वारा की जाती है। सूखाताल में पानी की कमी से नैनीताल में झील के पानी का स्तर बहुत तेजी से नीचे जा रहा है जो कुछ ही वर्षों के भीतर झील की जगह एक तालाब का रूप लेने का भयावह संकेत दे रहा है। ऐसे ही संकेत भीमताल, नौकुचियाताल, सातताल, खुर्पाताल एवं अन्य झील दे रहे है, जिनका अस्तित्व खतरे में है।
दुर्भाग्य से सिर्फ कागज पर हस्ताक्षर करने से आद्र्रभूमि पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा के लक्ष्यों को प्रतिबद्धता के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता है। हमें कन्वेंशन की वास्तविकता को बनाये रखना है। इसके साथ-साथ ऐसे भ्रम को भी दूर करना होगा कि कृषि भूमि को बढ़ाने के लिए आद्र्रभूमि को खत्म कर देना चाहिए। प्रकृतिसंरक्षणवादियों को समाज के लोगों में आद्र्रभूमि के विनाश के लिए नहीं बल्कि इनके संरक्षण से लाभ के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी।