संस्कृति

विश्व धरोहर दिवस भाग 1

विश्व धरोहर दिवस
प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -

18 अप्रैल का दिन प्रत्येक वर्ष विश्व धरोहर दिवस के रूप में मनाया जाता है। जिसकी मुख्य संकल्पना संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा चिन्हित की गयी। मानव जाति से जुड़ी मूल्यवान संपत्तियों का संरक्षण एवं परिरक्षण करना है। इन सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण हेतु अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है। इस विशिष्ट दिन का महत्त्व सांस्कृतिक धरोहरों की विविधता, उनके संरक्षण के लिए होने वाले प्रयास तथा उनसे जुड़ी हुई भेद्यता के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाने के अवसर प्रदान करना है। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो एचएस धामी कहते हैं, ‘‘यूनेस्को द्वारा सूचीबद्ध किये गए विश्व धरोहर स्थल का चयन इनकी मानवता की साँझा धरोहर के प्रति प्रभावशाली सांस्कृतिक अथवा भौतिक महत्ता के कारण की गयी है। जहाँ प्रत्येक स्थान किसी राज्य के कानूनी क्षेत्र का हिस्सा होता है, वहीं यूनेस्को का मानना है की मानवजाति की साझा सम्पदा के रूप में इन्हें संरक्षित करना अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए भी आवश्यक है। “

उत्तराखण्ड में दो विश्व धरोहर स्थलों को चिन्हित कर, नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान तथा फूलों की घाटी को 17 जुलाई 2005 को विश्व धरोहर सूची में अंकित किया गया। नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के अंतर्गत नंदा देवी अभयारण्य आता है, यह हिमनदों की घाटी है जो 6000 मीटर से 7817 मीटर के बीच चोटियों से वृताकार रूप में घिरी हुई है तथा इसमें ऋषि गंगा बहती है। तथा यह उद्यान 3500 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित है।

मुख्य वन संरक्षक कुमाऊँ श्री परमजीत सिंह कहते हैं, ‘‘नंदा देवी शिखर के नाम से अलंकृत नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान वनस्पतियों और जीवों की कई प्रजातियों का निवास स्थान है। इसलिए उद्यान को सुशोभित करने वाले वनस्पतियों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है - (अ) सब - अल्पाइन वन क्षेत्र (ब) नम अल्पाइन स्क्रब और (स) अल्पाइन बुग्याल। उद्यान में 312 प्रकार की पुष्प प्रजातियां पायी जाती हैं। भौगोलिक विवरण के अनुसार, उद्यान क्षेत्र को दो क्षेत्रों में बांटा जा सकता है - ऊपरी ऋषि क्षेत्र (भीतरी अभयारण्य), जहाँ कई हिमनदों के क्षेत्र अल्पाइन बुग्यालों के साथ मिले हुए हैं। तथा निचला ऋषि क्षेत्र (बाहरी अभयारण्य) जो एक अत्यंत ही घना वन क्षेत्र है। अभयारण्य के कुल क्षेत्रफल का दो तिहाई भाग भीतरी एवं एक तिहाई भाग बाहरी क्षेत्र के अंतर्गत आता है।“

नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान में ऊंचाई क्षेत्र में बसने वाले स्तनधारी और पक्षी पाये जाते हैं। स्तनधारियों में हिम तेंदुए, सीरो, तेंदुए, भारल, घोराल और कस्तूरी मृग आदि शामिल हैं। उद्यान में पक्षियों की 114 प्रजातियाँ जिनमे हिमालयी मुर्गा, खलीज, तीतर, रोज फिंच, रूबी थ्रोट अथवा व्रब्लेर्स आदि भी पाये जाते हैं। तथा वन विभाग के आकड़ों के अनुसार उद्यान में तितलियों की 27 प्रजातियों पायी जाती है।

वन संरक्षक श्री विवेक पांडे कहते हैं  ‘‘अन्य धरोहर स्थल - फूलों की घाटी अपने उत्तम परिदृश्य, अल्पाइन बुग्याल और फूल-पौधों के लिए व्यापक रूप से प्रशंसित है और यह भारत का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान है जिसे पौधों के संरक्षण के लिए विशेष रूप से स्थापित किया गया। सर्दियों के दौरान यह लगभग छह महीने के लिए बंद रहता है। “
बाहरी दुनिया के बीच यह घाटी प्रख्यात ब्रिटिश अन्वेषक, वनस्पतिशास्त्री और पर्वतारोही श्री फ्रेंक स्मिथ द्वारा सन् 1931 में चर्चा में आयी। हिमालय की चोटी कामेट पर्वत की सफलतापूर्वक चढ़ाई करने के पश्चात लौटते समय, वह और उनके वनस्पतिशास्त्री सहयोगी तथा दून स्कूल (देहरादून) के लेक्चरर श्री आर एल होल्ड्सवर्थ संयोग से इस क्षेत्र में आ गए थे। छह वर्ष के उपरांत स्मिथ को फिर से घाटी का दौरा करने का अवसर मिला है और उन्होंने होल्ड्सवर्थ द्वारा इकटठा की गयी 29 प्रजातियों के अलावा कुल 262 फूल पौधे एकत्र किये। सन 1938 में घाटी पर लिखी अपनी पुस्तक के शीर्षक के नाम पर श्री फ्रेंक स्मिथ ने इस जगह का नाम फूलों की घाटी रख दिया।
वन विभाग द्वारा एक विस्तृत अद्यतन सूची फूलवाले पौधों की 613 प्रजातियों को लेकर तैयार की गई है, इन पौधों में से अधिकांश औषधीय गुण से परिपूर्ण हैं। अन्य हिमालय घाटियों की अपेक्षा इस क्षेत्र में असमंदा फर्न की बहुतायत मात्रा क्षेत्र की दुर्लभता को और दर्शाती है। खिले हुए फूलों से यह घाटी अगस्त महीने के अंत से अक्टूबर के आखिरी सप्ताह के तीन महीने के समय तक आच्छादित रहती है। अप्रैल और मई के महीनों के दौरान जमे हुए हिमनदों के पिघलने से पौधों को ऊपर आने की जगह मिल जाती है। मध्य मई से जून के अंत तक कलियाँ दिखनी शुरू हो जाती है तथा खिले हुए फूलों की पराकाष्ठा को देखने के लिए जुलाई से अगस्त के अंत तक घाटी का भ्रमण करने का समय सबसे अच्छा होता है।

रेंज अधिकारी और उच्च क्षेत्रों में पैदल चलने वाले श्री के एस रावत कहते हैं ‘‘फूलों की घाटी प्रकृति द्वारा दिया गया एक परोपकारी उपहार है जहाँ हिमालयन थार, रेड फाॅक्स, हिमालयन येल्लो मार्टिन, हिमालयन माउस खरगोश, भारल, सीरो और हिम तेंदुए, आदि जैसे दुर्लभ स्तनधारियों की 13 प्रजातियाँ पायी जाती हैं।“ भारत के सबसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय उद्यान के साथ साथ यह प्रकृति प्रेमियों, पैदल यात्री, वनस्पतिशास्त्री, पक्षी वैज्ञानिकों के लिए एक अथक आश्चर्य है।

लेखक प्रख्यात इतिहासकार एवं पर्यावरणविद् हैं।
अंग्रेजी के मूल लेख से हिन्दी में अनुवादित