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विश्व पृथ्वी दिवस एवं वनों में आग ( World Earth Day & Forest Fire)

प्रो॰ अजय सिंह रावत, नैनीताल -
राहेल कार्सन की पुस्तक ‘साइलेंट स्प्रिंग‘ द्वारा सन 1962 में शुरू हुए पर्यावरण आंदोलन का परिणाम 22 अप्रैल के दिन मनाये जाने वाला विश्व पृथ्वी दिवस है। जनता में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से इस पुस्तक की 24 देशों में 500,000 से अधिक प्रतियां बिकीं, जिसके फलस्वरूप यह इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गई। उनकी पुस्तक को कई वैज्ञानिकों, नेताओं और नीति निर्माताओं द्वारा पढ़ा गया, और जनता द्वारा अपनाया भी गया था। पर्यावरणविद् जी टायलर मिलर के अनुसार सन 1965 से 1970 के मध्य, ”पारिस्थितिकी के उभरते विज्ञान ने बड़े पैमाने पर मीडिया का ध्यान आकर्षित किया था। सन 1969 में अमेरिका की चंद्रमा के अपोलो यात्रा के दौरान, अंतरिक्ष से पृथ्वी की एक तस्वीर ली गयी थी जिसमें पृथ्वी एक छोटा सा ग्रह दिख रहा था। इस अत्यधिक प्रचारित तस्वीर ने विश्व भर में पृथ्वी के बेहतर देखभाल की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना शुरू कर दिया था।” इसी के फलस्वरूप पहला वार्षिक पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल 1970 को मनाया गया था। विस्काॅन्सिन के अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड विल्सन द्वारा प्रस्तावित इस दिन लगभग 20 लाख लोग जागरूकता बढ़ाने तथा पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार हेतु सड़कों पर उतर आए थे।
पृथ्वी दिवस के इस अभियान ने पर्यावरण की चिंता के प्रति उभरती चेतना को स्वर दे उसे मुखर कर डाला था। लेकिन भारत में नेता एवं नीति निर्माता अभी भी पर्यावरण क्षरण और वनों की कटाई के कु-प्रभाव के प्रति अनिभिज्ञ हैं। किसी भी राजनीतिक दल ने आज तक अपने घोषणा पत्र में पर्यावरण को शामिल नहीं किया है। नेशनल एकेडमी से फैलो ;एफ एन एद्ध प्रोफेसर एस.पी. सिंह का मानना है, ”विगत दो सदियों से विश्व ने अभूतपूर्व आर्थिक गतिविधियों के कारण वनों की कटाई में भारी बढ़ोत्तरी देखी है, जो जीवाश्म ईंधन के बाद ग्लोबल वार्मिंग का सबसे महत्वपूर्ण कारण है। यह स्थिति हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी के लिए अधिक भयावह है जहाँ वनों के महत्व को नहीं समझा गया है। भारत में 45,000 पौधों की प्रजातियाँ पायी जाती है जिनमे से 50 प्रतिशत से अधिक हिमालय क्षेत्र में ही पायी जाती हैं। इन पायी जाने वाली प्रजातियों में 50 प्रतिशत से अधिक यहाँ की मूल प्रजातियाँ हैं।”
हिमालय के वन उत्तरी भारत की नदियों को वनिस्पतिक सहायता भी प्रदान करते हैं जिस कारण इन्हे एशिया के जल-भण्डार के रूप में भी जाना जाता है। यह भण्डार मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले एक अरब से ज्यादा लोगों को जीवनदायनी पानी उपलब्ध कराता है। सामाजिक कार्यकर्ता संजय साह के अनुसार, ”मध्य हिमालयी क्षेत्र या उत्तराखंड इससे अछूता नहीं है। तुलनात्मक दृष्टिकोण में यह क्षेत्र संवेदनशील माना जाता है क्योंकि इसके जलग्रहण क्षेत्र में भारत-गंगा के मैदानी क्षेत्रों में कुल आबादी की 40 प्रतिशत से अधिक की जनसँख्या रहती है। इसलिए जो भी यहाँ गठित होता है उसका सीधा असर बांग्लादेश में भी पड़ता है।”
पृथ्वी दिवस एक अंतरराष्ट्रीय दिवस है, लेकिन वनों में लगातार लगने वाली आग से उत्तराखंड के लोगों की भावना में इस दिवस के प्रति ढीलापन रहा है। बढ़ते तापमान, बारिश में गिरावट एवं संसाधनों में कमी के कारण वर्तमान में वन विभाग जंगल की इस उग्र आग पर नियंत्रण करने पर सक्षम नहीं है। पर्यावरणविद् राजा साह कहते हैं, ”पहाड़ियों में जंगल के विशाल क्षेत्रों में सूखे चीड़ के पिरुलों की मोटी चादर इसकी मुख्य दोषी है। यह एक भड़कने वाले डब्बे के समान है जहाँ एक जलती हुई माचिस से पूरे क्षेत्र में पल भर में चीड़ के पिरुल आग में स्वाहा हो जाता है। जंगल में 80 प्रतिशत से अधिक आग चीड़ के जंगलों द्वारा लगती है।” वहीं चीड़ का पिरुल भी जानवर और मनुष्य दोनों के लिए अत्यन्त खतरनाक है। यह जानवरों को पिरुल के नीचे पड़ी घास को खाने से रोकता है जिससे नई घास नहीं आ पाती है। इस प्रकार आग लगाना यह ग्रामीणों की वार्षिक गतिविधि बन गयी है जिससे जानवरों के लिए बारिश के दौरान ताजा घास प्राप्त करने के लिए प्रत्येक गर्मियों में वह पिरुल को जला डालते हैं।
लेकिन ग्रामीणों को ऐसा करने से रोकने में वन विभाग और पर्यावरणविद दोनों ही विफल रहे हैं। इसके अलावा कैंप में यात्रियों द्वारा आग सुलगाने से जो रात में जंगल में विश्राम करते हैं, मजदूरों द्वारा सड़क को पिघलाने के पश्चात जले हुए अवशेषों से, जलती हुई माचिस की तिल्ली, गाँव में रास्ता बनाने के लिए लापरवाही से आग लगाने से तथा ड्डषि अवशेषों को अनियंत्रित होकर जलाने से भी जंगल में लगी यह आग भयावह रूप ले लेती है। ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार लगी हुई आग में बारे में विभाग द्वारा रिपोर्ट नहीं ली जाती है। जिसके कारण दुर्भाग्य से वन विभाग और ग्रामीणों के मध्य अविश्वास बढता ही जा रहा है। ग्रामीणों में ब्रिटिश शासन के समय से ही विभाग की ओर विरोध की दृष्टि से देखा जाता है। इसलिए यह अति आवश्यक है कि वन विभाग और ग्रामीणों में सामंजस्य बढ़ाने के लिए वन प्रबंधन में ग्रामीण हितधारकों की बातों को भी उचित स्थान दिया जाए।