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विश्व धरोहर दिवस भाग 2

विश्व धरोहर दिवस
प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल का दिन विश्व धरोहर दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसकी मुख्य संकल्पना संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक  संगठन (यूनेस्को) द्वारा मानव जाति से जुड़ी मूल्यवान संपत्तियों  के संरक्षण एवं परिरक्षण के लिए की गयी थी। भविष्य की पीढियों के लिए सार्वभौमिक मूल्य वाले स्थानों की रक्षा एवं संरक्षण के लिए सन 1983 में यूनेस्को द्वारा यह निर्णय लिया गया था जिसके फलस्वरूप उत्तराखण्ड में नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान तथा फूलों की घाटी को सन 2005 में विश्व धरोहर सूची में अंकित किया गया।
उत्तराखंड में चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन दिग्विजय सिंह खाती दृढ़ता से कहते हैं, ”गढ़वाल के चमोली जिले में स्थित नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान प्रकृति  की एक ऐसी अनूठी संरचना है जहाँ आकर लोगों को मन की शांति प्राप्त होती है। ब्रिटिशर्स द्वारा यहाँ आने के पश्चात से, यह पर्वतारोहण और ट्रैकिंग के लिए एक लोकप्रिय स्थान बन गया था। लेकिन जल्द ही यह महसूस किया गया कि इससे क्षेत्र की संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र में अस्तव्यस्तता बढ गयी है।” जिसके पश्चात वहाँ की सुंदरता और अविस्मरणीय जैव विविधता को बचाये रखने के लिए प्रयास शुरू किये गए। नंदा देवी शिखर के पास स्थित इस उद्यान में वनस्पतियों की 620 प्रजातियों तथा जीव-जंतुओं की 427 प्रजातियों को सूचित किया गया है।
नंदा देवी क्षेत्र के संरक्षण का इतिहास सन 1939 से अस्तित्व में आया था जब पूरे ऋषि  गंगा घाटी को अभयारण्य घोषित किया गया था। लेकिन इससे स्थानीय लोगों की आजीविका में कोई बाधा उत्पन्न नहीं हुई थी। इस क्षेत्र के भोटिया निवासियों की आय का मुख्य स्रोत भारत-तिब्बत व्यापार था, जो सन 1962 में चीनी आक्रमण के बाद बंद हो गया था। क्षेत्र के भोटिया धीरे-धीरे खुद को बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृस्य में सामान्य स्थिति में वापस आने लग गये थे तथा नंदा देवी शिखर, जिसकी लोकप्रियता सन 1974 तक एवरेस्ट के बाद दूसरे नंबर पर थी, पर पर्वतारोहण अभियानों हेतु कुली एवं गाइड के रूप में कार्य करने लग गए थे। विशेष रूप से नंदा देवी का पश्चिमी हिस्सा अपने चुनौतीपूर्ण रास्तों के लिए विश्वभर में ख्याति प्राप्त था। प्रत्येक वर्ष लगभग 4000 पर्वतारोही और उनके स्थानीय कुली यहाँ आते रहते थे।अत्यधिक पर्वतारोहण और ट्रैकिंग के दबाव से संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के क्षतिग्रस्त हो जाने के चलते सन 1982 में इस क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया था। उद्यान में स्थानीय लोगों की आवाजाही में प्रतिबंध लगने से वहाँ वन विभाग के अधिकारियों और स्थानीय लोगों के बीच संघर्ष शुरू हो गया था। साथ ही उद्यान को विरासत स्थल के रूप में अंकित करने से यहाँ लगे प्रतिबंध को और सख्त बना दिया गया था। ऐसा होने से जब असंतोष उच्च स्तर पर पहुँचा तब बफर क्षेत्र के दस गांवों के लोगों ने धन सिंह राणा के नेतृत्व में अंतर्भाग क्षेत्र में प्रवेश किया। उन्होंने कहा, ”उन्होंने अपने पारंपरिक अधिकारों की बहाली के लिए तथा नंदा देवी अभ्यारण्य के संरक्षक के रूप में कार्य करने देने के लिए सरकार के समक्ष कई माँगे रखीं। सौभाग्य से समय पर वन विभाग की धारणा के परिवर्तन के साथ तथा हस्तक्षेप से असंतोष की इस चिंगारी को बुझा दिया गया।”
उत्तराखंड पारिस्थितिकी पर्यटन के मुख्य वन संरक्षक कपिल जोशी कहते हैं, ”दूसरा धरोेहर स्थल, फूलों की घाटी, हिमालय क्षेत्र में सबसे सुंदर घाटियों में से एक है। घाटी को इसके व्यापक रूप में अपने उत्तम परिदृस्य, बुग्याल और फूल पौधों के लिए जाना जाता है जिसे भारत में पौधों के संरक्षण के लिए प्रथम राष्ट्रीय उद्यान के तौर पर विशेष रूप से स्थापित किया गया था।” इस घाटी की बाहरी दुनिया के समक्ष लोकप्रियता सन 1937 में प्रख्यात ब्रिटिश अन्वेषक, वनस्पतिशास्त्री और पर्वतारोही फ्रैंक स्मिथ द्वारा यात्रा के बाद मिली थी।
आज भी फूलों की घाटी एक वानस्पतिक चमत्कार और रहस्य से कमतर नहीं है। यह चमोली जिले में अलकनंदा और धौली गंगा नदी की मुख्य घाटी है। तिप्रा हिमनद से निकलने वाली पुष्पवती नदी भी इसी घाटी के मध्य बहती है। एक समतल घाटी के रूप में स्थित यह क्षेत्र 5 किमी लंबा तथा 2 किमी चैड़ा है, जो 87.5 वर्ग क्षेत्र में फैला हुआ है। यह घाटी पूर्व में गौरी पर्वत (6590 मीटर), रतन वन पर्वत (6126 मीटर), पश्चिम में खूंट खाल (4430 मीटर), उत्तर में नीलगिरि पर्वत (6479 मीटर) तथा दक्षिण में शपतश्रृंग पर्वत (5030 मीटर) से घिरा हुआ है। ऊँचाई में भिन्नता दिखाते हुए यह घाटी समुद्र स्तर से 3352 मीटर से लेकर 3658 मीटर तक फैली हुई है।
भारत के सबसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय उद्यान के साथ साथ यह प्रकृति  प्रेमियों, पैदल यात्री, वनस्पतिशास्त्री, पक्षी वैज्ञानिकों के लिए एक अथक आश्चर्य है। खिले हुए फूलों से यह घाटी अगस्त महीने के अंत से अक्टूबर के आखिरी सप्ताह के तीन महीने के समय तक आच्छादित रहती है। अप्रैल और मई के महीनों के दौरान जमे हुए हिमनदों के पिघलने से पौधों को ऊपर आने की जगह मिल जाती है। मध्य मई से जून के अंत तक कलियाँ दिखनी शुरू हो जाती है तथा खिले हुए फूलों की पराकाष्ठा को देखने के लिए जुलाई से अगस्त के अंत तक घाटी का भ्रमण करने का समय सबसे अच्छा होता है। जब घाटी बर्फ से ढक जाती है तो पूरी वनस्पति अगले पाँच महीनों के लिए निष्क्रिय बन अपने आप को समेट लेती है।
वन विभाग द्वारा एक विस्तृत अद्यतन सूची फूलवाले पौधों की 613 प्रजातियों को लेकर तैयार की गई है, इन पौधों में से अधिकांश औषधीय गुण से परिपूर्ण हैं। अन्य हिमालय घाटियों की अपेक्षा इस क्षेत्र में असमंदा फर्न की बहुतायत मात्रा क्षेत्र की दुर्लभता को और दर्शाती है। यह एक सम्मोहित करने वाली जगह है जहाँ की शीतल हवा परमात्मा की उपस्थिति की अनुभूति कराती है।